Baisakhi 2026 Date and Time: उत्तर भारत का प्रमुख पर्व बैसाखी इस साल 14 अप्रैल, मंगलवार यानी कल मनाया जा रहा है. यह त्योहार न केवल नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है. बल्कि इसका धार्मिक, ऐतिहासिक और ज्योतिषीय महत्व भी बहुत गहरा है. इसी दिन से सौर नव वर्ष की शुरुआत होती है और पंजाब समेत देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से सेलिब्रेट किया जाता है.
14 अप्रैल को बैसाखी और मेष संक्रांति का महासंयोग
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे मेष संक्रांति कहा जाता है. इसी दिन से हिंदू कैलेंडर के सौर मास की शुरुआत होती है.
शुभ मुहूर्त- बैसाखी तिथि 14 अप्रैल 2026 से शुरू होगी. पुण्य काल सुबह 06:15 बजे से शाम 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगा. माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पिछले जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है.
खालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक दिन
सिख धर्म के लिए बैसाखी का दिन सबसे बड़ा माना जाता है. 13 अप्रैल 1699 (इतिहास के कुछ पन्नों में 14 अप्रैल) को सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी. उन्होंने इसी दिन पंज प्यारों को अमृत चखाया था. इसी दिन सिंह व कौर की परंपरा भी शुरू की थी. यही कारण है कि इस दिन गुरुद्वारों में विशेष अरदास और नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है.
नई फसल और किसानों का उत्साह
बैसाखी मूल रूप से कृषि से जुड़ा त्योहार है. रबी की फसल (खासकर गेहूं) के पक जाने पर किसान भगवान का शुक्रिया अदा करने के लिए यह पर्व मनाते हैं. पंजाब और हरियाणा के खेतों में इस दिन भांगड़ा और गिद्दा की गूंज सुनाई देती है. किसान अपनी पहली फसल को भगवान को अर्पित करते हैं और आने वाले साल के लिए खुशहाली की प्रार्थना करते हैं.
पूजा विधि और परंपराएं
स्नान और दान: बैसाखी के दिन सुबह किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें. यदि संभव न हो तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें.
सूर्य पूजा: सूर्य देव को अर्घ्य दें, क्योंकि यह सौर वर्ष का पहला दिन है.
गुरुद्वारा दर्शन: इस दिन गुरुद्वारे जाकर 'कड़ा प्रसाद' ग्रहण करें. लंगर सेवा में भाग लें.
दान का महत्व: बैसाखी पर अनाज, पीले वस्त्र और गुड़ का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
भारत के अन्य राज्यों में बैसाखी का स्वरूप
बैसाखी को केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से मनाया जाता है. पश्चिम बंगाल में इसे नव वर्ष के रूप में मनाते हैं. असम में इसे रंगाली बिहू के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है. केरल में इसे विशु कहा जाता है, जहाँ भगवान विष्णु की पूजा होती है. तमिलनाडु में इसे तमिल नव वर्ष के तौर पर मनाया जाता है.
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