‘हम हैं, इसीलिए आप सब सुरक्षित हैं. और अगर हम किसी दिन न रहे, अगर ऐसा दिन कभी आया, तो एक सेकंड लगेगा... जब एक समुदाय एकजुट होता है और घेर लेता है, तो एक सेकंड में '12 बजा देगा' (खत्म कर देगा). अगर आप अपना '13' नहीं बजवाना चाहते (अपना नुकसान नहीं चाहते), तो बीजेपी के इस दुष्प्रचार में गलती मत करना.’ -ममता बनर्जी (SIR विरोध में हुई मुसलमानों की एक सभा को संबोधित करते हुए)
ममता बनर्जी के इस ताजा बयान को तुष्टिकरण कहकर कांग्रेस और लेफ्ट भले कितनी ही आलोचना कर रहे हों. बीजेपी कितनी ही छाती पीट रही हो. ममता और टीएमसी को फर्क नहीं पड़ता. बंगाल चुनावों में मुस्लिम फैक्टर लंबे अरसे टीएमसी के लिए ट्रंप कार्ड बना हुआ है. और इस बार भी उसकी कोई काट नहीं दिखती. यह इसलिए दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक पॉलिटिक्स देशभर में असर खो बैठी है, सिवाय पश्चिम बंगाल के. 2011 से इस सूबे की सत्ता पर काबिज ममता ने ऐसा जादू चलाया है कि उन्हें बहुमत के लिए राज्य की महज 25 फीसदी सीटों पर मेहनत करनी होती है. बाकी 25 फीसदी (मुस्लिम बहुल आबादी वाली) सीटें वैसे ही झोली में आ गिरती हैं. बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27 फीसदी है.
2011 से पहले बंगाल का मुस्लिम वोटर मुख्य रूप से लेफ्ट फ्रंट (वामपंथियों) और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ था. ममता ने इसे दो हिस्सों में छीना. 2011 के चुनाव से पहले सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को हथियार बनाया. उन्होंने बार-बार कहा कि 34 साल के लेफ्ट राज में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो गई है. वे धीरे-धीरे मुसलमानों की आवाज बनीं. फिर आया सिंगूर-नंदीग्राम का घटनाक्रम. इन आंदोलनों में मारे गए या विस्थापित हुए लोगों में बड़ी संख्या मुस्लिम किसानों की थी. उनके साथ खड़ी हुईं और खुद को उनका 'रक्षक' साबित किया. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और लेफ्ट का कैडर धीरे-धीरे टीएमसी में शिफ्ट हो गया. उसके बाद मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी की हरियाली ममता की नीतियों, बयानों और उनके रणनीतिक झुकाव की देन है.
योजनाएं, इंवेट और भरोसा: दीदी का 'जादू'
ममता ने सिर्फ भाषण नहीं दिए, उन्होंने जमीनी स्तर पर ऐसी योजनाएं लागू कीं जिससे मुसलमानों का सीधा जुड़ाव पैदा हुआ. 2012 में इमामों के लिए मासिक भत्ते की शुरुआत करना एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था. हालांकि इस पर काफी विवाद हुआ, लेकिन इसने मुसलमानों के मजहबी नेतृत्व के बीच ममता की साख पक्की कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने मदरसा आधुनिकीकरण का कार्यक्रम शुरू किया और छात्रवृत्ति: 'ऐक्यश्री' जैसी स्कॉलरशिप और कन्याश्री का लाभ मुस्लिम लड़कियों तक जमकर पहुंचाया. 2026 के चुनाव में जाने से पहले ममता ने अंतरिम बजट में माइनॉरिटी अफेयर्स के नाम पर 5713 करोड़ रुपए अलॉट किए. इससे मुस्लिम समाज के भीतर एक नया मध्यम वर्ग तैयार हुआ है, जो टीएमसी का कट्टर समर्थक है.
इफ्तार और हिजाब: ममता का सिर पर पल्लू रखकर इफ्तार पार्टियों में जाना या मंच से दुआएं पढ़ना महज 'इवेंट' नहीं था. यह उस समुदाय को सम्मान (Dignity) देने का तरीका था, जिसे बीजेपी 'तुष्टीकरण' कहती है. मुस्लिम वोटर को लगा कि पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके रिवाजों को खुलकर अपना रही है. कई मौके ऐसे आए, जब हिंदू और मुस्लिम त्योहारों पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ. ऐसे समय में ममता पर भले आरोप लगे हों कि उन्होंने मुस्लिम पक्ष की तरफ झुकाव रखा, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा.
