हिंदू धर्म में शंकराचार्य का पद आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों (ज्योतिर्मठ, द्वारका, पुरी और शृंगेरी) के प्रमुखों का है, जो अद्वैत वेदांत और सनातन धर्म के संरक्षक माने जाते हैं. हालांकि यह पद मुख्य रूप से धार्मिक है, लेकिन आधुनिक भारत में यह बार-बार राजनीतिक विवादों का केंद्र बनता रहा है. इन विवादों में उत्तराधिकार झगड़े, धार्मिक बयानों का राजनीतिक उपयोग, सरकारी हस्तक्षेप और राजनीतिक दलों (जैसे BJP, कांग्रेस) से जुड़ाव प्रमुख हैं. ये विवाद धार्मिक स्वायत्तता बनाम राजनीतिक प्रभाव के सवाल उठाते हैं. हिंदू धर्म की सबसे बड़ी पदवी को हासिल करने और उसे बचाए रखने के नाम पर शंकराचार्य पद राजनीतिक साजिश, बदले की कार्रवाई के लिए राजनेताओं के साथ देते और लेते रहे हैं . राजनेताओं ने उसके बदले अपने वोट बैंक में बढ़ोतरी की चाह रखी है. आइये देखते हैं कि शंकराचार्य का पद कब कब राजनीतिक मुद्दे में बदल गया. और ऐसे कौन से कारण रहे हैं जिसके चलते संतों को राजनीतिज्ञों को जरूरत पड़ने लगी.
1-ज्योतिर्मठ पीठ पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का माघ मेला विवाद
सबसे पहले ताजे विवाद से शुरू करते हैं. जो शंकराचार्य पद को राजनीतिक हथियार बनाने का उदाहरण है. 18-19 जनवरी 2026 को प्रयागराज माघ मेला में मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को त्रिवेणी संगम में राजकीय स्नान (पालकी में जाने) से रोका गया. पुलिस ने भीड़ और अनुमति का हवाला दिया, लेकिन उनके शिष्यों के साथ झड़प हो गई.
जाहिर है कि विवाद बढने पर मेला प्रशासन ने 20 जनवरी को 24 घंटे का नोटिस जारी किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 2022 आदेश का हवाला देकर पूछा कि वे 'शंकराचार्य' टाइटल कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं (क्योंकि उत्तराधिकार मामला कोर्ट में है). स्वामी ने अनशन शुरू कर दिया और चैलेंज किया कि न मुख्यमंत्री, न राष्ट्रपति शंकराचार्य तय कर सकते हैं. इसके बाद मामले को लेकर राजनीति शुरू हो गई. कांग्रेस उत्तर प्रदेश सरकार पर हमलावर हो गई. पार्टी ने इसे BJP का धर्मद्रोह और साधुओं का अपमान करना बताया. कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि स्वामी को निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा, केदारनाथ में '228 किलो सोने की चोरी' और COVID में गंगा में शवों पर सवाल उठाए थे.
BJP ने इसे प्रशासनिक मुद्दा कहा, लेकिन स्वामी के समर्थकों ने इसे राजनीतिक साजिश बताया. दिलचस्प यह है कि 2023 में इन्हीं शंकराचार्य ने राहुल गांधी को 'मनुस्मृति अपमान' पर हिंदू धर्म से बहिष्कृत किया था. लेकिन अब कांग्रेस उनका समर्थन कर रही है. यह राजनीतिक अवसरवाद का चरम बिंदु है.
2- राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा विवाद (2024)
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा (22 जनवरी 2024) पर ज्योतिर्मठ और पुरी शंकराचार्य (स्वामी निश्चलानंद सरस्वती) ने विरोध किया. उन्होंने कहा कि अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रों के खिलाफ है, और तारीख राजनीतिक (चुनाव से पहले) चुनी गई. उन्होंने निमंत्रण ठुकराया और कहा कि यह राजनीतिक हिंदुओं को खुश करने के लिए है, धार्मिक नहीं है. BJP और VHP नेताओं ने इस मुद्दे पर इन्हें बागी शंकराचार्य कहा, जबकि कांग्रेस ने उनका समर्थन किया. विवाद ने चुनावी राजनीति को उजागर किया. BJP ने इसे हिंदुत्व की जीत बताया, लेकिन शंकराचार्यों ने अधूरी इमारत में प्रतिष्ठा को नियमों का उल्लंघन कहा. कुछ ने इसे RSS-VHP बनाम पारंपरिक शंकराचार्यों का टकराव बताया.
3. ज्योतिर्मठ उत्तराधिकार विवाद (1953 से)
1953 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की मौत के बाद उत्तराधिकार पर झगड़ा शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. विभिन्न दावेदार (स्वामी स्वरूपानंद, वासुदेवानंद, अविमुक्तेश्वरानंद) हैं. सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है (2020 से), जहां पट्टाभिषेक पर रोक है.
RSS और VHP ने कुछ दावेदारों का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस और अन्य दलों ने दूसरे का. जाहिर है कि मामला पूरा राजनीतिक हो गया है. स्वामी स्वरूपानंद (मृत्यु 2022) ने दो पीठों पर दावा किया, जिसने VHP से टकराव पैदा किया. 2015 में अखिलेश यादव सरकार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लाठीचार्ज किया, जिस पर उन्होंने चुप्पी साध ली.
