भारत ने अपने 'ग्रीनलैंड' को डोनाल्ड ट्रंप से कैसे बचाया

भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर की हरियाली पर साल भर से डोनाल्ड ट्रंप की नजर गड़ी हुई है. लेकिन, मोदी सरकार ने उन्हें यह एहसास करा दिया है कि भारत के इस ‘ग्रीनलैंड‘ को लेकर अमेरिका से कोई समझौता नहीं हो सकता है.

Advertisement
भारत के किसानों के लिए पीएम मोदी अमेरिकी प्रेशर और ट्रंप टैरिफ के सामने दीवार की तरह खड़े हैं. (फोटो- ITG) भारत के किसानों के लिए पीएम मोदी अमेरिकी प्रेशर और ट्रंप टैरिफ के सामने दीवार की तरह खड़े हैं. (फोटो- ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:40 AM IST

डोनाल्ड ट्रंप ने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति एक साल पूरा कर लिया है. लेकिन, इन 365 द‍िनों में कोई दिन ऐसा नहीं गुजरा जब ट्रंप ने अपने ‘ट्रैर‍िफ वैपन‘ को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश न की हो. ट्रंप को एक ही उम्मीद थी कि भारत अपने कृषि और डेयरी क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोले. ताकि वह अपनी जेनेट‍िकली मॉडिफाइ़़ड (जीएम) उपज को यहां बेच सके. लेक‍िन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के 'ग्रीनलैंड' यानी कृष‍ि क्षेत्र की रक्षा करने के लिए कमर कस रखी थी. लिहाजा ट्रंप की धमक‍ियों का असर नहीं पड़ा. इसी वजह से इंड‍ो-यूएस ट्रेड डील (US-INDIA Trade Deal) नहीं हो सकी है. भारत सरकार ने क‍िसानों के ह‍ितों को सबसे ऊपर रखा, भले दूसरे सेक्टर्स पर टैर‍िफ का दबाव बढ़ा हो. 

Advertisement

अमेर‍िका से भारत में ज‍ितने कृष‍ि उत्पादों का आयात होता है, हम उसका तीन गुना उसे न‍िर्यात करते हैं. ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं क‍ि भारत अपने कृषि और डेयरी बाजार को उसके लिए खोल दे, ताकि अमेरिकी एग्री प्रोडक्ट्स को भारतीय बाजार में एंट्री मिल सके. इसके लिए सालभर में अमेरिका ने भारत पर ट्रैर‍िफ बढ़ाने की धौंस देकर काफी दबाव बनाने की कोश‍िश की. इसके बावजूद मोदी सरकार ने न तो अमेर‍िका से दोस्ती की परवाह की और न ट्रंप की धमक‍ियों की. परवाह की तो अपने कृष‍ि क्षेत्र और क‍िसानों की. क्योंक‍ि सरकार जानती है क‍ि अगर अमेर‍िका के जीएम मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पादों को भारत में एंट्री दी गई तो यहां के क‍िसान और पशुपालक बर्बाद हो जाएंगे. क्योंक‍ि भारत में 86 फीसदी छोटे क‍िसान हैं, जो अमेर‍िका के क‍िसानों के साथ मुकाबला नहीं कर सकते. 

Advertisement

भारत ने क्यों बनाया एग्रीकल्चर डिफेंस सिस्टम

अमेर‍िका के जीएम मक्का और सोयाबीन को भारत में डंप करने के ल‍िए स‍िर्फ डोनाल्ड ट्रंप ही दबाव नहीं बना रहे हैं. भारत में भी कुछ अर्थशास्त्री और ब‍िजनेस संगठन ऐसे हैं जो लगातार इसी तरह का माहौल बना रहे हैं. हालांक‍ि, सरकार ने ऐसे लोगों की कभी परवाह नहीं की. क्योंक‍ि अमेर‍िका को खुश करने से ज्यादा जरूरी भारत के कृष‍ि क्षेत्र और क‍िसानों को बचाना है. भारत 140 करोड़ लोगों का देश है, ऐसे में अगर कृष‍ि क्षेत्र से कोई कंप्रोमाइज क‍िया गया तो खाद्यान्न के ल‍िए दूसरे देशों पर न‍िर्भरता बढ़ सकती है, जो खाद्य सुरक्षा के ल‍िए खतरा हो सकता है. 

यह वही अमेर‍िका है ज‍िसके राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने 1965 में हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को धमकी दी क‍ि यद‍ि भारत ने पाक‍िस्तान के साथ युद्ध नहीं रोका तो वो भारत को गेहूं देना बंद कर देगा. तब शास्त्री जी ने कहा था क‍ि बंद कर दीजिए. लिंडन जॉनसन की बदतमीजियों के बाद भारत ने हर‍ित क्रांत‍ि का सूत्रपात करके उसे मुंहतोड़ जवाब द‍िया.     

अमेरिकी सोयाबीन और मक्का को भारत की 'ना' क्यों?

भारत में सोयाबीन और मक्का दोनों के दाम लंबे समय से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से कम हैं. इस समय 2400 की एमएसपी वाला मक्का 1200 से 1600 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल के रेट पर ब‍िक रहा है और 5328 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल की एमएसपी वाला सोयाबीन 3000 से 4000 रुपये के दाम पर ब‍िक रहा है. ऐसे में अगर अमेर‍िका से इन दोनों का आयात होगा तो दाम और कम हो जाएंगे. इससे लाखों क‍िसानों की ज‍िंदगी खराब होगी और वो सोयाबीन और मक्का छोड़कर कोई और फसल उगाने लगेंगे. इससे कृष‍ि क्षेत्र को नुकसान होगा. हमारी न‍िर्भरता दूसरे देशों पर बढ़ जाएगी. इसल‍िए सरकार आयात नहीं खोलना चाहती है. 

