बकरीद की कुर्बानी पर सियासी लड़ाई के बीच जान लीजिए इस्लाम क्या कहता है

बकरीद का त्योहार भारत में 28 मई को मनाया जाएगा. बकरीद के मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग जानवरों की कुर्बानी करते हैं. कुर्बानी को लेकर सियासत गर्मा गई है. ऐसे में इस्लाम में कुर्बानी की परंपरा कब से शुरू हुई और क्या नियम है जानिए?

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बकरीद पर कुर्बानी के लिए जानवर खरीदते मुस्लिम (Photo-PTI) बकरीद पर कुर्बानी के लिए जानवर खरीदते मुस्लिम (Photo-PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 22 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:59 PM IST

इस्लाम में प्रमुख रूप से दो बड़े त्योहार मनाए जाते हैं. एक ईद-उल-फित्र तो दूसरा ईद-उल-अजहा.  ईद-उल-फ़ितर को भारत में आम ज़ुबान में मीठी ईद या सेवई वाली ईद कहते हैं जबकि ईद-उल-अजहा को लोग बकरीद कहते हैं. इस मौके पर मुस्लिम समाज के लोग नमाज पढ़ने के साथ-साथ जानवरों की कुर्बानी भी करते हैं. 

भारत में बकरीद गुरुवार यानि 28 मई को मनाई जाएगी. बकरीद पर होने वाली जानवरों की कुर्बानी को लेकर पश्चिम बंगाल से यूपी और दिल्ली तक सियासी संग्राम छिड़ गया है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कुर्बानी के नियमों को काफी सख्त कर दिया गया है.

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उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल सहित तमाम राज्य सरकारों ने बकरीद के मौके पर गाइड लाइन जारी कर रखी है, मुस्लिम समुदाय किन जानवरों की कुर्बानी कर सकते हैं और किन जानवरों की कुर्बानी नहीं दे सकते हैं. ऐसे में इस्लाम क्या कहता और शरियत में कुर्बानी के नियम क्या हैं?

बकरीद क्या है और कब मनाई जाती है? 
इस्लाम में ईद-उल-अजहा या ईद-उज-जोहा को बकरीद कहते हैं. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक आखिरी महीने जिलहिज्जा की दसवीं तारीख को मनाया जाता है. यह त्योहार मुसलमान इस्लामिक पैगम्बर और हजरत मोहम्मद के पूर्वज हजरत इब्राहिम की कुर्बानी को याद में मनाते हैं. 

मुफ्ती मोहम्मद ओसामा नदवी के अनुसार इस्लाम में कुर्बानी का काफी बड़ा महत्व है. इस्लाम के मद्देनजर अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की वफादारी और मोहब्बत का इम्तिहान लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा था. हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को 80 साल की उम्र में औलाद नसीब हुई थी. ऐसे में उनके लिए सबसे प्यारे उनके बेटे हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम थे.

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हजरत इब्राहिम ने अपने जवान बेटे हजरत इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का फैसला किया. इब्राहीम ने जैसे ही अपने बेटे को कुर्बान करने वाले थे और बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनकी इस असीम निष्ठा को स्वीकार कर लिया और चमत्कारिक रूप से उनके बेटे की जगह एक दुंबे (भेड़/बकरे) को रख दिया था. तभी से इस्लाम में अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी देने की यह परंपरा शुरू हुई.

दुनिया भर में मुसलमान हजरत इब्राहीम की इसी परंपरा को याद करते हुए ईद-उल-अज़हा मनाते हैं. दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अजहा की नमाज पढ़ने के बाद किसी जानवर की कुर्बानी देते हैं. लाखों मुसलमान हर साल इसी मौके पर हज के लिए मक्का जाते हैं. बकरे की कुर्बानी हज का एक अहम हिस्सा है. कुर्बानी के लिए जानवर कैसा होगा इसकी भी ख़ास शर्ते हैं. 

किस मुसलमान को कुर्बानी करनी चाहिए
हजरत इब्राहीम की अदा अल्लाह को इतनी पसंद आई कि सभी साहिब-ए-निसाब पर कुर्बानी करना वाजिब कर दिया. कुर्बानी सिर्फ उसी व्यक्ति पर अनिवार्य है, जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो (साहिब-ए-निसाब हो). कर्ज लेकर या किसी पर बोझ बनकर कुर्बानी देने की इस्लाम इजाजत नहीं देता.

इस्लाम के मुताबिक वह शख्स साहिब-ए-निसाब है, जिस पर जकात देना फर्ज है. वह शख्स जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या फिर साढ़े 52 तोला चांदी है या फिर उसके हिसाब से पैसे है. आज की हिसाब से आपके पास डेढ़ लाख रुपये हैं तो इस पर कुर्बानी वाजिब है. इस तरह ईद-उल-अजहा के मौके पर कुर्बानी देना जरूरी बन जाता है. 

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कुर्बानी को लेकर इस्लाम में क्या शर्तें हैं
इस्लाम में जानवरों देने के लिए बेहद कड़े कानून बनाए हैं, जिनका उल्लंघन करने पर अल्लाह कुबूल नहीं करता है. जानवर पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए. वह अंधा, काना, लंगड़ा, बीमार या अत्यधिक कमजोर नहीं होना चाहिए. जानवर को किसी भी तरह का मानसिक या शारीरिक कष्ट देना मना है. एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को काटना या उसके सामने छुरी तेज करना पूरी तरह वर्जित है. 

मुफ्ती ओसामा कहते हैं कि इस्लाम में कुर्बानी केवल किसी बेजुबान जानवर की जान लेना मकसद नहीं है. मकसद यह देखना है कि इंसान अल्लाह की रज़ा (मर्जी) के लिए अपनी पसंदीदा चीज या अपनी दौलत का कितना हिस्सा त्यागने को तैयार है. यह अहंकार, लालच और स्वार्थ की 'कुर्बानी' का प्रतीक है. 

किन जानवरों की कुर्बानी करने की इजाजत
मुफ्ती ओसामा नदवी बताते हैं कि इस्लाम में भेड़, दुंबा, बकरा, भैंस, गाय, बैल और ऊंट की कुर्बानी की इजाजत है, लेकिन एक शर्त ये भी है कि ऐसे जानवरों की ही कुर्बानी करें, जिसकी हमें कानून इजाजत देता है. किसे देश में किसी जानवर के काटने पर प्रतिबंध है, तो उन जानवरों की कुर्बानी की इजाजत इस्लाम नहीं देता है. मुस्लिमों को उन जानवरों की कुर्बानी कतई नहीं करनी चाहिए, जिन प्रतिबंध है. इसीलिए भारत में गाय की कुर्बानी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि देश में प्रतिबंध है. 

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कुर्बानी के लिए अगर बकरा, भेड़ और दुंबा की कर रहे हैं, तो वो एक साल से कम का न हो, क्योंकि कुर्बानी के लिए जानवर का सेहतमंद होना जरूरी बताया गया है. भैंस की कुर्बानी कर रहे हैं तो वो दो साल का होना चाहिए. ऐसे ही ऊंट कम से कम 5 साल का होना चाहिए.
 
कुर्बानी के गोश्त को क्या करना चाहिए
ओसामा नदवी बताते हैं कि अगर किसी जानवर की कुर्बानी कर रहे हैं, उसके नियम जानना जरूरी है. बड़े जानवरों  सात हिस्से होते हैं तो छोटे जानवरों पर महज एक हिस्सा होता है. मतलब साफ है कि अगर कोई शख्स भैंस या ऊंट की कुर्बानी कराता है तो उसमें सात लोगों को शामिल किया जा सकता है तो वहीं बकरे की कराता है तो वो सिर्फ एक शख्स के नाम पर होगी.

कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से करने की शरीयत में सलाह है. एक हिस्सा गरीबों में तकसीम किया जाए, दूसरा हिस्सा अपने दोस्त अहबाब के लिए इस्तेमाल किया जाए और तीसरा हिस्सा अपने घर में इस्तेमाल किया जाए. गरीबों में गोश्त बांटना मुफीद है. इस्लाम में कुर्बानी के बाद मिलने वाले गोश्त को लेकर जो नियम बनाए गए हैं, वे पूरी तरह से सामाजिक न्याय और भाईचारे पर आधारित हैं.

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इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि साल में कम से कम एक दिन समाज का वह तबका भी सम्मान के साथ पौष्टिक भोजन (गोश्त) कर पाता है, जो गरीबी के कारण इसे रोज खरीद नहीं सकता. यह धार्मिक क्रिया को एक व्यापक सामाजिक कल्याण योजना में बदल देता है.
 

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