कहानी - क्या मंटो फ्रेंच कहानियों से आइडिया चुराते थे? STORYBOX WITH JAMSHED

क्या 'नफ़ासत हसन' नाम का कैरेक्टर दरअसल सआदत हसन मंटो पर ही लिख गया था? क्या देवेंद्र सत्यार्थी ने शरारत करते हुए अपने दोस्त के बारे में दिखाया कि वो फ्रैंच राइटरों के मशहूर जुमलों को चुराकर अपनी कहानियों में डालता है? सुनिये मंटो की देवेंद्र पर लिखी कहानी के बाद देवेंद्र सत्यार्थी का जवाब, सुनिये स्टोरीबॉक्स के 'मंटो V/s सत्यार्थी' सीरीज़ की दूसरी और आख़िरी कहानी में, जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

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  • 26 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:42 PM IST

 

तो हुआ यूं कि एक बार सआदत हसन मंटो ने अपने दोस्त देवेंद्र सत्यार्थी से शरारत करने के लिए एक कहानी लिखी। देवेंद्र सत्यार्थी जो देश भर में घूमा करते थे और अपने चाहने वालों के घर में रुका करते थे। उनकी इसी आदत को लेकर सआदत हसन मंटो ने देवेंद्र से मिलता जुलता एक किरदार बनाया 'हरेंद्र' और कहानी में दिखाया कि हरेंद्र नाम का एक राइटर जानबूझ होटल के पैसे बचाने के लिए अपने फैंस के घर में रहने चला जाता है और तब तक नहीं निकलता जब तक फैंस परेशान होकर खुद उसे जाने के लिए नहीं कहते। देवेंद्र सत्यार्थी साहब जो खुद उर्दू हिंदी और पंजाबी के बड़े राइटर थे पद्मश्री भी थे, उन्होंने जब ये कहानी पढ़ी तो खूब हंसे और बोले कि मैं भी एक कहानी लिखूंगा और तुम्हें जवाब दूंगा। उन्होंने सआदत हसन से मिलता जुलता एक किरदार बनाया जिसका नाम रखा 'नफ़ासत हसन' और एक कहानी लिखी जिसमें नफ़ासत फ्रैंच राइटर्स की कहानियां पढ़ पढ़ कर उनके इस्तेमाल किये हुए जुमले अपनी कहानियों में डाल देता है। वो कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं। कहानी का नाम रखा गया - नए देवता  

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कहानी शुरु होती है -

गाजर के गर्म हलवे की ख़ुशबू से सारा कमरा महक उठा था... दिल्ली की वो दावत मुझे हमेशा याद रहेगी। उस दावत में बैठा हुआ मैं सोच रहा था कि इतना तो नफ़ासत हसन पहले भी कमा लेता होगा। बताओ... डेढ़ सौ रुपये के लिए उसने अपनी आज़ादी बेच दी और अब ख़ुश हो रहा है… भई हम तो बड़ा सुनते थे कि वो बड़ा इंकलाबी तबियत का आदमी है, बड़ा बाग़ी है फिर उसने ये नौकरी उसने कैसे कर ली? वो तो कैपिटलसिट सिस्टम के खिलाफ था... और आज खुद नौकरी की खुशी में दोस्तों को दावत दे रहा है?

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ख़ैर अपने को क्या अपने ख़्यालात पर तो गाजर का हलवा हावी हो रहा था... मक़नातीस यानि मैगनेट की तरह मुझे खंच रहा था। अगर ये हलवा न होता तो मैं शायद नफ़ासत हसन को और भी ज़्यादा तन्क़ीदी ज़ाविये से यानि क्रिटिकल एंगल से देखता।

