गांव में घुसे पैंथर का रेस्क्यू... 34 घंटे तक चला ऑपरेशन, दो महीने बाद लोगों ने ली राहत की सांस

राजस्थान के ब्यावर क्षेत्र में दो महीने बाद पैंथर को 34 घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद पकड़ लिया गया. खंडहरनुमा मकान में घुसे पैंथर की सूचना मिलते ही वन विभाग, पुलिस, सिविल डिफेंस और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर रेस्क्यू किया. लगातार लोकेशन बदलते इस पैंथर को बेहोश कर पिंजरे में कैद किया गया, इसके बाद लोगों ने राहत की सांस ली.

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34 घंटे तक रेस्क्यू के बाद पकड़ा जा सका पैंथर. (Photo: Screengrab) 34 घंटे तक रेस्क्यू के बाद पकड़ा जा सका पैंथर. (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • ब्यावर,
  • 15 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 12:26 PM IST

ब्यावर के काबरा गांव में पिछले दो महीने से पैंथर (तेंदुआ) ने आतंक मचा रखा था. अब उसे आखिरकार 34 घंटे की मशक्कत के बाद रेस्क्यू कर लिया गया. यहां खंडहरनुमा मकान में पैंथर के घुसने की सूचना ग्रामीणों ने वन विभाग और पुलिस प्रशासन को दी. पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई. सूचना मिलते ही वन विभाग, पुलिस और सिविल डिफेंस की टीम सक्रिय हो गई और मौके पर पहुंचकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया.

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इस दौरान ग्रामीणों ने भी टीम की हेल्प की. पैंथर को बाहर निकलने से रोकने के लिए मकान के मुख्य दरवाजे पर चारपाइयां लगाकर रास्ता बंद कर दिया, जिससे टीमों को रेस्क्यू प्लान बनाने में मदद मिली. हेड कॉन्स्टेबल सत्येंद्र सिंह अपनी खरवा नाका टीम के साथ वहीं पहुंच गए, इसके कुछ ही देर बाद जवाजा थाना से एएसआई जय सिंह और सिविल डिफेंस की यूनिट भी मौके पर पहुंची.

रेस्क्यू में सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि पैंथर लगातार अपनी लोकेशन बदलता रहा. पहले वह पुराने जर्जर मकान की दीवारों में छिपा रहा, फिर मौका पाकर करीब स्थित बगीचे में बने एक नाले में जाकर बैठ गया. इस वजह से रेस्क्यू में परेशानी आ रही थी. वन विभाग ने स्थिति का आकलन किया और पटाखों का इस्तेमाल कर पैंथर को सुरक्षित दिशा में पहुंचाने का तरीका अपनाया.

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रेस्क्यू ऑपरेशन में अहम मोड़ तब आया, जब वन विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार तंवर मौके पर पहुंचे. उन्होंने ट्रैंकुलाइजर गन की मदद से पैंथर को बेहोश करने का ऑपरेशन शुरू किया. पहला डार्ट झाड़ियों में जा लगा, लेकिन दूसरी बार फायर किया गया डार्ट सीधा पैंथर की पीठ पर लगा. लगभग 15 मिनट के भीतर पैंथर बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा. इस दौरान पूरी टीम ने संयम बनाए रखा और सुरक्षित दूरी से स्थिति को संभाला. रेंजर ओम प्रकाश टीम के साथ रहे.

डॉ. तंवर ने बताया कि पैंथर को ट्रैंकुलाइज करने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील होती है, जिसमें तीन अलग-अलग दवाइयों का उपयोग होता है. दो बेहोशी के लिए और एक होश में लाने के लिए. इन दवाइयों की लागत करीब 50 हजार रुपये तक आती है. उन्होंने बताया कि राजस्थान में जयपुर में केवल दो विशेषज्ञ शूटर ही ट्रैंकुलाइजर गन चलाने के लिए अधिकृत हैं.

पैंथर के सुरक्षित रूप से बेहोश होने के बाद उसे पिंजरे में डालकर वन विभाग की टीम ब्यावर नाका लेकर पहुंची. वहां उसके स्वास्थ्य की प्राथमिक जांच की गई और आगे वन क्षेत्र में रिलीज करने या जरूरी उपचार के लिए प्रक्रिया शुरू की गईं. इस रेस्क्यू के बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली, क्योंकि पिछले दो महीनों से पैंथर गांव क्षेत्र में घूम रहा था, जिससे डर बना हुआ था.

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रिपोर्ट: यतिन पीपावत

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