Advertisement

अमेर‍िका अपने क‍िसानों को भारत के मुकाबले कहीं बहुत अध‍िक सरकारी मदद देता है. उसके क‍िसान भारतीय क‍िसानों के मुकाबले ज्यादा जमीन और पैसे वाले भी हैं. इसके बावजूद अमेरिका चाहता है कि भारत वहां के जीएम सोयाबीन, मक्का, सेब, फल, ड्राई फ्रूट्स और डेयरी उत्पाद पर आयात शुल्क कम कर दे, ताक‍ि भारत के बाजार में उसके उत्पाद सस्ते होकर जगह बना सकें. लेकिन, भारत सरकार इस मांग को स्वीकार करने को लेकर असमंजस में फंसी हुई है, क्योंकि इन उत्पादों के सस्ते आयात से देश के करोड़ों छोटे किसानों की जीव‍िका संकट में पड़ सकती है.

भारत में कॉटन को छोड़कर किसी भी जीएम फसल को उगाने की अनुमति नहीं है. ऐसे में जीएम मक्का और सोयाबीन को खाने के लिए आयात करने की इजाजत देना असंभव माना जा रहा है.

अमेरिकी डेयरी बनाम भारत की धार्मिक संवेदना

एग्रीकल्चर ही नहीं, भारत का डेयरी सेक्टर भी अमेरिका के साथ टकराव का कारण बना. ट्रंप अमेरिका का इफरात डेयरी प्रोडक्ट भारत को निर्यात करना चाहते थे. लेकिन, अमेरिका में गाय-भैंस जैसे पशुओं को मांसाहार दिया जाता है, जो भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों से टकराता है. ऐसे में भारत सरकार ने 'आस्था' के सवाल और पशुपालकों की चिंता का ख्याल रखते हुए अमेर‍िकी डेयरी प्रोक्डट को 'ना' बोल द‍िया है.

Advertisement

भारत में अमेर‍िकी पैराकारी पर सरकार अलर्ट

सरकारी थ‍िंक टैंक नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद और वरिष्ठ सलाहकार राका सक्सेना ने मई 2025 में एक वर्किंग पेपर ल‍िखा. ज‍िसमें अमेरिका से जीएम सोयाबीन और मक्का के शुल्क-मुक्त आयात की पैरोकारी की गई थी. इसके बाद क‍िसान संगठनों ने नीत‍ि आयोग को क‍िसानों के ल‍िए 'अनीत‍ि आयोग' कहना शुरू कर द‍िया. भारी व‍िरोध के बाद जब सरकार को समझ में आया क‍ि इस सुझाव को मानना देश के ल‍िए क‍ितना घातक हो सकता है तब आयोग ने इस पेपर को वापस ल‍िया.

ट्रंप को पहले कार्यकाल में भी दिया गया था जवाब 

बात ट्रंप के पहले कार्यकाल की है. ट्रंप ने अपनी अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी के तहत लोकल प्रोडक्शन और रोजगार को बढ़ावा देने के ल‍िए 2018 में भारत से स्टील और एल्युमीनियम इंपोर्ट पर 25 फीसदी टैरिफ लगा द‍िया था. इसके जवाब में भारत ने अमेर‍िकी सेब, अखरोट और बादाम पर जवाबी ड्यूटी (Retaliatory Duty) लगा दी. आखिर में अमेरिका को ही झुकना पड़ा. जो बाइडेन ने स‍ितंबर 2023 में एल्यूमिनियम स्टील ड्यूटी को वापस लेकर अमेरिका की गलती सुधारी. इस भूल सुधार के बाद भारत ने भी स‍ितंबर 2023 में अमेर‍िकी सेब, अखरोट और बादाम सहित वहां के आठ उत्पादों पर लगाई गई ड्यूटी को वापस ले लिया. इन पांच वर्षों के दौरान भारतीय बाजार में अमेर‍िका को बड़ा झटका लगा था. अमेरिका की जगह ईरान, तुर्की, इटली, चिली और न्यूजीलैंड प्रमुख सेब निर्यातक के रूप में भारत में उभरने लगे थे. इस च‍िंता में अमेर‍िका को भारत की बात माननी पड़ी.

Advertisement

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में खुद सामने आकर कहा क‍ि, 'हमारे लिए अपने किसानों का हित सर्वोच्च प्राथमिकता है. भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरे भाइयों-बहनों के हितों के साथ कभी समझौता नहीं करेगा. इसके लिए मुझे निजी रूप से जितना भी नुकसान उठाना होगा, उठाऊंगा.' इस बयान के बाद उन लोगों ने भी प्रधानमंत्री की तारीफ की जो अक्सर खेती-क‍िसानी के मुद्दों पर सरकार की आलोचना करते रहते हैं. यानी, ट्रंप टैरिफ और अमेरिका की भारतीय खेत-खलिहानों पर तिर्छी नजर को लेकर हमारा ‘डिफेंस सिस्टम‘ मजबूती के साथ तैयार है. ट्रंप को दो टूक संदेश जा चुका है कि हमारे खेतों की हरियाली को वह ‘ग्रीनलैंड‘ न समझें.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement