बांग्लादेश में अब चौथा बड़ा रेफरेंडम हो रहा है. यह 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के साथ होगा. रेफरेंडम का सवाल है कि जनता ‘जुलाई चार्टर’ को लागू करना चाहती है या नहीं. इसे 47 बड़े बदलावों के पैक की तरह पेश किया गया है, जिनका संविधान में संशोधन कर के असर होगा. लेकिन इससे पहले देश में तीन रेफरेंडम हो चुके हैं. हर एक अपने समय की राजनीति और ताकत के अनुरूप था. जाहिर उसका रिजल्ट भी वैसा ही आया. पुराने तीन में से दो रेफरेंडम तो सैनिक तानाशाहों ने अपनी सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए कराया. फिर किसकी मजाल थी जो फैसला उनकी मनमर्जी का न आता.
पहला रेफरेंडम 30 मई 1977 में हुआ था. उस समय जनता से पूछा गया था कि क्या वे पोलिटिकल और पॉलिसी फैसलों के लिए राष्ट्रपति जियाउर रहमान पर भरोसा रखते हैं. लगभग 88% लोगों ने मतदान किया और 98.88% ने ‘हां’ में जवाब दिया. दूसरा रेफरेंडम 21 मार्च 1985 में हुआ था. उस वक्त राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद एरशाद देश चला रहे थे. लोगों से पूछा गया कि क्या वे उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि वे तब तक प्रशासन चलाएं जब तक चुनावों के जरिये नागरिक सरकार नहीं बन जाती. यहां भी जवाब ‘हां’ में मिला, वो भी 94% से ज्यादा.
तीसरा रेफरेंडम 15 सितंबर 1991 में हुआ. यह बड़ी वजह से था. उस वक्त देश ने फिर से पार्लियामेंटरी सरकार वापस लाने का फैसला किया. सवाल था कि क्या राष्ट्रपति को संविधान की बारहवीं संशोधन बिल को मंजूर करना चाहिए या नहीं. इस पर लगभग 84% लोगों ने ‘हां’ कहा. ये तीनों रेफरेंडम अलग अलग दौर के थे. कुछ में जनता से भरोसा मांगा गया और कुछ में संविधान को बदलने की मंजूरी. इन सबका असर राजनीति और शासन की दिशा पर गहरा रहा है. तब के सत्ताधारियों के पक्ष में.
क्या यूनुस कायम रखना चाहते हैं सत्ता पर पकड़?
डेढ़ साल से बांग्लादेश की सत्ता संभाल रहे मोहम्मद यूनुस के फैसले विवादों में ही रहे. उन्हें अंतरिम सरकार सौंपी गई थी, लेकिन बहुत दबाव के बाद वे चुनाव के लिए तैयार हुए. जिस तरह उनकी सरकार चुनाव से ठीक पहले तक फैसले ले रही थी, यह माना जा रहा था कि वे सत्ता पर पकड़ छोड़ना नहहीं चाहते. यूनुस देश के नाम अपने संबोधन में कह चुके हैं कि वे चुनाव बाद नई सरकार को प्रभार सौंपकर चले जाएंगे. कायस हैं कि शायद वे अपने यूनुस सेंटर में फिर से काम करने लगेंगे. लेकिन, उनके आलोचक यह आशंका जता रहे हैं कि वे सत्ता में अपनी दखल कायम रखना चाहते हैं. क्योंकि, वे असाधारण रूप से रेफरेंडम के पक्ष में, मतलब ‘हां’ के लिए प्रचार कर रहे हैं. संविधान सुधार के नाम पर, या किसी और सरकारी ढांचे को खड़ा करने के नाम पर वे अगली सरकार की डिसिजन मेकिंग में शामिल रहना चाहते हैं.
ताजा रेफरेंडम क्यों है उलटी गंगा बहाने जैसा
अब जो नया रेफरेंडम हो रहा है, वो कुछ अलग है. आमतौर पर रेफरेंडम आख़िर में होता है. पहले संसद में फैसला होता है. फिर जनता से पूछा जाता है कि क्या वे उस फैसले को मंजूर करते हैं या नहीं. लेकिन इस बार उल्टा हो रहा है. पहले जनमत संग्रह कराया जा रहा है और तभी उसके आधार पर आगे के फैसले लिए जाएंगे. यानी अगर जनता ‘हां’ कहती है तो उसके बाद फैसले लागू होंगे. अगर ‘ना’ कहती है तो प्रक्रिया वहीं रुक जाएगी.
