क्या ममता बनर्जी को अब एकला चलो रे के फैसले पर हो रहा होगा पछतावा?

ममता बनर्जी ने अकेले लोकसभा चुुनाव लड़ने का फैसला चाहे जिस रणनीति के तहत किया हो आज जरूर उनके लिए भारी पड़ रहा होगा. जॉब स्कैम में हाईकोर्ट के फैसले पर आज उनका साथ देने के लिए कोई नहीं है. मुस्लिम बहुल सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष से बीजेपी के लिए उम्मीद जग गई है.

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ममता बनर्जी की राह आसान नहीं रही ममता बनर्जी की राह आसान नहीं रही

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 30 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 8:40 AM IST

लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण से पहले बंगाल में इंडिया गठबंधन के दलों के बीच जबरदस्त सियासी युद्ध चल रहा है. चौथे चरण में मध्य पश्चिम बंगाल के चार निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होने वाला है. इंडिया गठबंधन की शुरूआती बैठकों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाली ममता बनर्जी ने बाद में राज्य की कुल 42 सीटों से अपने प्रत्याशी खड़े करने का फैसला ले लिया था. उन्होंने चुनावी सहमति नहीं बना पाने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था. अब उनके वही साथी दल उन पर जैसे हमले कर रहे हैं वो बीजेपी से भी खतरनाक हैं. वह भी जॉब स्कैम पर फैसला आने के बाद उनपर भ्रष्टाचार के आरोपों पर जैसे मुहर लग गई है. ऐसे समय में उनका साथ देने वाला अब कोई नहीं दिखाई दे रहा है. इंडिया गठबंधन के उनके साथी दल उनपर जमकर हमले कर रहे हैं. बनर्जी बार-बार इंडिया गठबंधन के अपने साथियों पर यह आरोप लगाती रही हैं कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल और कांग्रेस भाजपा के लिए काम कर रहे हैं. अब अधीर रंजन चौधरी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और मोहम्मद सलीम के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) भी मुख्यमंत्री और उनकी सरकार पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. उनके एकला चलो फैसले के चलते बंगाल की कई सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष दिखाई दे रहा है जो फाइनली बीजेपी को ही लाभ पहुंचाने वाला है. 

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मुस्लिम वोटर्स का बंटवारा

बंगाल में मुसलमानों का वोट बेहद अहम है. बंगाल में 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं. और करीब 16-17 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां वे निर्णायक भूमिका में हैं.पहले वाम मोर्चा ने मुस्लिम वोट बैंक के सहारे बंगाल में 34 साल तक राज किया अब तृणमूल के पीछे भी यही फोर्स है. पर बंगाल में इस बार माहौल बदला हुआ है. कोई कुछ बता नहीं सकता कि मुस्लिम वोट कहां जाएगा.ममता बनर्जी को लगता है कि मुसलमान इस बार भी उन्हीं का साथ देंगे पर कांग्रेस की न्याय यात्रा और वाम मोर्चे की सक्रियता के चलते उनके विश्वास को इस बार पलीता लग सकता है. वाममोर्चा के मुस्लिम वोट पाने के पीछे उनके भरोसे का कारण यह है पिछले नगर निकायों, पंचायत व विस उपचुनाव में पार्टी का अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन है. वाम दलों के इस अच्छे प्रदर्शन के पीछे मुस्लिम वोट का समर्थन ही है. कांग्रेस-वाममोर्चा में भी बंगाल में गठबंधन नहीं हो सका है, पर कुछ सीटों पर दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारे हैं. लेकिन कुछ सीटें ऐसी भी हैं, जहां दोनों एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंककर मैदान में हैं. जाहिर है कि इसका लाभ उठाने के लिए बीजेपी मौजूद है.

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फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी आईएसएफ ( इंडियन सिक्युलर फ्रंट) भी तृणमूल का नुकसान करने के लिए तैयार बैठी है.आईएसएफ ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस व वाममोर्चा के गठबंधन में शामिल होकर एक सीट जीतने में सफल रही थी. जबकि कांग्रेस और वाम दलों को एक भी सीट नहीं मिली थी. भाजपा-विरोधी सभी दलों ने मुस्लिम प्रत्याशियों पर कैंडिडेट बनाने पर विशेष जोर दिया है. ममता ने बेहरामपुर से पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान के अलावा भी तृणमूल ने कई मुस्लिम प्रत्याशी उतारे हैं. कांग्रेस ने भी बंगाल में कई मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जिसमें बंगाल में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष अजहर मलिक प्रमुख हैं. माकपा से सबसे प्रमुख मुस्लिम चेहरा तो खुद इसके राज्य अध्यक्ष मोहम्मद सलीम हैं, जो मुर्शिदाबाद से ताल ठोंक रहे हैं.

