आने वाली 24 अप्रैल को माता बगलामुखी जयंती मनाई जाएगी. इसे जयंती नहीं बल्कि प्राकट्य (देवी के प्रकट होने का दिन) दिवस कहना अधिक सही है. वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को देवी प्रकट हुई थीं. पीले कपड़े पहने, सोने की तरह दमकता सुनहला पीला शरीर और मस्तक पर सुशोभित साफ पीला-सफेद चंद्रमा... देवी के स्वरूप की पहचान है. शुद्ध हल्दी की तरह की पीला कांति होने के कारण माता का एक नाम हरिद्रा भी है. इसके अलावा इन्हीं खासियत के कारण देवी को पीतांबरा भी कहते हैं. देवी को कई जगहों पर बगुले पर बैठे हुए या फिर बगुले जैसे चेहरे के साथ दिखाया जाता है.
लेकिन जो बात सबसे अधिक ध्यान खींचती है वो है देवी की एक्टिविटी. मूर्तियों-प्रतिमाओं में देवी को एक हाथ में किसी असुर की जीभ पकड़े दिखाया जाता है. ये असुर कौन है और उसकी जीभ क्यों पकड़ी गई?
इसे लेकर तंत्रसार में एक कहानी बताई जाती है.
कहते हैं कि एक साधक तांत्रिक था. उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान मांग लिया कि वह जो कुछ चाहकर, वही बात बोले तो उसकी इच्छा पूरी हो जाए. ब्रह्मा जी ने उसे वाक् सिद्धि का वरदान दे दिया. फिर उसने शिवजी को भी प्रसन्न कर लिया. इस तरह वह वरदान पाने के बाद निरंकुश हो गया. वह जो चाहता था पा लेता था. जिस किसी से उसकी दुश्मनी होती थी, उसका कुछ नुकसान करा देता था. उसकी ऐसी ही हरकतों से सारी सृष्टि में खलबली मच गई.
मदन बन गया मदनासुर
इस साधक तांत्रिक का नाम कई जगहों पर मदन बताया जाता है.वह साधक था, लेकिन अपने दुर्व्यवहार के कारण असुर बन गया. एक बार उसने कई साधुओं-तांत्रिकों को बंदी बना लिया और उनके तंत्र के फल उनसे मांगने लगा. वह अपना ही वर्चस्व हर जगह चाहता था, इसलिए वाक् सिद्धि वरदान का इस्तेमाल गलत तरीके से करने लगा. तब शिव भैरव रूप में प्रकट हुए, लेकिन ब्रह्माजी के वरदान के कारण उसका कुछ भी अहित नहीं कर सके.
वाक् सिद्धि वरदान का किया गलत प्रयोग
तब शिवजी ने देवी की स्तुति की. देवी अपने भयंकर और सौम्य दोनों रूपों में एक साथ प्रकट हुईं. उनके शरीर की पीली आभा से सभी हर्षित हुए लेकिन अगले ही पल मदन को चुनौती देने वाले भयंकर गर्जना से सभी डर गए. देवी अभी मदन की ओर बढ़ ही रही थीं कि उसने देवी बगलामुखी को देखकर उनके ऊपर अपने वरदान वाक् सिद्धी का प्रयोग करना चाहा, लेकिन इस समय देवी ने अपना आकार बढ़ाया और मदन के मुंह में हाथ डालकर उसकी जीभ खींच ली.
देवी बगलामुखी के हैं कई नाम
यानी जो वाक् सिद्धि वरदान देवी सरस्वती का सिद्ध किया हुआ वरदान और मंत्र है, उसे ही देवी के एक और रूप ने जीभ पर ही रोक दिया. इसीलिए देवी असुर की जीभ खींचती हुई दिखाई देती हैं.वाणी देवी वाली ही देवी जब वाणी का गलत तरीके से प्रयोग होते देखती है तो उसी पीताम्बरा, हरिद्रा, बगलामुखी ऐसे कई नामों से जाना जाता है.
असुर मदन की जीभ खींचना, एक प्रतीक है. आज समाज में लोग झूठ-फरेब की बातें बढ़-चढ़कर करते हैं. मुकदमे बाजी वगैरह में एक से एक झू़ठे तर्क गढ़ते हैं. माता इन सभी पर रोक लगाने वाली देवी हैं. उन्होंने मदीन की जीभ खींचकर उसकी जीभ पर ही लगाम लगा दी. इसीलिए पीताम्बरा माता को पीत सरस्वती भी कहते हैं.
तंत्र में देवी सरस्वती के तीन रूप प्रसिद्ध हैं.
नील सरस्वती जो कि ज्ञान, रहस्य और विज्ञान की देवी हैं. यही महाविद्या हैं.
श्वेत सरस्वती या शारदा देवी का दूसरा स्वरूप है जो हंसवाहिनी हैं और बुद्धि-विद्या देती हैं.
पीत सरस्वती जो कि भय को दूर करने वाली, भ्रम को हटाने वाली और फरेब की शत्रु हैं.
इसीलिए देवी बगलामुखी की पूजा कोर्ट-कचहरी के मुकदमे का निपटारा, शत्रु विजय और साजिश-षड्यंत्र दूर करने के लिए की जाती है.
विकास पोरवाल