कहानी | साग मीट | भीष्म साहनी

"मेरे तो तीन-तीन डिब्बे घी के महीने में निकल जाते हैं. नौकरों के लिए डालडा रखा हुआ है लेकिन कौन जाने ये मुए हमें डालडा खिलाते हों और खुद देसी घी हड़प जाते हो। आज के जमाने में किसी का एतबार नहीं किया जा सकता. मैं ताले तो नहीं लगा सकती. यह दूसरा नौकर मथरा सात रोटियाँ सवेरे और सात रोटियाँ गिनकर शाम को खाता है और बहन, बीच में इसे दो बार चाय भी चाहिए... और घर में जो मिठाई हो वह भी इसे दो. लेकिन मैं कहती हूँ, “ठीक है, कम से कम टिका तो है, भई आजकल किसी नौकर का भरोसा थोड़ी है। कब कह दे - मैं जा रहा हूँ” ये भी मुझे यही कहते हैं,कुत्ते के मुँह में हड्डी दिए रहो तो नहीं भौंकेगा" - सुनिये भीष्म साहनी की मशहूर कहानी 'साग मीट' स्टोरीबॉक्स में @Jamshedhumd से

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 11 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:08 PM IST

कहानी - साग मीट 
राइटर - भीष्म सहानी


साग-मीट बनाना बड़ा मुश्किल काम है... ऐ बहन आज खाना यहीं खाकर जाओ, मैं तुम्हारे सामने बनवाऊँगी, सीख भी लेना और खा भी लेना। रुकोगी न?  इन्हें साग-मीट बहुत पसंद है। जब कभी दोस्तों  को खाने पर बुलाते हैं साग-मीट जरूर बनवाते हैं। हाय, साग-मीट तो जग्गा‍ बनाता था। वह होता, तो मैं उससे साग-मीट बनवाकर तुम्हें खिलाती। उसके हाथ में बड़ा ज़ायका था। वह उसमें घी डालता, लहसुन डालता, जाने क्या-क्या डालता। बड़े शौक से बनाता था। मेरे तो तीन-तीन डिब्बे घी के महीने में निकल जाते हैं। नौकरों के लिए डालडा रखा हुआ है, पर कौन जाने, मुए हमें डालडा खिलाते हों और खुद अच्छा। घी हड़प जाते हो। आज के जमाने में किसी का एतबार नहीं किया जा सकता। मैं ताले तो नहीं लगा सकती। मुझसे ताले नहीं लगते। मैं कहती हूँ, खाते हैं तो खाएँ। कितना खा लेंगे! मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती, ताले कौन लगाए? यह मथरा सात रोटियाँ सवेरे और सात रोटियाँ गिनकर शाम को खाता है। बीच में इसे दो बार चाय भी चाहिए, और घर में जो मिठाई हो, वह भी इसे दो। पर मैं कहती हूँ, ठीक है, कम से कम टिका तो है, भई आजकल किसी नौकर का भरोसा थोड़ी है कब कह दे - मैं जा रहा हूँ” (बाकी की कहानी नीचे लिखी है लेकिन अगर आप इसी कहानी को जमशेद क़मर सिद्दीकी से सुनना चाहते हैं तो नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें

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ये भी मुझे यही कहते हैं, 'कुत्ते के मुँह में हड्डी दिए रहो तो नहीं भौंकेगा। सत्तर रुपये पर इसे रखा था, अब सौ लेता है। अरे इधऱ खिसक कर बैठो... आराम से... कहां जाने की जल्दी में हो... कभी कभी तो आती हो... लो तकिया लो... हां तो क्या बता रही थी.. सत्तर पर रखा था इसे... फिर भी इसके तेवर चढ़े रहते हैं। पर जग्गा बड़ा नेक नौकर और बावर्ची था। बड़ा नमकहलाल। नौकर क्या कहें समझो घर का आदमी था। वह इन्हें बहुत मानता था। एक बार ये कुछ कह दें, तो मजाल है, वह पूरा न करे। बड़ा वफादार। ये भी तो नौकर को नौकर नहीं समझते। जब-तब उसे कभी सौ-पचास दे देते, कहीं कोई लिखत नहीं, कोई हिसाब नहीं। जग्गा जब बीवी ब्याह कर लाया  तो दो जोड़े और एक गर्म कोट भी सिलवाकर दिया बताओ। मैं इनसे कहूँ 'अरे क्यों पैसे लुटाते हो।  नौकर किसी के अपने नहीं होते' ये कहते 'तू अपना काम देख, यह हमें साग-मीट खिलाता रहे, मुझसे जो माँगेगा, दूँगा। इस-जैसा बावर्ची तो शहर-भर में नहीं होगा' अब क्या ही कहूं मैं बहन...

