राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर सबसे लंबे समय से जो सवाल उठते रहे हैं, उनमें एक केंद्रीय सवाल जाति का रहा है. क्या संघ के शीर्ष पदों पर पहुंचने में जाति कोई भूमिका निभाती है? क्या संघ ब्राह्मणवादी ढांचे से बाहर निकल पाया है? क्या एससी एसटी समाज से कोई व्यक्ति सर संघचालक बन सकता है? इन सवालों का जवाब संघ अक्सर अपने काम के उदाहरणों से देता रहा है, सीधे मंच से नहीं. लेकिन मुंबई में RSS के शताब्दी समारोह में आयोजित एक प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में सर संघचालक मोहन भागवत ने इन तमाम सवालों को टालने के बजाय विस्तार से समझाया. उन्होंने न सिर्फ यह बताया कि संघ में नियुक्ति कैसे होती है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि निवृत्ति यानी रिटायरमेंट का सिद्धांत क्या है और उसमें व्यक्ति की इच्छा से ज्यादा संगठन का निर्णय क्यों महत्वपूर्ण होता है.
संघ प्रमुख का यह जवाब ऐसे समय में आया है, जब देश में जाति को लेकर राजनीतिक बहस तेज है. जाति जनगणना से लेकर प्रतिनिधित्व तक और सामाजिक न्याय से लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण तक, हर मुद्दे के केंद्र में जाति है. ऐसे माहौल में संघ प्रमुख का यह कहना कि सर संघचालक बनने के लिए न ब्राह्मण होना योग्यता है और न एससी एसटी होना अयोग्यता, अपने आप में एक सीधा और साफ राजनीतिक-सामाजिक संदेश है.
क्या है संघ में निर्वाचन की प्रक्रिया?
मोहन भागवत ने सबसे पहले यह समझाया कि संघ में नियुक्ति और निर्वाचन की प्रक्रिया क्या है. उन्होंने कहा कि संघ के अधिकतर पदों पर तीन साल में एक बार निर्वाचन होता है. जनरल सेक्रेटरी यानी सरकार्यवाह से लेकर क्षेत्र, प्रांत, विभाग और जिला स्तर के संघचालकों तक, सभी के लिए एक तय निर्वाचन व्यवस्था है. यह भी बताया गया कि मतदाता वर्ग भी स्वयंसेवकों में से ही चुना जाता है. एक निश्चित संख्या में स्वयंसेवकों पर प्रांत प्रतिनिधि होते हैं और प्रांत प्रतिनिधियों के ऊपर अखिल भारतीय प्रतिनिधि होते हैं. यही अखिल भारतीय प्रतिनिधि संघ के शीर्ष पदों का चुनाव करते हैं.
इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक अपवाद है और वह है सर संघचालक का पद. मोहन भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि सर संघचालक का चयन चुनाव से नहीं होता. वर्तमान सर संघचालक ही अगले सर संघचालक की नियुक्ति करते हैं. यह व्यवस्था किसी व्यक्ति की ताकत या प्रभाव का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसे उन्होंने श्रद्धा का विषय बताया. उनके शब्दों में यह व्यक्ति का मान नहीं, बल्कि आसन का मान है. यानी पद की गरिमा व्यक्ति से बड़ी मानी जाती है.
संघ में क्या है रिटायरमेंट की प्रक्रिया?
इसके बाद उन्होंने निवृत्ति के सवाल पर विस्तार से बात की. संघ में रिटायरमेंट को लेकर आम धारणा है कि 75 वर्ष की उम्र के बाद पद छोड़ना अनिवार्य होता है. मोहन भागवत ने इसे आंशिक सच बताया. उन्होंने कहा कि संघ में कार्य से कभी निवृत्ति नहीं होती. व्यक्ति जीवन भर काम करता है, जब तक शरीर साथ देता है. लेकिन दायित्व यानी पद से निवृत्ति की एक परंपरा जरूर है, जिसमें सामान्य तौर पर 75 वर्ष के बाद बिना दायित्व के काम करने की सोच है. लेकिन यह भी स्वचालित नहीं है. इसके लिए संघ की अनुमति जरूरी होती है.
