Premanand Maharaj: गलती और पाप में क्या है फर्क, भगवान कब कर देते हैं माफ? जानें प्रेमानंद महाराज का जवाब

Premanand Maharaj:जब हम मान लेते हैं कि हमसे गलती हुई है और उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, तो भगवान हमारा साथ देते हैं. प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि भगवान का नाम जपने और कीर्तन करने से मन साफ होता है. इससे दिल को शांति मिलती है.

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प्रेमानंद महाराज (Photo: Instagram/@Bhajanmargofficial) प्रेमानंद महाराज (Photo: Instagram/@Bhajanmargofficial)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:22 AM IST

Premanand Maharaj : वृंदावन के पूज्य और प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज अपने सरल और गूढ़ वचनों के लिए जाने जाते हैं. उनकी बातें न केवल मन को शांति देती हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा भी दिखाती हैं. बड़ी संख्या में भक्त उनके पास अपने मन की उलझनों और सवालों के साथ पहुंचते हैं, और प्रेमानंद महाराज अत्यंत सहज भाषा में उनके उत्तर देते हैं. हाल ही में एक महिला भक्त ने उनसे एक बहुत ही दिलचस्प सवाल किया. उन्होंने जानना चाहा कि गलती और पाप में वास्तविक अंतर क्या होता है और इनका प्रायश्चित किस तरह किया जाना चाहिए. 

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पाप और गलती में अंतर
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने बड़ी स्पष्टता से समझाया कि गलती और पाप में खास अंतर हमारे संकल्प और इच्छा का होता है. उन्होंने कहा कि जब कोई कार्य बिना सोचे-समझे, अचानक या अनजाने में हो जाए, और उसके पीछे हमारी कोई मंशा या पूर्व योजना न हो, तो वह गलती कहलाती है. उदाहरण के तौर पर, यदि चलते समय किसी से अनजाने में टक्कर हो जाए, तो वह एक साधारण भूल है, क्योंकि उसमें न कोई दुर्भावना थी और न ही कोई सोच-समझकर किया गया काम.

जब कोई व्यक्ति किसी गलत काम को पूरी समझ के साथ, जानबूझकर और अपनी इच्छा से करता है, तो उसे पाप कहा जाता है. यानी जो काम सोच-समझकर, सही-गलत जानते हुए किया जाए और फिर भी गलत रास्ता चुना जाए, वह पाप की श्रेणी में आता है.  इसके उलट, गलती वह होती है जो बिना सोचे, अनजाने में या लापरवाही से हो जाती है.  गलती में बुरी मंशा नहीं होती, लेकिन पाप में व्यक्ति का अपना फैसला और इच्छा शामिल होती है.

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कैसे करें प्रायश्चित

प्रायश्चित के बारे में प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि गलती हो या पाप, दोनों का उपाय है. उनके अनुसार भगवान का नाम लेने से हर तरह के पाप और भूलें समाप्त हो सकती हैं. जब हम भगवान का नाम जपते हैं, कीर्तन करते हैं और भक्ति में मन लगाते हैं, तो हमारा मन साफ होता है और दिल को शांति मिलती है. इसलिए इंसान को चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा भगवान का नाम ले, नियमित रूप से नाम जप करे.  अपने व्यवहार को बेहतर बनाने की कोशिश करे. यही सच्चा प्रायश्चित है और यही जीवन को अच्छा और पवित्र बनाता है. 

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