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अच्छा ये काँटे कहाँ से बनवाए हैं? बड़े प्यारे लग रहे हैं। आजकल हर चीज को आग लगी हुई है। मैंने यह नाक की कील बनवाई, देखो...  इतना छोटा-सा हीरा इसमें लगा है, पर पूरे सात सौ खुल गए। अब तो मुझे पहनते भी डर लगता है। जब जग्गां था, तो मेरी जेवरों की पिटारी भी बाहर पड़ी रहती थी। कभी दो पैसे भी इधर-उधर नहीं हुए। ऐसी भुलक्काड़ हूँ, कभी चेन गुसलखाने में रह जाती कभी तिपाई पर रह जाती, जग्गा उठाकर दे देता। पर अब तो ऐसे नौकर आए हैं, हरे राम, मैंने सारे जेवर उठाकर बैंक में रख दिए हैं।

जग्गा से पहले एक नौकर था हमारे यहां, मंसा नाम का। ऊपर से बड़ा शरीफ। लगता था मुँह में जबान नहीं है। पर एक दिन मैं पिछवाड़े की तरफ से घर आ रही थी, तो क्या देखती हूँ, मंसा छत पर खड़ा है और गली में खड़े आदमी को ऊपर से एक-एक करके कपड़े फेंक रहा है। मुझे देखते ही दोनों चंपत। मंसा गली में कूद गया और वहीं से भाग गया। आजकल नौकर रखने का जमाना नहीं है। जग्गा था, तो मुझे कोई फिक्र नहीं होती थी। वह हाथ का बड़ा साफ था।

अरे कुछ खाओ बहन... तुमने कुछ भी नहीं लिया... गर्म चाय मँगवाऊँ? इसे छोड़ दो, यह ठंडी हो गई होगी, लो केक लो... मार्केट का है पर है बहुत टेस्टी। केक तो बनाती है वो, कमला की सास, एक-से-एक बढ़िया। कभी उसमें चाकलेट डालती है, कभी कुछ, कभी कुछ। बेकरी वाले जो महंगे महंगे केक बेचते हैं कमला की सास घर में बना लेती है। बीच में अंडे भी, दूध-चीनी भी, किशमिश और बादाम भी, जाने क्या-क्या। (हसीं) मुझसे तो अपनी जान नहीं सँभाली जाती। वैसे केक जग्गा भी बहुत अच्छे बनाता था। पर उसकी किस्म खराब थी, नहीं तो आज तुम्हें उसी के हाथ का केक खिलाती। हर तीसरे-चौथे दिन केक बनाता था, पर खुद कभी नहीं खाता था। मैं उससे कहूँ, “तू भी एक टुकड़ा खा लेपर नहीं।

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(गहरी सांस) किसे मालूम था कि वो यूं चला जाएगा। मैं तो अब भी कहती हूँ, बक देता, तो बच जाता। पर अपनी-अपनी किस्मत है, कोई क्या करे! इनके सामने मुँह ही नहीं खोला। बहुत मानता था इन्हें। अच्छा, बोला इसलिए नहीं कि इनके दिल को ठेस पहुँचेगी। और क्या बात हो सकती थी? अब अंदर की बात इन्हें क्या मालूम? वह बताए, तो पता चले। वह तो मैं जानती थी उसके मन में क्या था, उसने हवा तक नहीं लगने दी।

हैं?... तुम्हें नहीं बताया मैंने? सही में.... अरे तो सुनो न... भगवान झूठ न बुलवाए, एक दिन दोपहर को मैं उठी। गुसलखाने की तरफ जा रही थी, जब मुझे खटका-सा हुआ। लगा, जैसे कोई जग्गे की कोठरी की तरफ जा रहा है। मैंने सोचा इस वक्ते कौन हो सकता है? जग्गे को तो इस वक्त, ये अपने दफ्तर बुला लेते हैं। मैंने खिड़की से झाँककर देखा। हाय, यह तो बिक्की है, बिक्की...मेरा देवरकाला सूट पहने, दबे पाँव चला जा रहा था, और सीधा जग्गे की कोठरी मेंफिर मैंने सोचा, किसी काम से आया होगा। पर जग्गे की कोठरी में उसका क्या काम? और यह दबे पाँव क्यों जा रहा है? वहां तो जग्गे की बीवी अकेली थी। ख़ैर मुझे क्या करना था.. वो जाने उसका काम जाने... लेकिन फिर ... ध्यान बार-बार जाए..... कि भई ये सब करना है तो शादी क्यो नहीं कर लेता... किसी का घर क्यों खराब करता है?

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अच्छे तुमने जग्गे की घरवाली देखी थी ना? बड़ी भोली-सी लड़की थी, गोरी इतनी, हाथ लगाओ मैली हो जाए... और यह कलमुँहा रोज़ किसी बहाने दफ्तर से भाग आता और कोठरी में जा घुसता। अच्छा उस दिन मेरी नजर पड़ गई। गाँव की लड़की, सहमी-सहमी-सी, इस चंट के आगे क्या बोलती?

हैं... धीरे बोल... इनके घर में बदचलनी बहुत है। बस समझ लो ये ही एक शरीफ हैं। इनके चाचा ने भी दो-दो रखैल रखी हुई थीं। इनकी चाची, बुढ़िया, दोपहर को अपने एक नौकर से पाँव दबवाती थी। मैंने खुद देखा है। खाना खाने के बाद अपने कमरे में घुस जाती और पीछे-पीछे मुस्टंडा शंकर पहुँच जाता। अब ऐसी बातें छिपी तो नहीं रह सकतीं ना।

एक दिन जग्गे- ने ही देख लिया। इन्होंने थर्मस मँगवाने के लिए जग्गे को घर पर भेजा। मैंने उसे थर्मस दी और वह अपनी कोठरी की तरफ चला गया। अचानक मैंने खिड़की के बाहर झाँककर देखा। बिक्की, वही काला सूट पहने, जग्गे की कोठरी में से बाहर निकल रहा था। जग्गे ने टोक दिया 'बिक्की बाबू...! अरे... उसका मुँह इतना सा। बिना उसकी ओर देखे, चुपचाप वहाँ से निकल गया। मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने कहा, 'अब इसकी घरवाली की खैर नहीं। यह उसे धुन देगा। इन लोगों का कुछ पता थोड़े ही लगता है लेकिन बहन कोठरी के अंदर से न हूँ, न हाँ।'

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अब भई, मुझे तो जानती हो... ज़्यादा मतलब रखती नहीं किसी से... मैं तो जाकर लेट गई, पर फिक्र थी... मैंने सोचा कि आज रात मैं इनसे बात करूँगी। या तो जग्गा को चलता करें, या उससे कहें कि अपनी घरवाली को गाँव छोड़ आए। यहाँ इसका रहना ठीक नहीं। लेटे-लेटे भी मेरे कान कोठरी की ओर लगे रहे। अभी वहाँ से रोने-चिल्ला ने, पीटने-रोने की आवाज आएगी। पर वहाँ बिल्कुल चुप! मैंने सोचा कि ऐसा शरीफ आदमी भी किस काम का, कि अपनी घरवाली को काबू में नहीं रख सकता। दो लप्पड़ मुँह पर लगाता, तो अपने-आप सीधे रास्ते पर आ जाती। अरे दस तरीके हैं, औरत को सीधे रास्ते पर लाने के। पर यहाँ न हूँ, न हाँ।

फिर बहन...पलंग पर लेटे-लेटे ही मुझे ऐसी घबराहट हुई कि बाथरूम जाने की ज़रूरत पड़ गयी। मुझे कब्ज़ भी रहता है ना। रोज रात को ईसबगोल की भूसी दूध में डालकर लेती हूँ, तब जाकर सुबह पेट साफ होता है।

तो ख़ैर, उस दिन जो शाम को ये घर आए, तो आते ही कहने लगे, 'कहाँ है जग्गा?... उससे कहो, पाँच आदमी रात को खाना खाने आएँगे, बढ़िया सब्ज़ियां बनाए और साग-मीट बनाये'  ये लो.... खैर... जग्गा आया, गुमसुम इनके सामने आकर खड़ा हो गया। चेहरा ऐसा पीला, जैसा मुर्दे का होता है। इन्होंने बड़े लाड़ से पूछा, 'क्यों जग्गा क्या बात है' पर जग्गा चुप, न हूँ, न हाँ। अब भई इनसे कैसे कहता कि आपका भाई मेरी घरवाली के साथ... अरे ग़ैरत भी तो कुछ होती है।

