हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
- मिर्ज़ा ग़ालिब
दुनिया-जहान में जब भी उर्दू की बात होगी, ग़ालिब याद किए जाएंगे. जब तक उर्दू ज़बान के नाम पर क़लम चलते रहेंगे, जब तक उर्दू लिखने के लिए कोरे काग़ज़ हाथों में उठाए जाएंगे और कुतुबख़ाने (लाइब्रेरी) में जिल्द पलटी जाती रहेगी, ग़ालिब याद किए जाएंगे. जब-जब उर्दू शायरी में नए प्रयोग की बात होगी, ग़ालिब को पढ़ा जाएगा. जब-जब हिंदुस्तान के इतिहास पर बात होगी, ग़ालिब को ज़रूर लिखा जाएगा. जब भी आगरा और दिल्ली के क़िस्से सुनाए जाएंगे, शायद ग़ालिब के बिना क़िस्सागोई अधूरी रहेगी.
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब (1797–1869) दिल्ली के सबसे बड़े शायरों में से एक माने जाते हैं. वर्ल्ड लिटरेचर में भी ग़ालिब उर्दू की सबसे बुलंद आवाज़ हैं. उन्होंने हिंदुस्तान की तारीख़ (इतिहास) का मुश्किल दौर अपनी आंखों से देखा. यह वो वक़्त था, जब मुग़ल सल्तनत अपने आख़िरी दौर की बाट जोह रहा था और अंग्रेज़ी हुकूमत मज़बूत होती जा रही थी. ग़ालिब की आंखों के सामने दो दुनियाएं (एक पुरानी और एक नई) आपस में मिल रही थीं. 1857 की बग़ावत ने एक पूरे दौर का ख़ात्मा कर दिया और नया सियासी निज़ाम दुनिया के सामने वजूद में आ रहा था. ग़ालिब की आंखों ने यह सब देखा.
आशावाद की तरफ़ झुकाव रखने वाले शायर मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में रहते थे और उन्होंने अपनी प्यारी दिल्ली की गलियों में तबाही, ख़ून-ख़राबा और अफ़रातफ़री बहुत क़रीब से देखा. उन्होंने तहज़ीब का पूरा एक निज़ाम टूटता हुआ देखा. ग़ालिब खुद को 'नमक-ख़्वार-ए-सरकार-ए-अंग्रेज़' यानी 'सरकार का वेतनभोगी' कहते थे क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ी हुकूमत से पेंशन मिलती थी. इसके बावजूद, उनकी शायरी और लेखन उस दौर की सच्ची तस्वीर पेश करता है.
रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ
हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या
- मिर्ज़ा ग़ालिब
मिर्ज़ा ग़ालिब ने उर्दू और फ़ारसी में ग़ज़लें कही, मसनवी और क़सीदे लिखे. वे ख़त लिखने में भी माहिर थे. मिर्ज़ा साहब शाही लोगों से लेकर बाज़ार के आम लोगों, मज़दूरों और अंग्रेज़ अफ़सरों तक सबसे मुलाक़ातें किया करते थे. ग़ालिब कलकत्ता भी गए, जो उस दौर में बड़ी बात थी. यही वजह है कि उनकी शख़्सियत में खुले दिल वाला क़लमकार, इंसानों को समझने वाला ज़ेहन, हाज़िर-जवाबी, कॉन्फ़िडेंस और मिलनसार नज़रिया महसूस करने को मिलता है.
मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी ज़िंदगी में ख़ूब सफ़र किया और वे जहां भी गए, वहां उनको दोस्त मिले. ग़ालिब के नए इलाक़े भी अजनबी नहीं लगते थे. यह उनकी शायरी की मक़बूलियत और आपसी रिश्तों के मज़बूत जाल का सुबूत है. लंबी दूरी और खराब कम्युनिकेशन सिस्टम के बावजूद, ग़ालिब के कॉन्टैक्ट्स का एक अनौपचारिक नेटवर्क फैला हुआ था. ग़ालिब सामंती अभिजात तबक़े से थे और मदद मिलने को अपना हक़ समझते थे. उन्हें नई चीज़ें पसंद थीं और उनमें एक मुसाफ़िर की तमाम खूबियां थीं.