अब सवाल यह है कि वोटर को बस हां या ना में चुनाव करना है. पर सवाल में 47 बदलावों को एक साथ जोड़ दिया गया है. कई मुद्दे हैं. कुछ पर जनता सहमत हो सकती है और कुछ पर नहीं. लेकिन वोटर को अलग-अलग चुनाव नहीं दिए जा रहे हैं. सिर्फ एक ही सवाल है. होना यह चाहिए था कि पहले बहस होती. संसद में संशोधन प्रस्ताव पास होता, फिर जनता से पूछा जाता. मगर अब ऐसा नहीं हुआ है. पहले जनता से पूछा जा रहा है और उसके बाद संसद के समान काम करने वाली परिषद बनाई जाएगी. इसलिए यह उल्टी गंगा बहाने जैसा है. जनता को एक पैक्ड सवाल में कितने मुद्दों पर ‘हां’ या ‘ना’ कहना है, इस पर प्रश्न उठ रहे हैं.
जवाब ‘हां’ में आया तो
अगर कल जनता ‘हां’ कह देती है तो देश में बड़ा बदलाव शुरू होगा. पहले एक संवैधानिक सुधार परिषद बनेगी. यह परिषद लगभग संसद जैसा काम करेगी. इसका काम जुलाई चार्टर के 47 बदलावों को संविधान में लागू करना होगा. यह संशोधन सिर्फ तभी होगा जब इस परिषद का 151 सदस्य वाला बहुमत इसे मंजूर करेगा. यह काम 180 दिनों के भीतर पूरा होना चाहिए. इनमें बड़े बदलाव शामिल हैं. नई संसद का गठन, प्रधानमंत्री की शक्तियों की सीमा तय करना, राष्ट्रपति के अधिकारों में बदलाव और नए नियम लागू करना शामिल हैं. अगर रेफरेंडम का नतीजा हां आ जाता है तो पुरानी संसद की जगह कुछ नए नियम और स्ट्रक्चर बनेंगे. एक बाइकैमरल संसद, यानी दो सदनों वाली व्यवस्था का सुझाव भी है. इसके लिए 100 सदस्यों वाला ऊपरी सदन भी बनाने की बात सामने है.
अगर जनता ‘ना’ कह देती है तो यह प्रक्रिया वहीं ठहर जाएगी. जुलाई चार्टर में किए जाने वाले सारे बदलावों की प्रक्रिया रुक जाएगी. लेकिन सरकार ऐसा नहीं होने देगी. यूनुस खुद प्रचार कर रहे हैं कि रेफरेंडम में ‘हां’ वोट करने पर पुराना कुशासन खत्म होगा. नया चार्टर देश में लोकतंत्र, अच्छे शासन और सामाजिक न्याय को मजबूत करेगा. हालांकि, चुनाव आयोग ने सरकारी कर्मचारियों को सीधे ‘हां’ के लिए प्रचार करने से रोका है.
कई चरण में बदलाव होंगे रेफरेंडम के बाद
रेफरेंडम के बाद काम आसान नहीं होगा. बात सिर्फ हां या ना तक नहीं है. कई चरण होंगे. सबसे पहले तो यह तय होगा कि नया संविधान या संशोधित संविधान कैसा दिखेगा. उसके बाद नए नियमों को लागू करना होगा. नए चुनाव आयोग, नए संविधान नियमों का पालन करना होगा. कई विश्लेषकों का कहना है कि इतने बड़े मुद्दों को एक साथ एक सवाल में पैक करना सही नहीं है. लोग सोचते हैं कि अगर कुछ अलग मुद्दों पर उन्हें मत देना होता तो बेहतर होता. यह मुद्दा चुनाव से पहले बहस का भी विषय बना है.
संविधान बदला तो कैसी होगी बांग्लादेश की नई संसद
अगर जनता हां कहती है और परिषद सारे बदलाव लागू कर देती है तो बांग्लादेश की संसद आज की तरह एकल सदन से बदलकर दो सदनों वाली व्यवस्था में बदल सकती है. इसका मतलब है कि एक नया ऊपरी सदन आएगा जो संसद के कामों में बराबर का हिस्सा लेगा. नए संविधान में यह भी संभव है कि प्रधानमंत्री की कार्यकाल सीमा, राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमा, उच्च न्यायालयों और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता जैसी बातों को नए रूप में रखा जाए. ऐसे बदलाव पूरी राजनीतिक तस्वीर को बदल सकते हैं.
यह रेफरेंडम सिर्फ एक सवाल नहीं है. यह देश की राजनीति, संविधान और शासन के भविष्य की दिशा तय कर सकता है. कल जो वोट आएगा, वह सिर्फ हां या ना नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि बांग्लादेश अपनी राजनीति और संविधान को किस दिशा में ले जाना चाहता है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि रेफरेंडम इस बात पर है कि यूनुस जाएंगे या सत्ता के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सूत्रधार बने रहेंगे. नतीजा ‘हां’ के पक्ष में आया तो यूनुस मजबूत होंगे.
धीरेंद्र राय