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अब जह वो कुछ ना बोला तो इन्हें गुस्सा आ गया... वो तो मैने समझाया... वह गुमसुम रसोईघर में चला गया। थोड़ी देर बाद मैं रसोईघर में गई कि खाने-वाने का देखूँ, तो यह वैसे-का-वैसा गुमसुम खड़ा। पत्थर की मूरत बना हुआ। मैंने कहा, इसकी दिमाग खराब तो नहीं हो गया... मैं लौट आई। मैंने इनसे कहा, ये खुद किचन की तरफ चले गए। और उसे फटकारने लगे। मुझे डर लग था कि क्या मालूम, जग्गे ने कोई छुरा-वुरा न छिपा रखा हो। भई इन लोगों का क्या भरोसा? अब ये चिल्लाएं वहां बदजात बोलता क्यों  नहीं?”  मेरी तो ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे। ख़ैर इन्हें समझाने लगी 'कुछ न कहो जी घंटे-दो घंटे में मेहमान आने वाले हैं, और अभी यह चला जाएगा, तो खाना कौन बनाएगा। जैसे-तैसे इन्हें खींच लायी।

अब सुनो आगे की बात.... रात को जब मेहमान चले गए... हैं? अरे लो ये बिस्कुट खाओ... खाती रहो... आराम से... हां तो रात को ये बड़े  खुश कि जग्गा तुमने बड़ा अच्छा खाना बनाया... तारीफ की.. तब भी वो बिल्कुल मूर्ति की तरह खड़ा रहा... गुमसुम... ख़ैर ये चले गए सोने...

दूसरे दिन सुबह, यही आठ-साढ़े आठ का वक्त होगा, मैं बरामदे में बैठी बाल सुखा रही थी। वहाँ धूप अच्छी पड़ती है। मैंने सोचा, बाल सूख जाएँ, तो उन्हें  काला करूँ। यही आठ-साढ़े आठ का वक्ते होगा। उसी वक्त फ्रंटियर मेल आती है। घर के पिछवाड़े थोड़ी दूर पर ही तो रेलवे लाइन है। अगर गाड़ियों को सिगनल नहीं मिले, तो यहीं पर रुक जाती हैं, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। पर फ्रंटियर मेल यहाँ नहीं रुकती। वही एक गाड़ी है, जो यहाँ खड़ी नहीं होती।

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जग्गे ने पहले से ही सबकुछ सोच रखा होगा। उधर से गाड़ी आई, तो जग्गा अपनी कोठरी में से निकला। मैंने कहा, “जग्गेमुझे लगा जैसे उसने सुना नहीं। वह भागकर पिछवाड़े की दीवार फाँद गया और रेलवे लाइन की ढलान चढ़ने लगा। यह सब पलक मारते हो गया। मैंने.. मैंने फिर आवाज़ दी... उसने मुड़कर देखा ही नहीं, मेरी भी अक्ल मारी गई, मुझे सूझा ही नहीं कि वह क्यों भागा जा रहा है। मैंने सोचा, किसी काम से जा रहा होगा। गाड़ी का तो मुझे खयाल ही नहीं आया।

बहन झूठ क्यों बोलूँ, शाम का वक्त है। बस, फिर मुझे नजर नहीं आया। मुझे तो शक भी नहीं हुआ, जब गाड़ी धम-धम करती आई और कुछ ही देर बाद पहिए घसीटती रुक गई। पहिए घिसटने की आवाज आती है ना, जैसे किसी ने चेन खींची हो। पर मैंने ध्यान नहीं दिया... यहाँ रोज गाड़ियाँ रुकती हैं। सोचा किसी ने चेन खींची होगी। लेकिन थोड़ी देर में माली भागा-भागा आया। कहने लगा, कोई.. कोई हादसा हो गया है, और वह भी पिछवाड़े की दीवार फाँदकर ढलान चढ़ने लगा। मुझे फिर भी शक नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद पड़ोस वाले नौकर ने चिल्लाकर कहा, 'जग्गा मारा गया है। जग्गा गाड़ी के नीचे कुचल गया है।'

मेरा दिल बुरी तरह से धक-धक करने लगा। पर वो... वो तो कट गया था। सच कहूं तो बहन मैं तो अब भी कहती हूँ, अगर जग्गा बोल देता, तो बच जाता। ये जरूर कोई-न-कोई रास्ता निकालते। बड़े समझदार हैं। पर वह बोला ही नहीं।