गलवा खाते हुए मैं महफिल में आए लोगों को देखने लगा.... बहुतों के नामों से मैं नाआशना था। ख़ासकर उन अधेड़ साहब से जिन्हें सब मौलाना नूर हसन आरज़ू कह रहे थे... मैंने तो पहले कभी इन्हें फ़ोटो में भी नहीं देखा था। हालांकि उनकी आवाज़ मुझे बहुत प्यारी लगी। बहुत जल्द मैंने उनकी फ़साहत का लोहा मान लिया (फ़साहत यानि उनकी साफ ज़बान... एलोक्वेंस जिसे कहते हैं अंग्रेज़ी में)
ये महसूस होते भी देर न लगी कि उन्हें ऐसी-ऐसी दलीलों पर उबूर हासिल है यानि वो पारंगत हैं कि मौक़ा पड़ने पर वो अपने हरीफ़ को (हरीफ़ यानि प्रतिद्वंदी को) घास के तिनके की तरह अपनी राह से उड़ा दें। उम्र में वो कोई बूढ़े नही थे, अधेड़ कह सकते हैं... मगर नये ज़माने से उतना ही रिश्ता रखते थे कि सरकारी नौकरी की वजह से पाजामे और शेरवानी को ख़ैरबाद कहकर अंग्रेज़ी वज़ाका सूट पहनना शुरू कर दिया था।

बर्फ़ में लगी हुई गंडेरियों के ढेर पर सब दोस्त बढ़-बढ़कर हाथ मार रहे थे। (गंडेरियां अगर आप नहीं समझ पाए तो.... वो... गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़े छीलकर बर्फ पर सजाए जाते थे, गुलाब की पत्तियों के साथ... एक-एक टुकड़ा उठाइये और चबाइये) तो एक-एक गंडेरी का रस जैसे ही हलक से उतरता, मौलाना नूर हसन आरज़ू की आंखों में एक नई चमक आ जाती।
 

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तो ऐन उसी वक्त पर जब मौलाना ने खुला हुआ मुंह ऊपर करते हुए उसमें एक टुकड़ा डाला नफ़ासत ने कहा, भई ये गंडेरियाँ तो ख़ासतौर पर मौलाना ही के लिए मँगवाई गई हैंसब ने मौलाना को देखा तो मुंह ऊपर किये थे.. अचानक सब हंस लिये तो ज़रा झेंप गए। लेकिन फिर नाराज़गी छुपाते हुए बोले, और ये गाजर का हलवा ये किसके लिए है उन्होंने इसलिए कहा कि अभ बात किसी और की तरफ घूम जाएगी... लेकिन नफ़ासत ने फिर तीर उनकी तरफ ही घुमा दिया... अमां आप के लिए ही बनवाया है ये भी.. लीजिए लीजिए.. ये भी खाइये

सब लोग हंसे तो मौलाना भी मुस्कुरा दिये लेकिन उनकी आंखों में अब नफ़ासत गड़ने लगा था और इस गड़न की वजह था, वो अहसान था जो उन्होंने नफासत पर किया था। अब किया था या नहीं पता नहीं लेकिन कुछ लोगों का ख़्याल था कि उसे अपने डिपार्टमेंट में नौकरी दिलाने में मौलाना का बहुत हाथ था। मगर नफ़ासत हसन कहां किसी का एहसान मानता है।

बहरहाल, धीरे-धीरे महफ़िल छटने लगी। नये दोस्त ये ख़्याल लेकर लौटे कि नफ़ासत हसन एक मज़ेदार शख्सियत और दोस्त-नवाज़ आदमी है। वो फॉर्मैलिटी नहीं करता। और है भी ठीक। दोस्ती होनी चाहिए आज़ाद नज़्म सी... काहे का क़ाफ़िया और कैसा रदीफ़... बिल्कुल आज़ाद...

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अच्छा, मौलाना बराबर जमे हुए थे। अब उन्हें नफ़ासत से बदला लेना था… तो उन्हें एक शरारत सूझी.... उन्होंने जब देखा कि मैं नफ़ासत के पास बैठा हूं... (मैं यानि सत्यार्थी साहब जिन्होंने ये कहानी लिखी)... तो मौलाना ने जब देखा कि मैं नफ़ासत हसन के पास बैठा हूं... उसे सुनाते हुए मुझसे बोले....

अरे भई एक बात बताइए… आपने समरसेट माम पढ़ा है?”