साल 1820 के बाद हिंदुस्तान के हालात बदलने लगे. इसी बीच, अंग्रेज़ों और पुराने अमीर सामंती लोगों के बीच रिश्ते बिगड़ रहे थे. ऐसे में ग़ालिब ने ख़ुद को एक बड़े बदलाव के बीच फंसा हुआ पाया. 1825 में ग़ालिब अपनी विरासत और पेंशन के लिए लंबा सफ़र करके कलकत्ता गए और चार साल बाद लौटे. उन्हें कामयाबी नहीं मिली, लेकिन दुनिया को बेहतर तरीक़े से समझकर वापस आए. उन्होंने घोड़े, गाड़ी और नाव से अलग-अलग तरह से यात्रा की. इस दौरान वे अंग्रेज़ों से नाराज़ और मायूस थे, फिर भी लगातार ख़त लिखते रहे और पेंशन बढ़ाए जाने की उम्मीद नहीं छोड़ी. आख़िरकार, उन्हें एक पैसा भी ज़्यादा नहीं मिला.
ग़ालिब को हर महीने 62 रुपये 50 पैसे की पेंशन मिलती थी, जो उनकी ज़रूरतों के लिए काफ़ी नहीं थी. मदिरा, जुआ और निजी रिश्तों की वजह से वे हमेशा पैसों की तंगी में रहे. वे क़र्ज़ लेते रहे और चुका नहीं पाए. 1826 तक उनके लिए हालात बहुत ख़राब हो गए. साहूकार, दुकानदार और रिश्तेदार सब पैसे मांगने लगे. इसी दबाव से बचने और हल निकालने के लिए वह कलकत्ता गए थे.
ग़ालिब का फ़ारसी शायरी का पहला कलेक्शन 1845 में मयख़ाना-ए-आरज़ू के नाम से पब्लिश हुआ. ग़ालिब का मानना था कि उन्होंने फ़ारसी इसलिए चुनी क्योंकि इसमें खुद को ज़ाहिर करने के बेहतर मौके़ मिलते थे और वे हमेशा अपनी फ़ारसी शायरी को उर्दू से बेहतर मानते थे. अपनी फ़ारसी शायरी के बारे में उनकी राय कुछ भी रही हो, उन्होंने अपने उर्दू दीवान का पहला वर्जन 1841 में पब्लिश करवाया था, जिसने उन्हें अपने ज़माने का सबसे बड़ा उर्दू शायर बना दिया. इसके बाद, ग़ालिब की बराबरी सिर्फ़ मुग़ल दरबार के शाही शायर शेख़ मुहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ (1789–1854) ही कर सकते थे.
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
साल 1850 तक, उर्दू दरबार की भाषा बन गई थी. ग़ालिब रेगुलर मुशायरों में शिरकत करने लगे. आखिरकार, बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र, जो खुद एक काबिल शायर थे, ग़ालिब की क़ाबिलियत और कामयाबियों को मानते हुए, इब्राहिम ज़ौक़ की मौत के बाद उन्हें अपना शायरी का उस्ताद नियुक्त किया.
वो अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़्अ क्यूँ छोड़ें
सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सरगिराँ क्यूँ हो
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब के सामने एक ऐसा दौर भी आया, जब उनके क़लम की चमक अंग्रेज़ों को कसकने लगी. ग़ालिब ने हिंदुस्तान में मौजूद अंग्रेज़ी अफ़सरों से लेकर लंदन और महारानी विक्टोरिया तक अपनी बात रखी. साइमन फ्रेजर और एंड्रयू स्टर्लिंग जैसे बड़े अफ़सरों ने ग़ालिब की सिफ़ारिश भी की, लेकिन बदलते सियासी माहौल में पुराने सामंती लोगों की कोई क़द्र नहीं रही. फैसला ग़ालिब के ख़िलाफ़ गया, क्योंकि वक़्त के साथ उनकी सियासी अहमियत ख़त्म हो चुकी थी. 1857 के बाद अंग्रेज़ ऐसे लोगों को 'बेकार तबक़ा' समझने लगे और नज़रअंदाज़ करने लगे.
1857 के इंक़लाब के बाद मिर्ज़ा ग़ालिब लिखते हैं...
लिखते रहे जुनूँ की हिकायात-ए-ख़ूँ-चकाँ
हर-चंद इस में हाथ हमारे क़लम हुए
इन दो मिसरों में ग़ालिब कहते हैं, "हमने अपने जुनून की सच्चाई बयां करना नहीं छोड़ा, चाहे हालात कितने ही मुश्किल क्यों नहीं हो गए. भले ही सच लिखने की सज़ा के तौर पर हमारे हाथ काट दिए गए, फिर भी हमने वो दर्दनाक कहानियां लिखना जारी रखा."
मिर्ज़ा ग़ालिब ने बग़ावत के बाद के 12 साल और देखे. 1860 में उनकी पेंशन बहाल हुई. यह शायद उनकी कोशिशों से ज़्यादा अंग्रेज़ों की नरमी या सर सैयद अहमद ख़ान और रामपुर के नवाब की मदद का नतीजा था, जिनकी उस दौर में ज़्यादा पकड़ थी.
मिर्ज़ा ग़ालिब की लेखनी वक़्त और दौर से पहरे है. उन्होंने 19वीं सदी में जो लिखा था, वो आज भी बड़ी दिलचस्पी के साथ सुना और पढ़ा जाता है. 1862 में ग़ालिब ने तीन शेर लिखे, जो शायद फ़र्रुख़ाबाद के नवाब को अंग्रेज़ों द्वारा विद्रोहियों की मदद करने के आरोप में पकड़े जाने और अरब के तट से दूर एक द्वीप पर छोड़ दिए जाने के जवाब में थे. ये शेर उस बेबसी और पलायनवाद को दिखाते हैं, जिसने ग़ालिब के दौर के मुसलमानों को परेशान किया था. ये उस मायूसी का भी प्रतिबिंब हैं, जिसका एक्सपीरिएंस मौजूदा वक़्त में भी लोग कर रहे हैं. क्योंकि लोग महसूस करते हैं कि उनकी जानी-पहचानी दुनिया हाथ से निकलती जा रही है.
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो
बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
कोई हम-साया न हो और पासबाँ कोई न हो
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो
- मिर्ज़ा ग़ालिब
मिर्ज़ा ग़ालिब अपने बाद आने वाले शायरों और समाज सुधारकों का दौर नहीं देख पाए. उन्होंने न तो उर्दू अदब में बढ़ती सामाजिक चेतना देखी और न ही नई सोच के तजुर्बे हासिल किए, उसके बाद भी मॉडर्न दुनिया उन्हें बड़े चाव के साथ पढ़ती है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने 11 साल की उम्र में ताज नगरी आगरा से उर्दू पोएट्री (शायरी) की दुनिया में क़दम रखा. साल 1812 के आस-पास ग़ालिब दिल्ली आए. उनके लिए यह एक ऐसा शहर था, जहां ज़िंदगी में बेहतर मौक़े मिलने की उम्मीदें थीं. पढ़े-लिखे लोगों की साहित्यिक ज़बान फ़ारसी थी, इसलिए उन्होंने ख़ुद से ही यह भाषा सीखी. जल्द ही, ग़ालिब फ़ारसी में शेर कहने लगे और उन्हें तारीफ़ें मिलने लगीं. उन्होंने मिर्ज़ा अब्दुल-कादिर बेदिल (1642–1720) की शायरी को अपना आइडियल बनाया, जो सबक़-ए हिंदी (फ़ारसी शायरी की खास हिंदुस्तानी शैली) के एक अच्छे हिंदुस्तानी शायर थे.
होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
शाइ'र तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब कोई आम शायर नहीं थे. जैसे हर जीनियस होता है, वैसे ही ग़ालिब भी एक रहस्य जैसे हैं. उनका नाम वक़्त, सरहद और तहज़ीब की हदों से आगे निकल चुका है. दिल्ली की पहचान कहे जाने वाले मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब की शायरी आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान में उतनी ही ज़िंदा है, जितनी उनके ज़माने में थी.
नई नस्ल के अहम शायर और रिवायत से मुख़्तलिफ़ लहजे की शायरी के लिए मशहूर नईम सरमद aajtak.in के साथ बातचीत में कहते हैं, "ग़ालिब जदीद (ताज़ा) हैं. जब सब लोग शायरी को जज़्बात-ओ-एहसासात पर बात करने का औजार समझ रहे थे, उस दौर में ग़ालिब आया और कुछ नया कर दिया. ग़ालिब के टूल्स अलग थे. जदीद वही तो होता है, जो ऐसी बातें करता है, जो आम तौर पर न हो रही हों. ग़ालिब सवाल करते हैं. ग़ालिब अपनी शायरी में सवालिया निशान लगाकर बात करने की कोशिश करते हैं. उनसे पहले लोग बहुत सवाल-जवाब के चक्कर में पड़ते नहीं थे. ग़ालिब का बयानिया (नैरेटिव) उस दौर के तमाम शोअरा से अलग है. ग़ालिब के मज़ामीन (विषय) अलग हैं, जो दिल्ली तक महददू नहीं रहते हैं. ग़ालिब के शेर अगर किसी दूसरे मुल्क का बाशिंदा सुनेगा, तो उसको लगेगा कि मेरी बात हो रही है."
नईम आगे कहते हैं, "बड़ा शायर वही होता है, जो आलमी शायर हो. जो एक मुल्क से दूसरे मुल्क में जाने से और एक ज़बान से दूसरे ज़बान में जाने से न ख़त्म हो जाए. एक ऐसी बात, जो ट्रांसलेशन में ज़ाया न हो. एक ऐसी बात जो शेर में न कही जाती तो कोई बात होती. जैसे ग़ालिब का एक शेर है- 'वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है, कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं', ये लगते तो बड़े आसान से दो ज़ुमले हैं, लेकिन यह कितना अच्छा बयान है, उस लम्हे का जब आपके घर में कोई आता है."
इसके साथ ही नईम कहते हैं कि ग़ालिब की प्रासंगिकता के पीछे एक प्रोपेगैंडा भी नज़र आता है, जो कई तंजीमों ने मिलकर चलाया है. प्रासंगिक होने का मतलब यह नहीं है कि कोई शख़्स अगर कुछ लिख रहा है और उसमें ग़ालिब के शेर का ज़िक्र कर दे."
उर्दू शायर शाहिद जमाल कहते हैं, "ग़ालिब ने यह बात बहुत पहले महसूस कर ली थी कि आने वाले वक़्त में ज़बान मुश्किलपसंदी की जकड़बंदियों से आज़ाद होकर आसान और अवामी होती चली जाएगी. लिहाज़ा उसने अपनी शायरी में वो ज़बान इस्तेमाल की, जो उस वक़्त से दो-चार सौर बरस बाद भी बोली और लिखी जाने वाली थी. यही वजह है कि उसने ज़िंदगी के तमाम मौज़ूआत को वो ज़बान अता की है कि देखते ही देखते उसके शेर बातचीत में शामिल होने लगे, तक़रीरों में Quote किए जाने लगे और बहुत से मिसरे तो गुफ़्तगू में मुहावरों और कहावतों की तरह इस्तेमाल होने लगे. यही वजह है कि ग़ालिब कल भी नया था, आज भी नया और आगे भी नया रहेगा."
नई पीढ़ी के जाने-माने लेखक और दास्तान-गो हिमांशु बाजपेयी कहते हैं, "ग़ालिब के यहां ज़िदगी के हर रंग पर शेर हैं, इसलिए वे प्रासंगिक हैं. ग़ालिब हमेशा प्रासंगिक रहेंगे. हमारे महाकवियों और बड़े शायरों की ख़ासियत ही यही होती है कि ये कालातीत होते हैं. यह वक़्त की हद से परे होते हैं. कोई भी दौर आए, इनकी तासीर जस की तस रहती है."
हिमांशु आगे कहते हैं, "ग़ालिब जब कहते हैं, 'दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है', तो बिल्कुल उनके पास बोलती हुई ज़बान है. उनके पास फ़िक्र की गहराई है. ग़ालिब का तख़ल्लुस ही अपने-आप में तर्जुमानी करता है कि किस शख़्सियत का ये आदमी रहा होगा. उर्दू में ऐसा ताक़तवर तख़ल्लुस कोई दूसरा नहीं है. ग़ालिब सच में सब पर ग़ालिब हैं और उनका ग़लबा ज़माने पर छाया हुआ है."
नईम सरमद कहते हैं, "कभी-कभी ये भी होता है कि लोगों को जो कुछ आसानी से नज़र आ रहा होता है, उसी पर बात करते हैं. हो सकता है ग़ालिब पर बात होने की एक वजह यह भी हो. ऐसा नहीं है कि उर्दू के सबसे बड़े शायर ग़ालिब ही हैं. जो शायर ग़ालिब से बड़े नहीं समझे जाते, उनको भी याद किया जाता है और वे Quote किए जाते हैं."
