मंगला, भोग, सप्तऋषि आरती... क्या है काशी विश्वनाथ में होने वाली पांच आरतियों का रहस्य और महत्व

काशी विश्वनाथ मंदिर में दिन में पांच बार होने वाली आरतियाँ शिवजी की दिनचर्या और पंचतत्वों का प्रतीक हैं. मंगला आरती से लेकर शयन आरती तक, ये पूजा केवल देवता की स्तुति नहीं बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं.

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 काशी विश्वनाथ मंदिर में दिन भर में पांच बार आरती होती है काशी विश्वनाथ मंदिर में दिन भर में पांच बार आरती होती है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 06 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:53 AM IST

महाशिवरात्रि के मौके पर शिव मंदिरों में भीड़ बढ़ जाती है. और जिन शिव मंदिरों में ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं वहां तो श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ होती है कि कहना ही क्या? उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मौजूद काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. इसके साथ ही आम धारणा है कि काशी शिव की नगरी है.

शिव यहां सिर्फ मंदिर में नहीं हैं, बल्कि यह उनका अपना घर है. इसलिए सिर्फ महाशिवरात्रि पर ही नहीं बल्कि आम दिनों में भी काशी का वैसा ही महत्व बना रहता है. पिछले भाग में आपने ये जाना कि शिवजी के प्रतीकों में पांच की संख्या की मौजूदगी बहुत मिलती है. अब और इसी कड़ी में जानिए कि आखिर काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली पांच आरतियों का क्या महत्व है?

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सामान्य सी बात जो सभी लोग जानते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर में पांच बार आरती होती हैं. आरती की ये परंपरा सिर्फ पूजा-पाठ का हिस्सा भर नहीं है. ये बाबा विश्वनाथ की एक पूरे दिन की दिनचर्या का हिस्सा है. काशी में शिव सिर्फ देवता भर नहीं हैं. वह यहां के 'राजा' हैं और पांच बार की आरती उनकी पांच बार की सेवा है.

यही वजह है कि यहां आरती केवल देवता की स्तुति नहीं है, बल्कि सुबह जागने से लेकर रात में उनके सोने तक की पूरी टाइमलाइन बन जाती है. इसके अलावा शिवजी की पांच आरती दुनिया के पंच तत्वों की आराधना के भी प्रतीक हैं. हर एक समय की आरती एक-एक तत्व और शिवजी के एक-एक स्वरूप के लिए होती है.

मंगला आरती का क्या है अर्थ?
इसकी शुरुआत मंगला आरती से होती है. इसका समय भोर में 3:00 से 4:00 बजे के बीच का है. इसे ब्रह्न मुहूर्त कहते हैं. माना जाता है कि इस वक्त शिवजी की आरती सभी देवता कर रहे होते हैं. भगवान शिव के जागने का समय होता है. इस समय उनके विग्रह (शिवलिंग) में अपार तेज होता है और यह ब्रह्मांड की ऊर्जा का प्रतीक बन जाता है. मंगला आरती काशी विश्वनाथ मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली आरती मानी जाती है. इस समय सृष्टि की चेतना सबसे शुद्ध और स्थिर मानी जाती है. 

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इस आरती में भगवान शिव को नींद से जगाया जाता है. यह मान्यता बताती है कि शिव यहां केवल तपस्वी नहीं, बल्कि संसार को चलाने वाले हैं, उसे अपनी ऊर्जा से सक्रिय करते हैं. इस वक्त सभी आत्माएं भी जागती हैं और मुक्ति पाती हैं. यह आरती आकाश तत्व के लिए होती है जो ब्रह्मांड की ऊर्जा से धरती की ऊर्जा को एक साथ मिला देती है.

योग और वेदांत परंपरा में ब्रह्म मुहूर्त को आत्मज्ञान के लिए सर्वोत्तम समय माना गया है. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) के अनुसार, इस समय शिव-स्मरण से व्यक्ति के भीतर छिपी चेतना जागृत होती है. स्कंद पुराण के काशी खंड में मंगला आरती के खास महत्व का जिक्र है. 

भोग आरती क्यों है जरूरी?
महादेव के जागरण के बाद उनके लिए दूसरी आरती है भोग. सुबह 11:15 से दोपहर 12:20 बजे तक होने वाली भोग आरती बताती है कि ये जीवन कर्म प्रधान है. कर्म की ऊर्जा भोजन से आती है, इसलिए भोजन भी ब्रह्न यानी परामात्मा है. श्रीकृष्ण भी गीता में अन्न को ब्रह्म यानी ईश्वर ही बताते हैं. तैत्तिरीय उपनिषद में भी अन्न को ब्रह्म कहा गया है. इसलिए परमात्मा शिव को भोग आरती के समय अन्न (नैवेद्य) चढ़ाया जाता है. यह आरती इस तथ्य को साफ करती है कि शिव संहारक होने से पहले पोषण के भी देवता हैं और ऊर्जा के भी. पालनकर्ता और अन्नदाता भी वही हैं.