(अच्छा आप में से जो नहीं जानते विलियम समरसेट मॉम Maugham मौम…. एक बड़े अंग्रेजी राइटर थे, जो अपने नाटकों, नॉवल्स और शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए बड़े मशहूर थे... 1965 के आसापास उनका इंतकाल हुआ... तो यहां उन्ही की बात हो रही है)

 

तो भई उन्होंने पूछा तो मैंने तो नहीं पढ़ा था... लेकिन अब सीधे-सीधे नहीं कहना भी बुरा लगता है… मैंने गोल-मोल जवाब दिया… कहा अब साहिब, कहाँ तक पढ़ा जाए.. इतनी तो राइटर्स हैं.. लेकिन ख़ैर अब मैं समरसेट माम का ख़्याल रखूँगा और ये कहकर मैं दूसरी तरफ देखने लगा... हालांकि मैं बेकार परेशान हो रहा था मौलाना साहब निशाना नफ़ासत पर ताने थे, मेरे बहाने वो उसे सुना रहे थे... तो जब मैंने गोल मोल जवाब दिया तो बोले,

  •  “अरे भई... सीधेसीधे कहिए न कि आपने समर सेट माम की कोई किताब नहीं पढ़ी

मुझे बड़ा अजीब लगा कि यार ये मौलाना साहब बदतमीज़ी क्यों कर रहे हैं… उनकी नज़रें बार-बार नफ़ासत हसन पर जा रही थीं। मैंने झेंपते हुए जवाब दिया, जी हाँ, यही समझ लीजिए फिर उन्होंने दोस्तों की तरफ देखा और जैसे कोई पुरानी बात याद दिला रहे हों, उस अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोले,

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  • तो इसका तो यही मतलब हुआ कि आपने अपनी अब तक की उम्र यूं ही बेकार कर दी

दोस्त हंस पड़े.... दरअसल मामला ये था कि नफ़ासत हसन समरसेट मॉम का बड़ा आशिक… ये नफ़ासत हसन का ही जुमला था और वो अक्सर लोगों से कहता पाया जाता था कि अगर आपने समरसेट मॉम को नहीं पढ़ा तो अपनी अभी तक की ज़िंदगी बेकार कर दी तो मौलाना साहब मेरे बहाने उससे मज़े ले रहे थे। इस पर नफ़ासत हसन बिगड़ गया। गर्मागर्म बहस छिड़ गई। और मौलाना और नफ़ासत हसन के बीच तूतू मैंने शुरू हो गई... नफ़ासत हसन चीखने चिल्लाने लगा… बोला, बस बस... चुप रहिए मौलाना। इतनी ज़बान मत खोलिए

मौलाना बोले, “ये तमीज़ है? म्र ही में सही, मैं तुम्हारे वालिद के बराबर हूँ

वालिद... रहन दीजिए... अपनी हरकतें देखिए पहले... कहिये तो खोल दूं सारी पोल-पट्टी... बड़े आये हैं वालिद के बराबर

  • “क्या पोल पट्टी बोलो” कहकर बोलो मौलाना भी चीखे। बात आगे बढ़ गई… मुझे तो लगा कि कहीं दोनों हाथापाई न कर बैठें।

अब देखिए... हक की बात तो यो है कि दावत नफ़ासत हसन के घर पर थी... वो मेज़बान था तो उसे मेहमान का लिहाज़ करना चाहिए था। लेकिन मैं दूसरी चीज़ सोचने लगा… मैंने सोचा कि आखिर समरसेट माम पर नफ़ासत हसन इतना क्यों फ़िदा है?  समरसेट माम आख़िर क्या लिखता होगा? भई, ऐसा आशिक तो समरसेट को उसके अपने वतन इंग्लैंड में भी नहीं होगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि नफ़ासत हसन अपनी बातचीत में जिन जुमलों को नगीनों की तरह लगाता है... जो तश्बीहे वो इस्तेमाल करता है... वो विलायत की किसी फ़ैक्ट्री से बन कर आये हैं। जैसे एक जुमला मैं सुनाता हूं...

