कुछ लोगों का चले जाना व्यक्तिगत क्षति जैसा होता है. कुछ क्षति उस सन्नाटे की तरह होती हैं, जो संस्कृति से प्यार करने वाले सबसे वफादार शख्स के खो जाने जैसी हो. रघु राय के जाने से वह नजर अब मद्धम पड़ रही है, जिसने भारत को सिर्फ देखा नहीं बल्कि उसे महसूस किया और अपने भीतर पूरी तरह समेट लिया. और उसे उसी कोमल भाव से हमें लौटाया.
पिछले पचास साल से भी ज्यादा समय तक रघु राय की तस्वीरें भारत का एक बहुत बड़ा और भावनाओं से भरा खजाना बन गई थीं. ये तस्वीरें सिर्फ खबरें दिखाने वाली रिपोर्टिंग नहीं थीं. ये उससे कहीं आगे गहरी और लंबे समय तक बनी रहने वाली सांस्कृतिक स्मृति थीं. रोशनी और छाया में उकेरी गई स्मृति.
उनके काम में एक स्वाभाविक अपनापन था. फिर चाहे जब वह 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच की उथल-पुथल को दिखा रहे हों या फिर ताजमहल की एक सुनहरी सुबह को कैमरे में कैद कर रहे हो. युद्ध में उनके कैमरे ने ना सिर्फ लड़ाई को दिखाया बल्कि मानवीय पीड़ा को भी बखूबी कैमरे में कैद किया.
थके हुए सैनिकों की आंखें, शरणार्थियों की गरिमा या तबाही के बाद का अंधेरा. उन्होंने आगरा में ताजमहल को एक साधारण स्मारक नहीं रहने दिया बल्कि उसे एक जीवंत कलाकृति के रूप में बदल दिया. उसे पत्थर की इमारत कम बल्कि स्मृतियों का वाहक ज्यादा बना दिया.
यह भी पढ़ें: जब भोपाल का दम घुट रहा था... गैस त्रासदी में जिंदगी को अलविदा कहता मासूम और रघु राय की दिल छू लेने वाली फोटो
उनके इंडिया टुडे के साथ लंबे समय तक जुड़े रहने से उस समय के भारत को सोचने और समझने में मदद मिली. उनके फोटो फीचर सिर्फ कहानियों के लिए नहीं थे बल्कि वे खुद में एक मुकम्मल स्टोरी होते थे. राय की तस्वीरों में इतिहास, राजनीति, आध्यात्मिकता और रोजमर्रा की जिंदगी झलकती थी.
इससे ना सिर्फ पाठकों को विजुअल जानकारी मिलती थी बल्कि वे उस माहौल को पूरी तरह महसूस कर पाते थे. उन्होंने एक बार कहा था कि मेरे लिए भारत ही पूरी दुनिया है, यह जिंदगी का समंदर है. उन्होंने अपने काम से देश को समझाया नहीं बल्कि उसे गहराई से लाकर सामने रख दिया.
बहुत ही कम फोटोग्राफर्स अपनी तस्वीरों में उस तरह की शिद्दत और संवेदना ला पाते हैं, जिस तरह राय ने मदर टेरेसा जैसी शख्सियतों के साथ दिखाई. उनकी खींची गई तस्वीरें आज भी करुणा की सबसे गहरी अभिव्यक्तियों में से एक मानी जाती है. रघु राय ने भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों की जो तस्वीरें ली हैं, उनमें उस्ताद रियाज में पूरी तरह डूबे हुए दिखाई देते हैं. उनकी उंगलियां वाद्य पर बीच में ऐसे रुकी हैं जैसे कोई सुर थमा हो.
आंखें बंद हैं क्योंकि वे संगीत में पूरी तरह डूबे हुए हैं. इन तस्वीरों को देखकर लगता है कि जैसे राग को भी देखा जा सकता है. उन्होंने कलाकारों को सिर्फ काम करते हुए नहीं दिखाया बल्कि उन्हें इस कदर पेश किया है मानो वो पूरी तरह संगीत में डूबे हुए हैं.
यह भी पढ़ें: भोपाल त्रासदी से लेकर इंदिरा गांधी तक... देश की धड़कनें कैद करने वाले दिग्गज फोटोग्राफर रघु राय नहीं रहे
दिल्ली में रघु राय सिर्फ एक फ़ोटोग्राफ़र नहीं थे बल्कि शहर के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा थे. फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए उनकी प्रदर्शनी तीर्थयात्रा जैसी होती थी, जहां वे सीखने और प्रेरणा लेने जाते थे. युवा फोटोग्राफर्स की एक पीढ़ी ने उनकी तस्वीरों से बहुत कुछ सीखकर अपना रास्ता अख्तियार किया.
उन्होंने रघु राय से सिर्फ ये नहीं सीखा कि तस्वीर कैसे खींची जाती है बल्कि तस्वीर खींचने से पहले की सही नजर, धैर्य, खींचने से पहले महसूस करना और साधारण चीजों में भी खास बात को पहचानना सीखा. बहुत से लोगों के लिए रघु राय सच में एक गुरु थे. वे ऐसे व्यक्ति थे जो दूसरों को सही रास्ता दिखाते थे लेकिन कभी यह जोर नहीं देते थे कि लोग उनका अनुसरण करें.
रघु राय को खास बनाने वाली बात सिर्फ उनकी अच्छी फोटोग्राफी की तकनीक नहीं थी. उनकी सबसे बड़ी खासियत उनकी नैतिक दृष्टि थी. वे मानते थे कि फोटोग्राफी करना सिर्फ तस्वीर खींचना नहीं है बल्कि साक्षी बनना है. ये जीवन के प्रति एक जिम्मेदारी है.
उनकी तस्वीरें कभी भी दिखावे या सनसनी के पीछे नहीं भागती थीं. वे हमेशा सच्चाई को उजागर करती थीं. भीड़-भाड़ वाली सड़कों में, पवित्र रीति-रिवाजों में, खुशी और दुख के पलों में उन्होंने भारत की एक खास लय को पकड़ लिया था. वह लय पूरी तरह से भारतीय थी, लेकिन उसमें ऐसी गहराई थी कि पूरी दुनिया के लोग भी उसे समझ सकते थे.
यह भी पढ़ें: अलविदा रघु राय! भोपाल त्रासदी, सिख दंगे... कैमरे में कैद भारत का इतिहास, 30 तस्वीरों में देखें सफरनामा
और अब जब वह शख्स सिर्फ यादों में रह गया है. उनकी तस्वीरें शांत, स्थाई और रोशनी से भरी हुई हैं. ये तस्वीरें गैलरियों की रोनक बनी हुई हैं, किताबों की शोभा बढ़ा रही हैं, हमारी यादों में जिंदा हैं. मानो अब भी सांस ले रही हों.
रघु राय ने सिर्फ भारत की तस्वीर नहीं खींची. उन्होंने भारत को एक चेहरा दिया, आत्मा दी एक दर्पण दिया और ऐसा करने में उन्होंने ये सुनिश्चित कर दिया कि उनके जाने के बाद भी उनका काम जीवित रहे और भारत के अनुभव का एक अहम हिस्सा बना रहे.
बंदीप सिंह