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भोग आरती में भगवान को अन्न अर्पित कर भक्त यह मान लेता है कि उसका जीवन, श्रम और फल सब ईश्वर की कृपा से है. भोग आरती के बाद जो प्रसाद बांटा जाता है वह बताता है कि शिव की नजर पड़ते ही जाति, वर्ग या ऊंच-नीच का अंतर खत्म हो जाता है. फिर सभी शरीर वो बन जाते हैं जिन्हें अन्न से ही ऊर्जा मिलता है. शैव दर्शन में माना गया है कि जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही भोग पाता है. भोग आरती इसी सिद्धांत का प्रतीकात्मक रूप है. भोग आरती सिर्फ अन्न का चढ़ावा नहीं है, बल्कि कर्म के फल का प्रतीक है. 

संध्या या सप्तऋषि आरती है सबसे अधिक प्रसिद्ध
काशी विश्वनाथ मंदिर के दरबार की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक प्रसिद्ध आरती है संध्या को होने वाली सप्तऋषि आरती. माना जाता है कि इस दौरान सनातन वैदिक परंपरा के सप्तऋषि (अत्रि, भारद्वाज, गौतम, भृगु, कश्यप, वशिष्ठ, विश्वामित्र) यानी सात ऋषि खुद आकाश के तारों से उतरकर मंदिर में आते हैं और महादेव की आरती करते हैं. 

वैसे तो माना जाता है कि इस आरती की शुरुआत का इतिहास 750 साल पुराना है, लेकिन असल में इस आरती का पौराणिक वर्णन भी है. 750 साल से ये आरती बड़े पैमाने पर एक उत्सव की तरह हो रही है. जिसमें अलग-अलग सात गोत्र के  शास्त्री, पंडित या पुरोहित एक साथ मिलकर भगवान शिव की आरती करते हैं. सात गोत्र के पुरोहित इसलिए, क्योंकि इसके जरिए सारा संसार ही महादेव की आरती कर लेता है, क्योंकि संसार में जितने भी लोग हैं वह सभी इसी प्रमुख सात गोत्रों से पैदा हुए हैं. बाद में इन्हीं गोत्र से निकलकर दूसरे गोत्र बने. इस तरह शिवजी की सप्तृषि आरती भूमि तत्व का प्रतीक है. 

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सप्तऋषि आरती दिन और रात के मिलने के समय होती है. यह समय न पूरी तरह प्रकाश का होता है, न अंधेरे का और यही शिव का स्वरूप है. इस आरती में शिव महाकाल कहलाते हैं जो समय से परे होकर भी समय के साक्षी हैं. इस आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. मंत्र, शंखनाद और घंटियों की ध्वनि एक सामूहिक आध्यात्मिक ऊर्जा रचती है.

श्रृंगार आरती का क्या है सिद्धांत?

संध्या आरती के बाद भगवान की शृंगार आरती है. यह आरती शिवजी के उस स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें वह योगी होते हुए भी सुंदर हैं और सत्यम्, शिवम और सुंदरम् की साकार मूर्ति बन जाते हैं. यह आरती बताती है कि संसार का त्याग ही मुक्ति नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उससे आसक्त न होना ही शिव-तत्व है. शिव पुराण में कहा गया है कि शिव सौंदर्य और वैराग्य दोनों के अधिपति हैं. श्रृंगार आरती जीवन में संतुलन का संदेश देती है जो बताती है कि भोग और त्याग के बीच किस तरह संतुलन साधे रखना चाहिए.

शयन आरती, जहां विराम बन जाता है नव निर्माण की ऊर्जा
रात 10:30 से 11:00 बजे के बीच होने वाली आरती शयन आरती कहलाती है. शयन आरती दिन की अंतिम आरती है. इसमें भगवान शिव को शयन कराया जाता है और मंदिर बंद कर दिया जाता है.यह आरती मृत्यु या अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि विश्राम और फिर से नई ऊर्जा के साथ नए निर्माण का प्रतीक है. शिव का शयन यह बताता है कि संसार को भी संतुलन और नए निर्माण के लिए एक विराम चाहिए. यह विराम रुक जाना या थम जाना नही है, बल्कि नई ऊर्जा को संजो कर रखने का समय है. काम, भक्ति और जीवन—तीनों में विराम जरूरी है. शयन आरती मनुष्य को यह सिखाती है कि निरंतर कर्म के साथ विश्राम भी जरूर है.

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काशी विश्वनाथ मंदिर की ये पांच बार की आरती मिलकर शिव के बहाने संसार के पूरे जीवन-चक्र को सामने रखती हैं. जागरण, कर्म, चेतना, सौंदर्य और विश्राम. यही कारण है कि काशी केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सभ्यता का जीवित उदाहरण है.

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