Jagannath Temple Ratna Bhandar: ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर एक बार फिर चर्चा में है. इसकी वजह है मंदिर का प्रसिद्ध रत्न भंडार. कई सालों बाद अब इस खजाने की गिनती और पूरी जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है. बताया जा रहा है कि करीब 48 साल बाद यह साफ हो पाएगा कि रत्न भंडार में कितना सोना, चांदी और कीमती रत्न मौजूद हैं. इस खजाने को लेकर लोगों में हमेशा से उत्सुकता रही है, क्योंकि इसमें आभूषण और रत्न होने की मान्यता है. अब अधिकारियों की निगरानी में इसकी इन्वेंट्री यानी सूची तैयार की जा रही है, ताकि हर चीज का रिकॉर्ड सामने आ सके.
बुधवार दोपहर 12 बजे के बाद शुभ मुहूर्त में इस प्रक्रिया की शुरुआत की गई, जिसमें रत्न भंडार के अंदर रखी संपत्ति की जांच और गिनती की जा रही है. इससे मंदिर के इस रहस्यमयी खजाने के बारे में नई जानकारी सामने आने की उम्मीद है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर जगन्नाथ मंदिर में इतना सोना कहां से आया और किसने मंदिर को इतना सोना दान किया था?
मंदिर का निर्माण किसने कराया?
इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में शुरू हुआ था. गंग वंश के राजा अनंतवर्मन देव ने इसकी नींव रखी थी और बाद में अन्य शासकों ने इसे पूरा करवाया. आगे चलकर कई बार मंदिर में बदलाव भी हुए, जिससे यह आज के भव्य रूप में नजर आता है. इसकी वास्तुकला में कलिंग और द्रविड़ शैली का सुंदर मेल देखने को मिलता है.
दान से भरा खजाना
जगन्नाथ मंदिर के खजाने का बड़ा हिस्सा राजाओं और शासकों द्वारा दिए गए दान से आया है. माना जाता है कि मंदिर बनने के बाद राजा अनंगभीम देव ने भगवान को बड़ी मात्रा में सोना अर्पित किया था. इसके अलावा सूर्यवंशी राजाओं ने भी सोना, चांदी और कीमती रत्न मंदिर को समर्पित किए. 15वीं सदी में महाराजा कपिलेंद्र देव ने भी मंदिर को भरपूर दान दिया था. कहा जाता है कि वे हाथियों पर लदवाकर सोना-चांदी और अन्य कीमती वस्तुएं मंदिर तक लाए थे. इसी तरह सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने भी मंदिर के लिए सोना दान किया था और अपनी वसीयत में कोहिनूर हीरा देने की इच्छा जताई थी. इन दानों की परंपरा के चलते मंदिर में ‘सुना बेशा’ जैसी परंपरा शुरू हुई, जिसमें भगवान जगन्नाथ को सोने के आभूषणों से सजाया जाता है.
खजाने पर कई बार हमला भी हुआ
इतिहास में कई बार मंदिर के खजाने को लूटने की कोशिशें भी हुईं थी. अफगान और मुगल काल में यहां हमले हुए, जबकि बाद में मराठाओं और फिर अंग्रेजों का भी इस पर नियंत्रण रहा. हालांकि, कहा जाता है कि अंग्रेजों ने खजाने को सुरक्षित रखा और उसका रिकॉर्ड भी तैयार किया. कई कथाओं में यह भी बताया जाता है कि आक्रमणों के दौरान मंदिर की मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए छिपा दिया गया था. मंदिर के रत्न भंडार में दो हिस्से होते हैं- एक बाहरी कक्ष, जहां पूजा से जुड़ी चीजें रखी जाती हैं, और दूसरा अंदरूनी कक्ष, जहां असली खजाना सुरक्षित रखा जाता है.
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