बीजेपी का उभार: ममता के लिए 'वरदान'
ममता बनर्जी के लिए बीजेपी का बंगाल में प्रमुख विपक्षी दल बनना सियासी तौर पर फायदेमंद रहा. जब बीजेपी ने 'जय श्री राम' और एनआरसी (NRC) का मुद्दा उठाया, तो मुस्लिम वोटरों के पास ममता के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. वे और बड़ी तादाद में ममता की ओर चले गए. ममता ने इस डर को बखूबी भुनाया. उनका हालिया बयान इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वे कह रही हैं ‘हम हैं, इसीलिए आप सब सुरक्षित हैं’. वह साफ संदेश देती हैं कि अगर टीएमसी कमजोर हुई, तो एनआरसी और सीएए (CAA) जैसी तलवारें लटकने लगेंगी. बीजेपी जितना ज्यादा ध्रुवीकरण की कोशिश करती है, मुस्लिम वोटर उतना ही मजबूती से ममता के पीछे गोलबंद हो जाता है.
कहा जाता है कि टीएमसी ने एक बड़ी ही रणनीति के साथ बीजेपी का 'डर' बनाए रखते हुए लेफ्ट को मुख्य विपक्षी पार्टी की दहलीज से भी दूर रखा. वहीं, लीडरशिप क्राइसिस से जूझ रही लेफ्ट पार्टियों को उभार को कोई मौका ही नहीं मिल पाया. क्योंकि कुछ साल पहले तो ये साफ था कि अगर ममता को बंगाल में कोई टक्कर दे सकता है तो वो लेफ्ट ही है. पर बीजेपी के उभार ने धीरे-धीरे इस धारणा को कमजोर कर दिया.
2012 से अब तक का ट्रेंड: एकतरफा प्यार
अगर हम आंकड़ों को देखें, तो मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी की जीत का स्ट्राइक रेट हैरान करने वाला है. 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोट कांग्रेस और टीएमसी के बीच बंटा था, फिर भी ममता को बढ़त मिली. लेकिन, 2021 का चुनाव गेम चेंजर साबित हुआ. बीजेपी की आक्रामक लहर को देखते हुए बंगाल के मुसलमानों ने कांग्रेस और आईएसएफ (ISF) को पूरी तरह किनारे कर दिया. राज्य की करीब 85 सीटों पर, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं, 75 सीटें टीएमसी ने जीत लीं. जिसमें मुर्शिदाबाद की 22 में से 20, मालदा की 12 में से 8, उत्तर दिनाजपुर की 9 में से 7, बीरभूम की 11 में से 10 और दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटें टीएमसी को मिलीं. कांग्रेस लेफ्ट गायब हो गए. बीजेपी कुछ सीटें जीती लेकिन मुस्लिम इलाकों में पूरी तरह फेल.
2026 की रणनीति: '75 सीटों का गणित'
2026 के चुनाव के लिए ममता ने अपनी फील्डिंग सजा ली है. उन्हें पता है कि 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए. इनमें से करीब 75 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इतनी ज्यादा है कि वहां बीजेपी का जीतना नामुमकिन जैसा है. ऐसे में ममता का गणित सीधा है- 75 सीटें मुस्लिम वोटरों के दम पर 'पक्की' करो, और बाकी की 75 सीटें महिला वोटरों और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के जरिए हासिल कर लो. ममता के सामने कहीं हुमायूं कबीर और ओवैसी जैसे छुटपुट चैलेंज आ सकते हैं. लेकिन, उनका फिलहाल खास असर नहीं दिखता.
कड़वा सच: क्या यह सिर्फ राजनीति है?
आलोचक कहते हैं कि ममता ने मुसलमानों को सिर्फ 'वोट बैंक' बनाकर रखा है, लेकिन हकीकत यह है कि बंगाल का मुस्लिम वोटर ममता को अपनी 'ढाल' मानता है. ममता ने एक ऐसा नैरेटिव सेट कर दिया है कि अगर टीएमसी गई, तो मुसलमानों का वजूद खतरे में पड़ जाएगा. उनका यह कहना कि ‘अगर हम न रहे, तो एक सेकंड लगेगा 12 बजाने में’, डर और सुरक्षा का वह मिश्रण है जिसके दम पर आसानी से ध्रुवीकरण किया जा सकता है.
ममता बनर्जी ने पिछले 15 सालों में मुस्लिम राजनीति को 'वोट' से बदलकर 'अस्तित्व' की लड़ाई बना दी है. आज बंगाल में बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक एक ऐसी दीवार की तरह खड़ा है, जिसे ढहाना फिलहाल किसी भी विपक्षी दल के लिए मुमकिन नहीं दिखता. 2026 के लिए ममता की राह इसी 'मुस्लिम किलेबंदी' के भरोसे आसान नजर आती है.
धीरेंद्र राय