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एक दिन नफ़ासत ने मुझसे पूछा, “ये बताइए साहब कि औरत किस वक़्त सबसे खूबसूरत लगती है?
अब मैं क्या कहता... मैं समझ गया ये खुद कुछ कहना चाहते हैं... तो मैंने कहा आप ही बताइये
नफ़ासत ने पहले सोचने का बहाना सा किया और फिर कुर्सी पर पहलू बदला और बोला... जब वो तीन दिन से बुख़ार में हो और उसके हाथों की रगें नीली पड़ जायें। तब औरत सबसे खूबसूरत लगती है अब देखिए ये कुछ अलग टाइप की बात तो है लगता है किसी बड़े राइटर की कही बात है... लेकिन कुछ-कुछ लग तो रही है कि समरसेट मॉम की फैक्ट्री में बनी हुई है। है कि नहीं?

ख़ैर... वापस आते हैं उस दिन वाली दावत पर... तो मौलाना और नफासत की तूतू-मैंमैं के बाद... मैंने नफ़ासत को थोड़ा ठंडा करने के लिए कहा। अरे नाराज़गी छोड़ो मियां! वैसे समरसेट माम तो सच में एक देवता है
वो बोला और मैं?
मैंने कहा आप भी देवता हैं, मियां भई देखिए देवताओं में तीन बड़े देवता हैं... ब्रह्मा, विष्णु और शिव। अपनी-अपनी अहमियत की वजह से वो बेहद ख़ास हैं। ब्रह्मा जन्म देते हैं, विष्णु परवरिश करते हैं और शिव ठहरे मौत का नाच नाचने वाले... नटराज

नफ़ासत हसन का ध्यान अब मेरी तरफ़ खिंच गया। उधर मौलाना ने भी मेरी तरफ दिलचस्पी से देखा। मैंने कहा, देखिए, हर राइटर अलग-अलग वक्त में ब्रह्मा, विष्णु और शिव होता है। जब एक राइटर एक चीज़ लिखने में कामयाब हो जाता है। तो वो ब्रह्मा होता है... वो उस चीज़ को सँभाल-सँभाल कर आगे बढ़ाता है, करेक्शन करता है तब वो विष्णु हो जाता है.... और जब वो अपने ही हाथ से किसी तहरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है, तब वो सौ फ़ीसदी शिव का रूप धार लेता है

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मौलाना बोले, बहुत ख़ूब! तखय्युल तो कमाल का है आपका

मैंने शर्माते हुए कहा,नहीं... ये... ये ये मेरा नही है
तो किस का है
मैंने कहा वो... बंबई की PEN सोसाइटी में बुलबुल-ए-हिंद मिसेज़ सरोजनी नायडू ने मेरी एक राइटिंग पढ़कर ऐसा कहा था
मौलाना बोले, वाह क्या बात है। बहुत ही खूबसूरतक्या कहा है सरोजनी नायडू जी ने... लेकिन कुछ अपना भी तो सुनाइये...कोई तबाज़ाद यानि कुछ ऐसा जो इसके कॉट्राडिक्टरी हो

मैंने कहा, “तबाज़द जैसी कोई चीज़ होती नही है.....”

  • क्या कहा, नहीं होती?” नफ़ासत हसन मुझे टोकते हुए बोला, कैसे नही होती... मैं सुनाता हूं फिर गला खंखार कर बोला सुनिये... जब सुबह की पहली किरन आँखें मलती हुई धरती पर उतरी तब पास की कच्ची दीवार अंगड़ाई ले रही थी

 “हैं... दीवार अंगड़ाई ले रही थी?मौलाना ने दोहराया,

मैंने दबी आवाज़ में कहा, हां इस वक़्त नफ़ासत हसन ब्रह्मा हैं

सब लोग ज़ोर से हंस लिये। नफ़ासत हसन को बुरा लगा, लेकिन चुप रहा।

हालांकि वो चुप कम ही रहता था... और वो इसलिए क्योंकि उसके दोस्तों ने उसे कह दिया था कि वो बड़ा साफ़-गो आदमी है… यानि बिना लाग-लपेट के बोलने वाला। एक-दो बार किसी ने बोल दिया तो वही समझने लगा खुद को। और वो मानने लगा कि वो वाकई साफ-गो है। इतना साफ गो कि जब उसने नौकरी के लिए एप्लिकेशन भेजी तो उसमें भी साफ-साफ लिख दिया कि भई उसके पास एक्सपीरियंस वैश्याओं को पढ़ने का है। ये अलग बात है कि नौकरी उसे किसी की सिफारिश से ही मिली… लेकिन उसे लगा कि उसकी साफगोई का लोहा दुनिया मानती है।

