सैनी कह गए अधूरा सच, ये है हुमायूं को बाबर की चिट्ठी की असलियत

राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी बाबर और हुमायूं पर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं.

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बीजेपी नेता मदनलाल सैनी ने दिया था बाबर-हुमायूं पर बयान बीजेपी नेता मदनलाल सैनी ने दिया था बाबर-हुमायूं पर बयान

महेन्द्र गुप्ता / पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 27 जुलाई 2018,
  • अपडेटेड 3:58 PM IST

राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी बाबर और हुमायूं पर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं और इस बयान के चलते इतिहास के पन्नों की सच्चाई पर एक बहस भी शुरू हो गई है.

सैनी ने 24 जुलाई को कहा- "जहां तक मुझे पता है जब हुमायूं मर रहा था उसने बाबर को बुलाकर कहा कि तुम्हें हिंदुस्तान पर राज करना है तो एक बात हमेशा ध्यान रखना. गाय, ब्राह्मण और महिलाओं का हमेशा सम्मान करना." 

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यह टिप्पणी उन्होंने अलवर में मॉब लिंचिंग की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए की. अलवर में गाय ले जा रहे अल्पसंख्यक समुदाय के एक व्यक्ति को गोरक्षकों ने घेरकर पीटा जिसके बाद उसकी मौत हो गई. इस घटना को लेकर भाजपा के राज्य और केंद्र सरकार की आलोचना हो रही है. इसी मुद्दे पर जयपुर में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सैनी ने यह टिप्पणी की.

हालांकि अलवर की घटना पर टिप्पणी करते हुए मदनलाल कई ग़लतियां कर गए. पहली तो यह कि उन्होंने बाप को बेटा और बेटे को बाप बता दिया. सच यह है कि बाबर के बेटे का नाम हुमायूं था. लेकिन उन्होंने हुमायूं को बाबर का पिता बता दिया.

हुमायूं के नाम बाबर की असली वसीयत

दूसरी तथ्यात्मक गलती यह है कि बाबर ने हुमायूं को गाय के बारे में तो नसीहत दी थी. लेकिन मदनलाल सैनी ने इसमें औरतें और ब्राह्मण अपनी तरफ से जोड़ दिए.

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दरअसल, बाबर और हुमायूं के बीच ऐसे पत्राचार का जो विवरण एतिहासिक साक्ष्य के तौर पर उपलब्ध है, वो है हुमायूं के नाम बाबर की वसीयत. इस वसीयत में बाबर ने हुमायूं को जो सीख दी है, उसे हम यहां आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.

वसीयत में बाबर ने कहा था, “बेटा, हिंदुस्तान की सरज़मीं में हर मज़हब को मानने वाले लोग रहते हैं. अलहम्दोलिल्लाह इस मुल्क की बादशाहत तुम्हें सौंपी गई है. अपने दिल से भेदभाव दूर कर के इंसाफ करो. खास तौर पर तुम गाय की कुर्बानी ना करो. इससे तुम हिंदुस्तान के लोगों का दिल जीत लोगे और लोग बादशाहत से जुड़ेंगे. सल्तनत में रहने वालों की इबादतगाहों को गिराओ मत. इतना बराबरी का इंसाफ करो कि लोग अपने बादशाह से खुश हों और बादशाह लोगों से. इस्लाम जुल्म की तलवार से नहीं, नरमी से आगे बढ़ेगा. शिया-सुन्नी झगड़ों की तरफ से आंख मूंद लो वरना इस्लाम कमजोर होगा. सल्तनत के अलग-अलग फिरके जिस्म के चार तत्त्वों की तरह हैं. सल्तनत की सेहत इनके तालमेल पर टिकी है. हजरत अमीर तैमूर साहिबे किरां की मिसाल हमेशा तुम्हारे सामने रहनी चाहिए. इससे सल्तनत को मजबूत करने में मदद मिलेगी."