अपने उदाहरण से उन्होंने यह बात और स्पष्ट की. उन्होंने बताया कि 75 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वयं दायित्व छोड़ने की बात रखी, लेकिन संगठन ने उनसे काम जारी रखने को कहा. यानी संघ में यह तय नहीं होता कि कोई व्यक्ति कब पद छोड़ेगा, बल्कि यह संगठन की जरूरत और निर्णय पर निर्भर करता है. दायित्व से हटने के बाद भी व्यक्ति संघ का काम करता रहता है, मित्रता बनाता है, अपने आचरण से सिखाता है और समाज में सक्रिय रहता है.
क्या एससी-एसटी से बन सकता है संघ प्रमुख?
सबसे अहम और संवेदनशील सवाल जाति का था. क्या एससी एसटी समाज का व्यक्ति सर संघचालक बन सकता है. मोहन भागवत ने इस पर कोई घुमावदार जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा कि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होने के कारण सर संघचालक नहीं बनता. जो हिंदू है और योग्य है, वही सर संघचालक बन सकता है. एससी एसटी समाज से होना कोई अयोग्यता नहीं है और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है. संघ में नियुक्ति का आधार जाति नहीं, बल्कि योग्यता और उपलब्धता है.
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संघ के शुरुआती दौर में पदों पर एक ही जाति के लोग ज्यादा दिखते थे. लेकिन इसके पीछे जातिवाद नहीं, बल्कि भौगोलिक कारण थे. संघ की शुरुआत जिस बस्ती में हुई, वह ब्राह्मण बहुल थी. इसलिए शुरुआती पदाधिकारी स्वाभाविक रूप से वहीं से आए. जैसे जैसे संघ का विस्तार भौगोलिक रूप से हुआ, शहरों की हर बस्ती और गांवों के हर मंडल तक पहुंचा, वैसे वैसे सभी जातियों और वर्गों के लोग जुड़ते गए. आज अखिल भारतीय स्तर पर संघ में किसी एक जाति का वर्चस्व नहीं है. सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है.
संघ आगे बढ़कर क्यों स्पष्ट कर रहा है अपने विचार?
यह जवाब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ पहले इस तरह मंच से आगे बढ़कर सवालों के जवाब नहीं देता था. उसकी कार्यशैली पर्दे के पीछे वाली ही रही है. लेकिन भाजपा के लंबे समय से केंद्र में रहने के बाद संघ यह समझ रहा है कि उसकी भूमिका केवल संगठनात्मक नहीं रही. उसके विचार और कामकाज का सीधा असर सार्वजनिक विमर्श पर पड़ता है. समाज के भीतर संघ को लेकर जिज्ञासा भी है और भ्रम भी. ऐसे में बिना किसी दबाव के, खुलकर सवालों का जवाब देना संघ की जवाबदेही का हिस्सा बनता जा रहा है. संघ प्रमुख इसीलिए जोर देते हैं कि आप आइये और संघ को भीतर से देखिए. एक चम्मच चीनी खाने से पता चलेगा कि वो मीठी है.
मोहन भागवत का यह संवाद उसी बदले हुए रुख का संकेत है. यह केवल जाति के सवाल का जवाब नहीं है, बल्कि यह बताने की कोशिश है कि संघ खुद को कैसे देखता है और समाज उसे कैसे समझे. मौजूदा राजनीतिक माहौल में, जहां जाति को अक्सर सत्ता की चाबी की तरह इस्तेमाल किया जाता है, वहां संघ प्रमुख का यह कहना कि योग्यता और उपलब्धता ही एकमात्र कसौटी है, बहस को एक अलग दिशा देता है. यह जवाब हेडलाइन से आगे जाकर उस ढांचे को समझाता है, जिसके भीतर संघ खुद को परिभाषित करता है.
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने RSS से जुड़े हर भ्रम का सिलसिलेवार जवाब दिया-
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