नफ़ासत हसन के ज़ेह्न में ये वहम समा गया था कि वो एक राइटर के तौर पर किसी भी बे-जान चीज़ से कुछ भी करवा सकता है। अपने एक अफ़्साने में उसने एक पत्थर की बायोग्राफी लिखी थी जो अचानक एक लड़की के गले लगने के लिए बेक़रार हो गया था। आदमी तो अब भी आदमी है। लेकिन पत्थर अब पत्थर नहीं है। साइकॉलोजी की सरहदें अब लो लांघ चुका है। पत्थर अब पत्थर नहीं है, बिजली का खंबा बिजली का खंबा नहीं है। वो तो अपने सिगरेट केस में भी दिल डाल सकता है… वो जो चाहे कर सकता है...

अभी उसे किसी का फूला हुआ थैला देखकर प्रैगनेंट औरत के पेट का ध्यान आ जाएगा… किसी के बोलने का तरीका सोडे के बुलबुले की तरह बता देगा... किसी की नाक को चीनी की प्याली की ठूंठनी की तरह लिख देगा वो कुछ भी लिख सकता है... क्योंकि वो नफ़ासत हसन है… साफ गो।

ख़ैर... शाम हो चली थी। मेहमान जा चुके थे। अब हम ही तीन लोग बचे थे। मैं, मौलाना नूर हसन आरज़ू और खुद नफ़ासत हसन। नफ़ासत ने एक अंगड़ाई ली और उठकर खड़ा हो गया और अपनी उँगलियों से बालों में कंघी करता हुआ छज्जे पर आया। निकलसन रोड के पास के टेलर मास्टर की दुकान में बिजली के कुमकुमे रोशन हो चुके थे। छज्जे पर खड़ा-खड़ा नफ़ासत हसन बोला, मौलाना! चलो, लगे हाथों सरदारजी से ही मिलते आएँ

ये सरदार जी कौन हैं?” मैंने पूछा तो नफ़ासत ने जवाब तो नहीं दिया लेकिन बोला, आप भी चलिए हमारे साथ... मिलवा के लाता हूं.. चलिये हम तीनों चल दिये। कुछ देर बाद हम उसके घर की सीढ़ियों से उतर रहे थे... उस वक्त मैंने ग़ौर किया कि नफ़ासत सीढ़ी से उतरते वक्त पांव को ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर से ज़मीन पर फेंकता था और फट- फट की आवाज़ से जो शोर पैदा होता था जिससे पड़ोसी डिस्टर्ब होते थे। जब कोई पड़ोसी की चीखती आवाज़ आती अबे ये कौन आवाज़ कर रहा हैख़ामोशी से नहीं चल सकता?... तो नफ़ासत हसन कहता आप मेरी आवाज़ दबा नहीं सकते, मैं एक इंकलाबी राइटर हूं और अगर आप मेरी आवाज़ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं तो इसका मतलब ये समाज ही नाकाबिल ए बर्दाश्त है

ख़ैर थोड़ी देर बाद.... एक बड़े लंबे चौड़े बाज़ार में घूमते घामते हम आख़िर सरदारजी की दुकान पर पहुंच गये। वो शराब की एक दुकान थी जो बड़ी बदबूदार जगह थी। मेज़ पर संगमरमर की सिलों पर सोडा और विस्की जमी हुई थी और हमारी नशिस्त गाह के क़रीब ही टूटे हुए आबखू़रों का अंबार लग रहा था। यानि मटको का। एक आदमी खाली बोतलें के ढेर के पास बैठा बीड़ी पी रहा था.... और उससे थोड़ी दूर पर दूसरा उधेड़ उम्र का आदमी अपनी टांगें एक टूटी अलमारी पर टिकाए मुँह खोले बेहोश पड़ा था। पहले तो मुझे लगा कि हम उसी आदमी से मिलने आए हैं जो बेहोश है… लेकिन ख़ैर... जान में जान तब आई जब नफ़ासत ने पहले वाले से कहा, ओ मियां जुम्मां! लाओ तो सरदार जी को

