तेलंगाना के मुलुगु जिले के मल्लूर गांव में एक ऐसा दिव्य मंदिर है जहां भगवान की प्रतिमा जीवंत मानी जाती हैं. ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति इंसान की त्वचा जैसी सॉफ्ट है. इतना ही नहीं, मूर्ति का स्पर्श करने या उसे दबाने पर उसमें से रक्त जैसा पदार्थ भी निकलने का दावा किया जाता है. इसे रोकने के लिए मूर्ति पर चंदन का लेप लगाया जाता है. 'जीवित भगवान' को देखने और उनके दर्शन करने यहां लोग दूर-दूर से आते हैं. लोगों को यह भरोसा है कि जीवित भगवान उनकी मनोकामना जरूर सुनेंगे.
हम बात कर रहे हैं हेमाचला लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर की. यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1500 फीट ऊंचाई पर पुट्टकोंडा नाम की पहाड़ी पर बना हुआ है. ऐसा माना जाता है कि भगवान लक्ष्मी नरसिंह स्वामी की मूर्ति इस पहाड़ी पर स्वयं प्रकट हुई थी. मंदिर के रास्ते में हनुमान जी भी शिखांजनेय के रूप में विराजमान हैं, जिन्हें मल्लूर का रक्षक देवता कहा जाता है.
ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति का स्पर्श इंसान की त्वचा जैसा लगता है. मान्यता है कि यहां भगवान नरसिंह की मूर्ति निर्जीव पत्थर की नहीं, बल्कि 'जीवित' अवस्था में विराजमान है. इसलिए इन दिनों यह मंदिर अपनी अद्भुत मान्यताओं और रहस्यों के कारण चर्चा का केंद्र बना हुआ है.
मूर्ति दबाने पर निकलता है रक्त जैसा पदार्थ
स्थानीय भक्तों और मंदिर के पुजारियों का दावा है कि मूर्ति की बनावट इंसान की त्वचा जैसी कोमल है. यदि मूर्ति को उंगली से दबाया जाए तो वह मांस की तरह अंदर धंस जाती है और वहां से रक्त जैसा तरल पदार्थ निकलने लगता है. इस चमत्कार को देखने और भगवान के साक्षात दर्शन करने के लिए पूरे साल यहां भक्तों का तांता लगा रहता है.
यहां पूरी होती है हर मनोकामना
यहां दर्शन करने आई एक महिला ने बताया कि वह छत्तीसगढ़ से यहां दर्शन करने आई है. उन्होंने कहा कि यहां भगवान नरसिंह
स्वयं प्रकट हुए हैं. मंदिर में भगवान की प्रतिमा को छूने पर बिल्कुल मानव शरीर जैसा एहसास होता है. हमारा विश्वास है कि यहां मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है, इसीलिए जब भी समय मिलता है, हम सपरिवार यहां शीश झुकाने आते हैं.
4 हजार साल पुराना मंदिर
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह मंदिर करीब 4000 साल पुराना है. यहां भगवान की 10 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान है. पुजारी यह भी बताते हैं कि मूर्ति के पास जाने पर सांस लेने का अनुभव भी होता है. मंदिर के पास एक जलधारा भी बहती है, जो भगवान नरसिंह के चरणों से उत्पन्न मानी जाती है. इस जलधारा का नाम रानी रुद्रम्मा देवी ने 'चिंतामणि' रखा था. स्थानीय लोग इसे 'चिंतामणि जलपथम' कहते हैं. यह पानी पवित्र और औषधीय गुणों वाला माना जाता है. श्रद्धालु इस पानी में स्नान करते हैं और बोतलों में भरकर अपने साथ ले जाते हैं.
Input: Dharmendra Singh
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