4- कांची शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी (2004): राजनीतिक बदला और अपमान
कांची पीठ के जयेंद्र सरस्वती को संकररामन हत्या मामले में गिरफ्तार किया गया.गिरफ्तारी दिवाली के दिन हुई, जो हिंदू संतों का अपमान माना गया. बाद में वे (2013) निर्दोष साबित हुए.जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी के लिए जयललिता (AIADMK) सरकार पर राजनीतिक बदले का आरोप लगा. DMK और AIADMK ने इसे चुनावी हथियार बनाया. सुब्रमण्यम स्वामी ने इसे RSS विरोध की वजह से अपना RSS-विरोध छोड़ने का कारण बताया।
ये विवाद शुद्ध राजनीतिक हैं क्योंकि इनमें धार्मिक नियमों का हवाला देकर राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है. BJP को हिंदुत्व का चेहरा बनाने में शंकराचार्यों का विरोध चुनौती देता है, जबकि कांग्रेस इसे साधुओं का अपमान बताकर फायदा उठाती है. कुल मिलाकर, ये विवाद हिंदू धर्म की राजनीतिकरण को उजागर करते हैं, जहां शंकराचार्य पद की गरिमा प्रभावित हो रही है.
5. भाजपा-मोदी विरोधी होती चली गई शंकराचार्य की सक्रियता
शंकराचार्य अक्सर धार्मिक मुद्दों (राम मंदिर, गौ-रक्षा, CAA, COVID में गंगा शव) पर बोलते हैं, जो तुरंत राजनीतिक रंग ले लेते हैं. 2024 राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर ज्योतिर्मठ और पुरी शंकराचार्यों ने विरोध किया (अधूरा मंदिर, अशुभ तिथि), जिसे BJP ने राजनीतिक विरोध कहा, जबकि कांग्रेस ने धार्मिक सत्य बताया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 2019 में मोदी के खिलाफ वाराणसी से उम्मीदवार खड़ा करने की कोशिश की, जो साफ तौर पर राजनीतिक कदम था.
धर्म से हटकर राजनीतिक अहम् और उत्तराधिकार में फंसी पदवी
आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में चार पीठ स्थापित कीं थीं.ये पीठें (ज्योतिर्मठ, द्वारका, पुरी, श्रृंगेरी) मूल रूप से आध्यात्मिक केंद्र थे. बाद में विभिन्न शास्त्रों और तर्कों के आधार पर कई और पीठ बनते गए, जाहिर है कि उनके शंकराचार्य भी सामने आए. जितने ही अधिक शंकराचार्य हुए उतना ही विवाद भी बढ़ता गया. धीरे-धीरे राजनीतिक शक्तियों से साथ तालमेल बैठाने की जद्दोजहद, उत्तराधिकार झगड़ों और धार्मिक मुद्दों के राजनीतिकरण से यह पद विवादों का केंद्र बन गया. सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ. इसके कुछ कारण निम्न रहे हैं.
1- ऐतिहासिक और राजनीतिक संरक्षण
भारतीय इतिहास के मध्यकाल से शंकराचार्य के पीठों को राजाओं (विजयनगर साम्राज्य, मराठा, ब्रिटिश) का संरक्षण मिलता था. आधुनिक भारत में भी राजनेता भी पीठों से किस न किसी तरह जुड़े रहे. कांची शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की 2004 गिरफ्तारी (संकररामन हत्या केस) को जयललिता सरकार का राजनीतिक बदला माना गया. ये उदाहरण दिखाते हैं कि पीठें राजनीतिक संरक्षण और प्रभाव का माध्यम बन गईं हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती अकसर कांग्रेस सरकारों के पक्ष में बयान देते थे, जिसके लिए कई बार उन्हें ‘कांग्रेसी शंकराचार्य‘ तक कह दिया जाता था.
2- उत्तराधिकार झगड़ों में सरकारी/कानूनी हस्तक्षेप
शंकराचार्य पद पर उत्तराधिकार अक्सर अदालतों में जाता है, जहां सरकारें (राज्य या केंद्र) पक्ष लेती हैं या प्रोटोकॉल देती हैं. ज्योतिर्मठ का 1953 से चला विवाद (69+ वर्ष) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, पट्टाभिषेक पर रोक है. जनवरी 2026 के माघ मेला विवाद में यूपी सरकार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को 'शंकराचार्य' की टाइटल का इस्तेमाल करने पर SC के आदेश का हवाला देकर नोटिस जारी किया है. जिसे कांग्रेस ने साधु संतों का अपमान बताया है. कांग्रेस नेताओं ने ऐसे बयान जारी किए जिससे यह लगा कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई है, क्योंकि स्वामी ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का विरोध किया था. ऐसे झगड़ों में राजनीतिक दल (BJP, कांग्रेस) अपना फायदा देखते हैं. एक तरफ हिंदुत्व रक्षक का नरैटिव तैयार होता है तो दूसरी तरफ साधुओं रे अपमान का नैरेटिव तैयार किया जाता है.
3- व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और राजनीतिक सक्रियता
कुछ शंकराचार्य जैसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, छात्र राजनीति से आए हैं और सक्रिय रूप से राजनीतिक मुद्दों पर बोलते हैं. उन्हें अपनी गद्दी भी सुरक्षित रखनी है. सुप्रीम कोर्ट उनके पदवी पर भी सवाल खड़ा कर चुका है. जाहिर है कि उन्हें अपने मान मर्यादा बचाने के लिए राजनीतिक संरक्षण की जरूरत होगी. इसी तरह पूरे देश में करीब दर्जन भर शंकराचार्य बन चुके हैं. कई दर्जन तथाकथित संत लोग लगे हुए हैं. इसके पहले महामंडलेश्वर बनने के लिए लोग राजनीतिज्ञों का शरण लेते हैं. इसके अलावा हर मठ में कहीं उत्तराधिकार विवाद है तो कहीं जमीन जायदाद पचड़े में है. जाहिर है कि उन्हें राजनीति संरक्षण की जरूरत पड़ती ही है.
संयम श्रीवास्तव