ख़ैर थोड़ी देर बाद एक सरदार जी आए... बैठे... और मेज़ पर विस्की की बोतलें सज गईं। फिर इधर उधर की बातें होने लगीं... जैसे दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे अहम बातें यहीं हो रही हैं। सरदार जी और नफ़ासत एक दूसरे को बताने लगे कि वो दुनिया में क्या करना चाहते हैंनफ़ासत हसन ने एक अहम बात बताई कि वो इतना खुल कर इसलिए लिख पाता है क्योंकि उसे कब्ज़ की शिकायत नहीं है। उसके मुताबिक राइटर्स को कब्ज़ियत बहुत रहती है। उसने ये भी बताया कि वो क्या लिखकर दुनिया से जाना चाहता है बोला, बस ये एक चीज़ लिख लूँगा, एक चीज़, उसके बाद में मर भी जाऊं तो कोई गम नहीं... यही समझूँगा कि मैंने ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा काम किया है

मौलाना और मेरी नज़र नफ़ासत हसन के चेहरे की तरफ़ उठ गई। वो आगे बोला, “दरअसल एक कहानी है, कुछ इस तरह से है कि... उन दिनों मैं बंबई में रहता था। मेरे मकान का एक दरवाज़ा एक ग़ुस्ल-ख़ाने में खुलता था। उस ग़ुस्ल-ख़ाने में एक छोटी सी दराज़ थी… झिर्री सी... जब गुसलखाने में कोई नहाता था तो उस दरार से नज़र आता था... मुझे उस गुसलखाने में नहाने वालों के बारे में कुछ लिखना है

हैं.... मैंने चौंक कर मौलाना को देखा... ये क्या बोल रहा है नफ़ासत।
नफ़ासत ने हमें ऐसे देखा जैसे हम अनपढ़ हैं और वो कोई बड़ा फ़िलॉसफर है... बोला...
देखिए क्या है कि आदमी... असल ज़िंदगी में जो भी हो... उसका असली किरदार तब नज़र आता है जब वो गुसलखाने में हो... और उसे यकीन हो कि उसे कोई नहीं देख रहा... तब वो क्या करता है... उसकी बॉडी लैंग्वेज क्या है... कौन सा गाना गाता है... क्या सोचकर मुस्कुराता है... किसे याद करता है... पानी कैसे खुद पर उछालता है... इससे बहुत कुछ मालूम होता है उसके बारे में

मुझे कसम से बड़ी ज़ोर की हंसी आ रही थी लेकिन मैं खामोश रहा..... मौलाना, ग़ौर से सुन रहे थे, जैसे वाकई कोई बड़ी बात कही जा रही है। तभी नफ़ासत हसन के दिल में ख़्याल आया कि उसने मौलाना के साथ घर पर बदतमीज़ी की थी... वो उठा और वो किया जो नशे में आम तौर पर लोग करते हैं... उसने मौलाना को गले लगाने की कोशिश की और फिर अपना गाल उनकी तरफ करके इशारा किया… कि यहा प्यार कीजिए.... मैंने हंसी कैसे रोकी मैं जानता हूं जब मौलाना ने उसका गाल चूम लिया... इसके बाद अचानक मौलाना ने उठकर बड़े ख़ुलूस से छाती पर हाथ रखते हुए कहा, देखो भाई अब तुम मानोगे। मैं समरसेट माम हूँ नफ़ासत हसन ने अपनी छाती पर हाथ रखते हुए कहा, मैं समरसेट माम हूँ

फिर मौलाना ने कहा, तुम समरसेट माम हो... मुझे लगा मैं समरसेट मॉम हूं... कहीं ऐसा तो नहीं कि हम दोनों समरटसेट माम हैं... नफ़ासत बोला हां हम दोनों समरसेट मॉम हैं... जो है समरसेट माम है, जो नहीं है वो भी समरसेट माम है... और पता है ये समरसेट माम भी समरसेट माम है और ये कहकर दोनों गले लग गए।

---- समाप्त ----

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