अजा एकादशी पर करें भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा, ये होंगे फायदे

इस बार अन्नदा एवं अजा एकादशी का व्रत 18 अगस्त को है और इसी दिन वत्स द्वादशी भी है. जानिये, इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से क्या लाभ होगा...

अजा एकादशी
वंदना भारती
  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2017,
  • अपडेटेड 8:37 AM IST

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है. शास्त्रों के अनुसार आज ही के दिन राजा हरिश्चंद्र को यह व्रत करने उनका खोया हुआ परिवार और साम्राज्य वापस मिला था.

कहते हैं जिस कामना से कोई यह व्रत करता है, उसकी वह सभी मनोकामनाएं तत्काल ही पूरी हो जाती हैं. इस व्रत में भगवान विष्णु जी के उपेन्द्र रुप की विधिवत पूजा की जाती है. पंडित विनोद मिश्र के अनुसार इस बार अन्नदा एवं अजा एकादशी का व्रत 18 अगस्त को है और इसी दिन वत्स द्वादशी भी है तथा भगवान को प्रिय गाय और बछड़ों का पूजन करना चाहिए तथा उन्हें गुड़ और घास भी खिलानी चाहिए.

कैसे करे पूजन और व्रत-विधि...

- अजा एकादशी व्रत को जो व्यक्ति इस व्रत को रखना चाहते हैं उन्हें दशमी तिथि को सात्विक भोजन करना चाहिए ताकि व्रत के दौरान मन शुद्ध रहे.

- एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय के समय स्नान ध्यान करके भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक जलाकर, फलों तथा फूलों से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए.

- भगवान की पूजा के बाद विष्णु सहस्रनाम या फिर गीता का पाठ करना चाहिए.

- व्रती के लिए दिन में निराहार एवं निर्जल रहने का विधान है लेकिन शास्त्र यह भी कहता है कि बीमार और बच्चे फलाहार कर सकते हैं.

- सामान्य स्थिति में रात्रि में भगवान की पूजा के बाद जल और फल ग्रहण करना चाहिए. इस व्रत में रात्रि जागरण करने का बड़ा महत्व है.

- द्वादशी तिथि के दिन प्रातः ब्राह्मण को भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए. यह ध्यान रखें कि द्वादशी के दिन बैंगन नहीं खाएं.

क्या है व्रत कथा

सतयुग में सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा हरीशचन्द्र हुए जो बड़े सत्यवादी थे. एक बार उन्होंने अपने वचन की खातिर अपना सम्पूर्ण राज्य राजऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया. दक्षिणा देने के लिए अपनी पत्नी एवं पुत्र को ही नहीं स्वयं तक को दास के रुप में एक चण्डाल को बेच डाला.

अनेक कष्ट सहते हुए भी वह सत्य से विचलित नहीं हुए तब एक दिन उन्हें ऋषि गौतम मिले, जिन्होंने उन्हें अजा एकादशी की महिमा सुनाते हुए यह व्रत करने के लिए कहा.

राजा हरीश्चन्द्र ने अपनी सामर्थ्यानुसार इस व्रत को किया, जिसके प्रभाव से उन्हें न केवल उनका खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ, बल्कि परिवार सहित सभी प्रकार के सुख भोगते हुए अंत में वह प्रभु के परमधाम को प्राप्त हुए. अजा एकादशी व्रत के प्रभाव से ही उनके सभी पाप नष्ट हो गए तथा उन्हें अपना खोया हुआ राज्य एवं परिवार भी प्राप्त हुआ था.

अजा एकादशी का फल

पुराणों में बताया गया है कि जो व्यक्ति श्रृद्धा पूर्वक अजा एकादशी का व्रत रखता है उसके पूर्व जन्म के पाप कट जाते हैं और इस जन्म में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. अजा एकादशी के व्रत से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है और मृत्यु के पश्चात व्यक्ति उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करता है.

 

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