तुझ से क़िस्मत में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
इस शेर का ज़िक्र करते हुए नई सरमद कहते हैं कि इसको सुनकर एकदम से पता चला है कि यह ताले को देखकर लिखा गया है. ग़ालिब इस तरह के अश'आर कहते हैं. जब लोग मोहब्बत और इश्क़-ओ-आशिक़ी की बात कर रहे थे, तो ग़ालिब इस तरह की बात कर रहे थे-
''न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता'
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ग़ालिब बहुत दूर की सोच रखने वाले इंसान थे. इसके साथ ही, रोज़मर्रा की ज़िंदगी की मजबूरियों से भी वाक़िफ़ थे. उनकी बेचैनी कभी ख़त्म नहीं हुई. ग़ालिब ज़ेहन में इतने ख़याल थे कि उनको अल्फ़ाज़ के जादू में पूरी तरह क़ैद करना मुश्किल है. वह सिर्फ़ शायर नहीं थे, बल्कि ज़बान और सोच की एक ख़ूबसूरत मिसाल थे. उनका तख़ल्लुस ‘ग़ालिब’, यानी 'सब पर ग़ालिब आने वाला', उनके कद को बख़ूबी बयान करता है. उनकी शायरी में उदासी, तंज़, हिकमत और गहराई है, जो हर दौर में लोगों को अपनी तरफ़ खींचती है. इसीलिए ग़ालिब की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी.
ग़ालिब को समझना इतना आसान भी नहीं है. कभी वह ख़ुदा की मौजूदगी को महसूस करते हैं, तो कभी उसकी हर जगह मौजूद होने की ज़रूरत पर बात करते हैं. कई जगह वे रिवायतों को चुनौती देने वाले बाग़ी भी हैं. कई बार ग़ालिब सवाल छोड़ देते हैं और पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. एक फ़लसफ़ी के तौर पर मिर्ज़ा ग़ालिब बताते हैं, "दर्द भी उतना ही ज़रूरी है, जितना ख़ुशी को होना अहम है."
उन्नीसवीं सदी की उथल-पुथल, 1857 का ग़दर और दिल्ली की तबाही ग़ालिब ने अपनी आंखों से देखी. उन्होंने दिल्ली शहर को बिखरते और फिर बदलते देखा. दिल्ली उनके लिए टूटन और नई शुरुआत दोनों की निशानी थी. दिल्ली की तंग गलियों से लेकर क़ासिम जान की गली के बाज़ारों तक, आज भी ग़ालिब की यादें बसी हुई हैं. इसलिए आज भी शहर की रूह में ग़ालिब सांस लेते हैं. ग़ालिब का ज़ेहन और दिल इल्म और तजुर्बे की तलाश में लगातार धड़कता रहा. ज़िंदगी ने उन्हें तमाम ज़ख़्म दिए, लेकिन उन्हीं ज़ख़्मों ने उन्हें अमर बना दिया. दिलावर फ़िग़ार ने अपनी नज़्म 'ग़ालिब को बुरा क्यों कहो' के ज़रिए मज़ाकिया अंदाज़ में ग़ालिब की अज़मत बयान की है.
अजब तज़ाद की हामिल है उस की शख़्सिय्यत
अजीब शख़्स है बर्बाद हो के हँसता है
चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद ज़िंदगी उस की
इक आसरा है इक अरमाँ है इक तमन्ना है
जो उस को रोकना चाहो तो और तेज़ बहे
अजीब मौज-ए-रवाँ है अजीब दरिया है
- दिलावर फ़िगार
ग़ालिब की शायरी इंसानी जज़्बात, दर्द, मोहब्बत और ज़िंदगी के मतलब पर सवाल ख़ड़े करती है. यही वजह है कि आज के पढ़ने वाले भी उनसे ख़ुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. दिल्ली की गलियों, इसकी तहज़ीब और इतिहास की झलक ग़ालिब की शायरी में साफ़ दिखाई देती है. इसलिए ग़ालिब सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू अदब के एक टाइमलेस आइकन हैं, एक ऐसी पहचान, जो हमेशा ज़िदा रहेगी.
पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्याब
- मिर्ज़ा ग़ालिब
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ग़ालिब का जन्म आगरा में हुआ. यह वो दौर था, जब औरंगज़ेब दुनिया को अलविदा कह चुके थे और मुग़ल सल्तनत ढलान की तरफ़ आगे बढ़ चुका है. ग़ालिब के बचपन में ही वालिद का साया उठ गया. ननिहाल में परवरिश हुई. उन्होंने फ़लसफ़ा, इल्म-ए-हयात और मज़हब पढ़ा, लेकिन उनका दिल ज़बानों और शायरी में रमता था. फ़ारसी के बाद उर्दू में उन्होंने वो कमाल किया कि उर्दू शायरी को नई जान मिल गई.
ग़ालिब के ख़त भी उनकी अज़मत की मिसाल हैं. जानकारों का मानना है कि अगर उन्होंने सिर्फ़ ख़त ही लिखे होते, तब भी उर्दू अदब में उनका मुक़ाम तय था. उन्होंने रेख़्ता (हिंदुस्तानी भाषा का एक शुरुआती रूप, जिसे बाद में उर्दू के नाम से जाना गया) को ऐसी ऊंचाई दी है कि फ़ारसी बोलने वाले भी हैरान रह गए.
हालांकि, ग़ालिब की ज़िंदगी में ऐश-ओ-इशरत, शराब और जुए जैसी आदतें भी थीं. उनकी ख़्वाहिशें कभी ख़त्म नहीं हुईं. बीमारी और बुढ़ापे के बावजूद उन्होंने ज़िंदगी की लज़्ज़तों को छोड़ने से इंकार कर दिया.
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
- मिर्ज़ा ग़ालिब
(भले ही हाथ अब जाम उठाने के काबिल नहीं रहे, मगर आंखों की प्यास अभी बुझी नहीं है. क़लमकार सिर्फ़ शराब और सुराही को देखकर ही अपनी रूह को तसल्ली देना चाहता है, जो यह दर्शाता है कि शरीर थक सकता है लेकिन मन की चाहत आख़िरी दौर तक बनी रहती है.)
ग़ालिब को उर्दू शायरी का आख़िरी क्लासिकी शायर माना जाता है. उन्होंने पुराने दौर और नए ज़माने के बीच पुल का काम किया. सर सैयद अहमद ख़ान, नज़ीर अहमद, मुंशी मोहम्मद ज़काउल्लाह, अल्ताफ़ हुसैन हाली और दूसरे अदीबों पर उनका गहरा असर पड़ा.
आज भी ग़ालिब की शायरी महज़ इतिहास नहीं, बल्कि ज़िंदा एहसास हैं. दिल्ली में मुशायरों, जश्न-ए-रेख़्ता, फ़िल्मों, टीवी सीरियल्स और संगीत के ज़रिये ग़ालिब बार-बार लौटते रहते हैं. नसीरुद्दीन शाह से लेकर जगजीत सिंह, आबिदा परवीन, फ़रीदा ख़ानम और लता मंगेशकर तक, सबने मिर्ज़ा ग़ालिब के कलाम को नग़्मों में ढाला.
दिल्ली स्थित ग़ालिब की हवेली, उनका मज़ार और उनसे जुड़े तमाम सांस्कृतिक आयोजन इस बात का सबूत हैं कि मिर्ज़ा ग़ालिब आज भी दिल्ली की रगों में दौड़ते हैं.
मिर्ज़ा ग़ालिब का मॉडर्न रूप बॉलीवुड में भी दिखता है, जहां उनकी टाइमलेस शायरी नए एक्सप्रेशन और इंटरप्रिटेशन के ज़रिए कई बार पेश की गई. साल 1954 की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में ग़ालिब एक अलग पहलू दिखाया गया और उनकी इश्क़िया क़िस्सों पर फोकस किया गया. 1957 की फ़िल्म 'यहूदी की लड़की' में मधुबाला ने ग़ालिब की ग़ज़ल 'नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने' को बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में गुनगुनाया. यहां तक कि शाहरुख खान ने भी फ़िल्म 'दिल से' के गाने 'सतरंगी रे' के साथ ग़ालिब की जादुई दुनिया में क़दम रखा. इस गाने में एआर रहमान और गुलज़ार ने इस ग़ालिब के इस शेर का इस्तेमाल प्यार पर ज़ोर देने के लिए किया, जो जुनून की हद पर है- "इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाए न लगे और बुझाए न बने"
ग़ालिब की शायरी को रोमांटिक-पॉलिटिकल ड्रामा 'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी...' में भी एक परफेक्ट जगह मिली. शुभा मुद्गल द्वारा ग़ालिब की नज़्म की प्रज़ेंटेशन ने कहानी में और गहराई ला दी.
