भारत जोड़ो यात्रा से किया मेकओवर, शहजादे वाली छवि भी तोड़ी... क्या चल पड़ी राहुल गांधी की 'मोहब्बत की दुकान'?

राहुल गांधी अपनी खास सफेद टी-शर्ट पहनकर सितंबर 2022 से जनवरी 2023 तक 12 से ज़्यादा राज्यों और 4,500 किलोमीटर की यात्रा पर निकले. पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने भगवा पार्टी और उसकी हिंदुत्व की राजनीति पर हमला बोला. कोच्चि से लेकर इंदौर तक और नांदेड़ से लेकर श्रीनगर तक उन्होंने बीजेपी पर भारत को बांटने और नफरत फैलाने का आरोप लगाया.

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राहुल गांधी की छवि में बड़ा बदलाव हुआ है राहुल गांधी की छवि में बड़ा बदलाव हुआ है

मौसमी सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 06 जून 2024,
  • अपडेटेड 8:35 PM IST

करीब दो साल पहले जब राहुल गांधी कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा पर निकले थे, तो उनके राजनीतिक विरोधियों ने उनका मजाक उड़ाया था. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने उन पर कटाक्ष करते हुए दावा किया था कि राहुल गांधी का देश को एकजुट करना विडंबना है, क्योंकि वे उस गुट का हिस्सा हैं, जिसे वे “टुकड़े टुकड़े गैंग” कहते हैं.

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राहुल गांधी अपनी खास सफेद टी-शर्ट पहनकर सितंबर 2022 से जनवरी 2023 तक 12 से ज़्यादा राज्यों और 4,500 किलोमीटर की यात्रा पर निकले. पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने भगवा पार्टी और उसकी हिंदुत्व की राजनीति पर हमला बोला. कोच्चि से लेकर इंदौर तक और नांदेड़ से लेकर श्रीनगर तक उन्होंने बीजेपी पर भारत को बांटने और नफरत फैलाने का आरोप लगाया.

जब वे हर रोज लगभग 24 किलोमीटर पैदल चलकर ऑटो चालकों, किसानों, छात्रों और दिहाड़ी मजदूरों से मिलते थे, तो उन पर राजनीतिक हमले और विवाद तेजी से बढ़ते थे.  इसके बाद लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की. ये यात्रा पूर्वी भारत से पश्चिमी भारत में की गई. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि लोकसभा में भाजपा का 272 सीटों का बहुमत वाला जादुई आंकड़ा पार न कर पाने की वजह, अन्य कारणों के अलावा कहीं न कहीं राहुल गांधी की देश भर में की गई यात्रा भी है.

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'शहजादे' से 'जननायक' तक का सफर

इन यात्राओं के परिणामस्वरूप राहुल गांधी की छवि में बड़ा बदलाव आया. अब वे व्यावहारिक और जमीन से जुड़े हुए दिखाई दिए, क्योंकि यात्रा के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों से हाथ मिलाया, अपने साथी यात्रियों को देखकर मुस्कुराए और गले मिले. कांग्रेस ने उन्हें एक जननायक के रूप में पेश किया, जो संविधान और उसमें निहित मूल्यों को बचाने के लिए गर्मी, बर्फ और तूफानों का सामना करते पेश किए गए. 

वहीं दिनभर की पैदल यात्रा के बाद कर्नाटक में भीड़ को संबोधित करते हुए देर शाम बारिश में खड़े राहुल गांधी की तस्वीरों ने भाजपा द्वारा लगातार बनाई गई “शहजादा” या “युवराज” की छवि को पूरी तरह बदल दिया.

निरंतरता ही कुंजी है

राहुल गांधी ने सुनिश्चित किया कि वे अपने भाषणों की शैली में निरंतरता बनाए रखें. उन्होंने देश को तानाशाही शासन से बचाने की बात करते हुए अपने आक्रामक आह्वान को बार-बार दोहराया. उनका नारा था, "नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं." इस संदेश को निश्चित रूप से कुछ लोगों ने अपनाया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे इसका उदाहरण है. 

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कांग्रेस की रैलियों और कार्यक्रमों में ज़्यादा से ज़्यादा युवा लोग राहुल गांधी की ट्रेडमार्क सफेद टी-शर्ट पहने हुए देखे गए, क्योंकि राहुल ने पीएम मोदी, युवाओं, महिलाओं और गरीबों को मुद्दा बनाते हुए केंद्र की बीजेपी सरकार पर लगातार तीखे हमले किए. उन्हें बाजार में नाश्ता करते या रेलवे स्टेशन पर बैठे, कुलियों से उनकी समस्याओं के बारे में बात करते या शिक्षा और रोज़गार के बारे में बात करने के लिए युवाओं से मिलते देखा गया. इन जगहों पर एक नेता के तौर पर राहुल को देखा गया, न कि गांधी परिवार के वंशज के रूप में.