हमें इस प्रसंग का जिक्र मिलता है वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शाज़ी ज़माँ के उपन्यास "अकबर" में. एतिहासिक तथ्यों पर आधारित यह उपन्यास अपनेआप में एक अनूठी कोशिश है उस समय के इतिहास को लोगों तक पहुंचाने की. अकबर और मुगलकाल को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां लोगों के बीच प्रचलित हैं, उसके मद्देनज़र यह उपन्यास एक एतिहासिक और प्रमाणिक दस्तावेज जैसा है. उपन्यास वर्ष 2016 में राजकमल प्रकाशन की ओर से छापा गया था.

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ऐतिहासिक तथ्यों पर बहस

मुगलकाल के इतिहास को लेकर कई तरह के तथ्य हैं और इतिहासकारों के बीच परस्पर विरोधाभास भी. उन्हीं में से एक है बाबर की वसीयत की प्रामाणिकता का. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि बाबर की हुमायूं के नाम वसीयत प्रामाणिक नहीं है. वहीं मध्यकालीन इतिहास के सबसे बड़े इतिहासकारों में से एक, खलीक़ अहमद निज़ामी इस वसीयत को प्रामाणिक मानते हैं और इसे अपनी प्रसिद्ध पुस्तक- ‘अकबर एंड रिलिज़न’ में शामिल भी करते हैं.

शाज़ी ज़माँ अपनी किताब में इस वसीयत का हवाला खलीक के शोध से लेकर प्रस्तुत करते हैं. आजतक से बातचीत में उन्होंने बताया, “निजामी साहब प्रतिष्ठित इतिहासकार हैं. उनका मानना है कि अबुल फजल ने इसका जिक्र अकबरनामा में नहीं किया क्योंकि वो ऐसा नहीं चाहते थे कि अकबर कुछ ऐसा करते नजर आएं जो पहले कोई कर चुका हो."

कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि अबुल फज़ल ने इसका ज़िक्र अकबरनामा में नहीं किया. लेकिन उसकी वजह यह थी कि अबुल फज़ल अकबर के क़द को उनसे पहले के शासकों से बड़ा बनाकर दिखाना चाहते थे. वो ऐसा नहीं चाहते थे कि अकबर कुछ ऐसा कहते नज़र आएं जो पहले कोई कह चुका हो.”

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मदनलाल सैनी की टिप्पणी के बाद से सोशल मीडिया पर लगातार जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसमें कई लोग यह कह रहे हैं कि बाबर और हुमायूं के बीच ऐसे संवाद का कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. जबकि कई इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि खलीक की किताब में जिस वसीयत का ज़िक्र है, वो सही है.

लेकिन दोनों ही स्थितियों में मदनलाल सैनी फंसे हुए दिखाई देते हैं. अगर यह बात इतिहास में कही ही नहीं गई तो फिर मदनलाल इसे कहां से कह गए. और अगर वसीयत सही है तो फिर इसमें ब्राह्मण और महिलाओं का संदर्भ को कहां से ले आए. फिर हुमायूं ने बाबर को बुलाकर कहा वाली बात तो पूरी तरह से गलत ही है.

संदर्भित वसीयतनामे में लिखी बातों से स्पष्ट है, बाबर ने हुमायूं को सलाह दी थी कि हिंदुस्तान में गाय की कुर्बानी सही नहीं है, किसी भी संप्रदाय के इबादतगाहों यानी मंदिरों आदि को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए और बराबरी पर आधारित व्यवस्था बनाकर शासन करना चाहिए.

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बाबर की इस सलाह में अमन और भाईचारे की बुनियाद पर हिंदुस्तान में हुकूमत कायम रखने की सलाह दी गई है. मदनलाल सैनी ने इस संदर्भ को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ और बदलकर प्रतिक्रिया स्वरूप पेश किया है.

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भारतीय जनता पार्टी की ओर से ऐसी सुविधाजन्य और गलत जानकारी देने का यह कोई पहला मामला भी नहीं है. इतिहास को अपनी सुविधा या अज्ञानता के कारण पार्टी के कई नेता अलग-अलग तरीके से बताते रहे हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने भाषणों में इतिहास के संदर्भों को साझा करते हुए गलतियां कर चुके हैं.

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