ग़ालिब का असर बॉलीवुड से भी आगे तक फैला हुआ है. नेटफ्लिक्स के 'Bridgerton' में एडविना शर्मा नाम का कैरेक्टर एक दूल्हे से पूछता है, "क्या तुमने ग़ालिब को पढ़ा है?", जो ब्रिटेन में भारतीय डायस्पोरा के बीच भी उनकी प्रासंगिकता और बड़े प्रभाव को दिखाता है. पीयूष मिश्रा का बैंड 'बल्लीमारान' ग़ालिब के असर की वजह से दुनिया भर में सुना जाता है.
सूफ़ी फ़िलॉसफ़ी से मुतअस्सिर ग़ालिब की शायरी, वजूद और मतलब में गहराई से उतरती है, जो अक्सर एक हल्का सा ख़ालीपन दिखाती है.
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
- मिर्ज़ा ग़ालिब
यह शेर ज़िंदगी की अहमियत पर सोचने को मजबूर करता है, जो पारंपरिक सूफी सोच को मॉडर्न इंट्रोस्पेक्शन यानी आत्मनिरीक्षण से जोड़ता है. यह शेर ग़ालिब के काम को आज के शहरी दिल्ली के साहित्यिक माहौल में बहुत ज़्यादा प्रासंगिक बनाता है. ग़ालिब की लेखनी वक़्त की सरहदों से आगे की चीज़ है. इक्कीसवीं सदी की दुनिया में बढ़ती कट्टरता और सांप्रदायिकता के बीच ग़ालिब की आवाज़ ज़ोर से गूंजती है. उनका नज़रिया धार्मिक और सांप्रदायिक बंटवारों से ऊपर है, जो आज की दुनिया में उनकी विरासत को और भी ज़्यादा अहम बनाता है.
न्यूयॉर्क में रहने वाले पाकिस्तानी आलोचक एजाज अहमद ने अमेरिकी नागरिकों को मिर्ज़ा ग़ालिब की सदाबहार शायरी से रूबरू करवाने के लिए 'Ghazals of Ghalib' टाइटल की एक किताब पब्लिश करवाई. उनका मक़सद, ग़ालिब को 19वीं सदी के एक ऐसे शायर के तौर पर पेश करना था, जो वक़्त, जगह और सिविलाइजेशन से परे है. यह काम ग़ालिब की शायरी की समकालीन प्रासंगिकता को उभारकर सामने लाता है. इससे यह भी नज़र आता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब और उनके क़लम से निकले अल्फ़ाज़ तहज़ीब और संस्कृति की सरहदों के पार गूंजते हैं.
अमेरिकी पोएट और निबंधकार रॉबर्ट ब्लाई (Robert Bly) के कलेक्शन 'The Lightning Should Have Fallen on Ghalib (1999)' और ब्रिटिश लेखक रसेल राल्फ (Ralph Russell) की किताब 'The Seeing Eye: Selections from the Urdu and Persian Ghazals of Ghalib (2003)' वेस्टर्न फॉर्मल पोएट्री और अमेरिकन ओरिएंटलिज़्म पर ग़ालिब के गहरे असर को और उजागर करती हैं. ये रचनाएं ग़ालिब के आधुनिक रूपांतरण को भी रेखांकित करती हैं. इससे यह दिखता है कि कैसे ग़ालिब की शेर-ओ-शायरी ने पश्चिम में शायरी के फॉर्म्स यानी रूपों को फिर से ज़िंदा किया है. ग़ालिब की शायरी के अर्क को अमेरिकी साहित्यिक चेतना में कलेक्ट किया गया है, जो समकालीन साहित्यिक हलकों में ग़ालिब की कभी न मिटने वाली प्रासंगिकता और प्रभाव को दिखाता है.
मोहम्मद साक़िब मज़ीद