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बड़े उद्देश्य के लिए एकजुट होना

धीरे-धीरे, अन्य विपक्षी नेताओं पर 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने का दबाव बढ़ने लगा. बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों ने, जिन्होंने पाया कि राहुल गांधी उनके मुद्दों को सबसे ज़्यादा मुखरता से उठा रहे हैं, कांग्रेस के साथ आने का मन बना लिया. यह संदेश क्षेत्रीय दिग्गजों पर भी हावी रहा.

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अखिलेश यादव, जो पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल नहीं हुए थे, दूसरी यात्रा के दौरान मुरादाबाद में राहुल के साथ देखे गए. उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव के नतीजे यह भी संकेत देते हैं कि दोनों ने 2017 के विधानसभा चुनावों की हार को दरकिनार कर आगे की राह तय की है.

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दरअसल, राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी को मोदी सरकार द्वारा निशाना बनाए जा रहे विपक्षी नेताओं जैसे उद्धव ठाकरे और शरद पवार के पीछे लामबंद होने के लिए प्रेरित किया. महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान, जब महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई और शिवसेना में विभाजन हो गया, तो राहुल की यात्रा महाराष्ट्र से होकर गुजरी. राहुल गांधी के साथ आदित्य ठाकरे के चलने से एक संदेश गया कि सत्ता में हो या न हो, कांग्रेस अपने सहयोगी को दरकिनार नहीं कर रही है.

बाद में जब अजित पवार भाजपा के साथ चले गए, तो पार्टी नेताओं ने संदेह जताया कि क्या शरद पवार ने ही यह सब करवाया है. हालांकि, राहुल गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय में एक बैठक में महाराष्ट्र के नेताओं से कहा कि यह एनसीपी के मुखिया के लिए परीक्षा की घड़ी है और कांग्रेस उनका समर्थन करने के लिए हर संभव कोशिश करेगी.

दिलचस्प बात यह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस ने लगभग उन सभी सीटों पर जीत हासिल की, जहां से राहुल गांधी की यात्रा गुजरी. इसमें नांदेड़, लातूर, जालना, अमरावती, नंदुरबार और धुले शामिल हैं. वहीं, कांग्रेस के सहयोगी दलों ने यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले यवतमाल, डिंडोरी, नासिक और भिवंडी में जीत हासिल की.

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मुख्य चुनौती लेकिन सत्ता की भूखी नहीं

पार्टी के विचार-मंथन सत्रों के दौरान, राहुल गांधी ने यह स्पष्ट कर दिया कि गठबंधन को व्यापक रूप से केंद्र में रखने की आवश्यकता है. इसलिे कांग्रेस को अपने अहंकार और अहंकार को एक बड़े उद्देश्य के लिए अलग रखना होगा. उन्होंने सहयोगियों को यह भरोसा दिलाने के लिए कई प्रयास किए कि कांग्रेस प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में, उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया, जिससे सहयोगियों को यह संदेश मिला कि कांग्रेस सत्ता की भूखी नहीं है और जब जरूरत होगी तो सामूहिक निर्णय लेने में शामिल होगी. इससे एक मजबूत गठबंधन बनाने में मदद मिली.

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जाति जनगणना, गरीबों के हित में काम

“संविधान बचाओ” के नारे के अलावा, राहुल गांधी ने “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का नारा भी लगाया, जिसमें पिछड़े वर्गों को उनका हक दिलाने के लिए जाति जनगणना की मांग की गई. कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी छलांग थी, जो परंपरागत रूप से इस रुख का विरोध करती रही है. पार्टी के कई लोगों ने कहा कि इससे पार्टी को सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा क्योंकि वह मुश्किल हालात में फंसने की कोशिश कर रही थी. हालांकि, राहुल गांधी ने इस आह्वान को और आगे बढ़ाया और इसे पार्टी के घोषणापत्र में शामिल किया. इससे वह सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले नेता की तरह दिखने लगे.

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अडानी-अंबानी मुद्दे पर भी हावी रहे राहुल

जब बिजनेस टाइकून गौतम अडानी और मुकेश अंबानी को चुनावी चर्चा में घसीटा गया, तो राहुल ने रील्स के जरिए तुरंत जवाब दिया और सवाल किया, “क्यों मोदी जी, डर गए?” उन्होंने तर्क दिया कि मोदी को कैसे पता था कि अडानी ने टैंपो में काला धन भेजा है, उन्होंने पूछा कि पीएम सीबीआई और ईडी से इसकी जांच क्यों नहीं करवा सकते. राहुल गांधी ने अपनी गरीब समर्थक छवि को आगे बढ़ाया और अनुसूचित जाति के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को यह विश्वास दिलाया जो कांग्रेस से दूर हो गए थे कि वे निडरता से उनके मुद्दों की पैरवी कर रहे हैं.

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