साहित्य आजतक: ...और नहीं सुलझ पाई सबसे ताकतवर पीएम की गुत्थी

इस सत्र में जहां दलील दी गई कि आर्थिक दृष्टि से सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री के तौर पर पीवी नरसिंहा राव के पक्ष में बात कही गई. वहीं तर्क दिया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच कौन ज्यादा शातिर प्रधानमंत्री है.

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साहित्य आजतक 2017 साहित्य आजतक 2017

राहुल मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 11 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 6:23 PM IST

साहित्य आजतक के विशेष सत्र 'भारत का सबसे पॉवरफुल पीएम कौन' में वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी, उदय माहूरकर और लेखक संजय बारू ने शिरकत की. इस सत्र में देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों पीवी नरसिंहा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री के पक्ष में तर्क रख यह समझने की किशिश की गई कि अबतक देश का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री किसे कहा जा सकता है.

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गौरतलब है कि चर्चा करने वाले सभी देश के जाने माने पत्रकार रहे हैं और उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों समेत मौजूदा प्रधानमंत्री पर किताब लिखी है. इस सत्र में जहां दलील दी गई कि आर्थिक दृष्टि से सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री के तौर पर पीवी नरसिंहा राव के पक्ष में बात कही गई. वहीं तर्क दिया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच कौन ज्यादा शातिर प्रधानमंत्री है.

पूरी चर्चा के दौरान अहम बात यह रही कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ताकतवर होने के पीछे अहम कारण यह है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान खुद को संघ (आरएसएस) से बड़ा साबित किया. वहीं यह भी कहा गया कि अटल और मोदी में अटल ज्यादा ताकतवर इसलिए कहे जा सकते हैं क्योंकि वह विपक्ष से लगातार संवाद में रहे लेकिन मौजूदा पीएम मोदी का विपक्ष के साथ संवादहीनता देखने को मिलती है.

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इस सत्र के दौरान पूछा गया कि क्या मनमोहन सिंह एक्सिडेंटल पीएम थे? संजय बारू ने कहा कि यह खुद मनमोहन सिंह मानते थे कि वह देश के एक एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे. संजय बारू ने कहा कि 1991 में उनकी नरसिंहा राव पर लिखी किताब में कहा था कि वह आर्थिक रिफॉर्म की पोलिटिकल लीडरशिप नरसिंहा राव ने की थी. उन्होंने अपने कार्यकाल में मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री का ओहदा दिया.

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इस सत्र में विजय त्रिवेदी ने कहा कि किसी अच्छी चीज को स्वीकारना एक ताकतवर शख्सियत कि निशानी होती है. देश में आर्थिक रिफॉर्म की शुरुआत भले नरसिंहा राव ने किया लेकिन उसे आगे बढ़ाने की ताकत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाई. विजय त्रिवेदी ने कहा कि वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान एक ऐसा मौका आया जब संघ का नेतृत्व उनके घर पर बैठ कर वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद छोड़कर देश का राष्ट्रपति बन जाना चाहिए. त्रिवेदी के मुताबिक इस दौर में वाजपेयी संघ से बड़े हो चुके थे.

उदय माहुरकर ने कहा कि मौजूदा समय में प्रधानमंत्री मोदी का कद जिस तरह से बढ़ा है उसके लिए उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ संघ भी जिम्मेदार है. माहूरकर ने कहा कि देश से गरीबी हटाने का सबसे कारगर प्रयास मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी ने किया है.

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आखिर क्यों मोदी सरकार ने तीन साल के कार्यकाल के दौरान रॉबट्र वाड्रा को भूला दिया गया. माहूरकर ने कहा कि पीएम मोदी ताकतवर होने के साथ-साथ एक शातिर राजनीतिज्ञ भी हैं. पीएम मोदी यह बात जानते हैं कि यदि वह किसी कांग्रेस नेता या गांधी परिवार के शख्स के पीछे पड़ेंगे तो उसके उलटे परिणाम भी हो सकते हैं.

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संजय बारू ने कहा देश में उदारवाद की नीतियों को 1991 के बाद बढ़ाया गया. बारू के मुताबिक आज जब देश के लिए दावा किया जा रहा है कि वह दुनिया का दूसरा सबसे अहम देश है, यह सब नरसिंहा राव के कार्यकाल का नतीजा रहा. आखिर क्यों वाजपेयी जी गैर-कांग्रेस वाद का नारा बुलंद नहीं कर पाए. विजय ने कहा कि जब अटल बिहारी की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद दोबारा 1998 में सरकार बनी तब उनके कार्यकाल में गैर-कांग्रेसवाद की पहली झलक देखने को मिली.

विजय ने कहा कि इतिहास में वाजपेयी डॉक्ट्राइन का जिक्र होता है. ऐसा इसलिए है कि बतौर पीएम वाजपेयी सभी से कनेक्ट रखना जानते थे. वह जितना पार्टी के अंदर बने खेमों के संपर्क में रहते हुए सबसे मिलते थे वहीं वह विपक्ष में भी सबसे मिलने और कनेक्ट रखने में विश्वास रखते थे. यह काम पीएम मोदी नहीं कर पा रहे हैं लिहाजा इस लिहाज से भी कहा जा सकता है कि अटल जी मौजूदा पीएम मोदी से ज्यादा ताकतवर थे. हालांकि माहूरकर ने कहा कि जिस तरह से प्रशासन में पीएम मोदी ने ट्रांस्पेरेंसी के क्षेत्र में काम किया है वह उन्हें देश का सबसे ताकतवर पीएम बनाने के लिए पर्याप्त है.

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