अकेले चुनाव लड़ना क्यों गलत फैसला था

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला चाहे जो सोचकर किया था पर अब जो स्थितियां बन रहीं हैं वो उनके अनुकूल नहीं हैं. मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों का ही उदाहरण ले लीजिए. दोनों जिलों में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक आबादी है जिनके वोट के लिए तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस नेतृत्व जी जान एक करके लगा हुआ है. भाजपा उम्मीद कर रही है कि मुस्लिम वोटों में विभाजन और मतदाताओं के ध्रुवीकरण से पार्टी को मदद मिलेगी.

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2019 के लोकसभा चुनाव में चार निर्वाचन क्षेत्रों में से, भाजपा ने मालदा उत्तर जीता था, कांग्रेस ने मालदा दक्षिण जीता था, जबकि तृणमूल ने जंगीपुर और मुर्शिदाबाद जीता था. इस बार बीजेपी ने न सिर्फ मालदा बल्कि मुर्शिदाबाद जिले में भी जोरदार अभियान चलाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने मालदा में चुनाव प्रचार किया है. दूसरी ओर बनर्जी और तृणमूल महासचिव अभिषेक बनर्जी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रचार कर रहे हैं. सीपीआई (एम) के सलीम मुर्शिदाबाद से तृणमूल के मौजूदा सांसद अबू ताहिर खान के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. जंगीपुर में मौजूदा सांसद और बीड़ी कारोबारी खलीलुर रहमान का मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद मुर्तजा हुसैन से है, जो कांग्रेस नेता अबू हेना के पोते हैं.

मालदा दक्षिण में कांग्रेस उम्मीदवार ईशा खान चौधरी अपने पारिवारिक सीट पर हैं. उनके पिता अबू हासेम खान चौधरी और उनके चाचा दिवंगत ए बी ए गनी खान चौधरी यहां से सांसद चुने जाते रहे हैं. कांग्रेस उम्मीदवार का मुकाबला तृणमूल के शाहनवाज अली रैहान से है, जो ऑक्सफोर्ड से विद्वान हैं. भाजपा ने यहां से इंग्लिश बाजार की मौजूदा विधायक रूप मित्रा चौधरी को मैदान में उतारा है. मालदा उत्तर में मौजूदा भाजपा सांसद खगेन मुर्मू और पूर्व आईपीएस अधिकारी और टीएमसी उम्मीदवार प्रसून बनर्जी के बीच मुकाबला हो रहा है. जाहिर है कि इन सीटों पर अगर इंडिया गुट एक साथ चुनाव लड़ रहा होता बीजेपी को यहां से एक सीट भी मिलने की उम्मीद नहीं रहती.

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जॉब स्कैम और अन्य भ्रष्टाचार के आरोपों पर साथ देने वाला कोई नहीं 

लगभग 26,000 स्कूली शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती रद्द करने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के पिछले सप्ताह के फैसले ने पश्चिम बंगाल में चल रहे लोकसभा चुनावों के बीच राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है, जिससे भाजपा को तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए और एक हथियार मिल गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को मालदा शहर में एक रैली में टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा, टीएमसी ने बंगाल में युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ किया. बड़े पैमाने पर भर्ती घोटाले के कारण लगभग 26,000 लोगों ने अपनी आजीविका खो दी. जिन लोगों ने नौकरी पाने के लिए कर्ज लिया और टीएमसी को दिया, वे अब सड़कों पर हैं. हालांकि ममता ने पलवार किया और बीजेपी को आदमखोर बाघों से तुलना की.पर कहीं न कहीं उनके लिए राज्य की जनता के बीच जवाबदेही मुश्किल हो रही है.

क्योंकि इस घोटाले में टीएमसी नेता और राज्य मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी की करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक की चल और अचल संपत्ति जब्त हुई थी. बनर्जी ने बाद में उन्हें राज्य मंत्रिमंडल और पार्टी से निष्कासित कर दिया. यानि एक तरह से मान लिया था कि उनकी सरकार से ही यह गलती हुई थी. इस मामले में राज्य शिक्षा विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारियों,टीएमसी विधायक और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य और टीएमसी विधायक जीबन कृष्ण साहा की भी गिरफ्तारी हुई थी.

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लोकसभा चुनाव के बीच में आया यह आदेश टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका है. इस मुद्दे पर बीजेपी और अन्य पार्टियों ने सरकार को घेरने की कोशिश की है और सीएम के इस्तीफे की मांग की है.जाहिर है कि अगर इंडिया गुट के साथ होतीं तो जरूर उनके साथ देने के लिए कुछ लोग होते. भाजपा के लिए लगे हाथ स्कूल नौकरियों घोटाले के अलावा कोयला और मवेशी तस्करी मामलों और कथित नगरपालिका नौकरियों और राशन वितरण घोटालों पर भी हमला करने का मौका मिल गया है.

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