ख़ैर... वह दिन तो ऐसा बीता, क्या बताऊँ! बार-बार टेलिफोन आएँ, तीन बार तो इंस्पेक्टर घर आया। बार-बार इन्हें बुलाता, बार-बार कोठरी में झाँककर देखता। अंदर बैठी थी, वह कुलच्छणी! मौका देखने के बहाने इंस्पेक्टर बार-बार अंदर जाए। अब मर्द तो भेड़िए की तरह औरत को घूरते हैं ना। और वह अंदर बेहोश पड़ी थी। उसे बार-बार चक्कर आ रहे थे। अब मैं किस काम की! तुम्हें तो पता ही है। दो-एक बार मन में आया भी कि जाऊँ, पर इन्होंने मना कर दिया, कहने लगे, फौजदारी का मामला है, दूर ही रहो। मर्द समझदार होते हैं ना, उन्होंने दुनिया देखी होती है। पुलिस ने इनसे पूछा, तो इन्होंने कहा 'वह पिछले दिन से ही कुछ खा खोया सा था। मियाँ-बीवी की आपस में कोई बात हुई हो, तो हम नहीं जानते' एक बार अंदर आए, तो मैंने इनसे कहा, 'जी, तुम बिक्की को कहीं बाहर भेज दो।' मैं कहूँ, इन्हें मालूम नहीं, पर आस-पास के किसी आदमी को मालूम हुआ, तो बखेड़ा उठ खड़ा होगा। पर इन्होंने समझदारी की। बिक्की को बाहर नहीं भेजा। मर्द लोग समझदार होते हैं, बिक्की लापता हो जाता, तो पुलिस को शक पड़ सकता था, ना।

एक मठरी और लो! लो ना! तुमने तो कुछ खाया ही नहीं। सच बताऊं, तुम आ गईं, तो घंटा आधा-घंटा, मन बहल गया। कभी-कभी आ जाया करो ना। दूर तो नहीं रहती हो। कहो तो कार भेज दिया करूँ? अकेले में तो घर भाँय-भाँय करता है। ये तो दफ्तर से आते हैं, तो सीधे चौराहे चले जाते हैं। तो बस, वहीं दिन हमारा बुरा गुजरा। इनको दिन के वक्त सोने की आदत है, थोड़ा सो न लें, तो बदन भारी-भारी महसूस करने लगता है, पर कोई सोने दे तो! उस दिन वह भी नहीं हुआ। सोने के लिए लेटें, तो कभी टेलीफोन की घंटी बजने लगे, तो कभी कोई सरकारी आदमी आ जाए। पर ख़ैर दूसरे दिन से चैन हो गया। फिर कोई नहीं आया।

जब मामला रफा-दफा हो गया, तो एक दिन मैंने बिक्की की सारी करतूत इन्हें बता दी। तो (ताली) ये कहने लगे, 'मुझे तो पहले दिन से मालूम था।'  अरे मैं हक्की -बक्की, बोले 'जवानी में सभी बेवकूफियाँ करते हैं, मैंने कहा, 'जी, बिक्की को समझा तो दिया होता'  कहने लगे, 'कोई वैश्या के पास तो नहीं गया, कोई बीमारी तो नहीं ले आया, हो गई बात जो होनी थी, आगे के लिए सबक मिल गया' मैंने कहा - 'जी, पर ... बात तो अच्छी नहीं ना, ऐसा बिक्की को करना तो नहीं चाहिए था ना। मतलब...बिक्की ने ऐसा नहीं किया होता तो…’

- ‘तो? भाई को पुलिस में दे देता?'

- 'पर जी, उसने जुर्म तो किया है, ना।'

- 'उसका जुर्म देखता या उसकी जान बचाता? काल-कोठरी में भिजवा देता क्या?' फिर बोले

- 'औव्वल तो कौन जाने, बिक्की अपने-आप अंदर गया था या जग्गा की घरवाली उसे इशारे करती रही थी। भई ताली एक हाथ से तो नहीं बजती। औरत बढ़ावा देती है, तभी मर्द बहकता है। लड़की इशारा भी कर दे, तो आदमी बौरा ही जाता है। कोठरी के बाहर पर्दा लगा रहता है। क्या मालूम पर्दे की ओट में उसे इशारे करती रही हो। अरे भई ऐसे ही कोई किसी के कमरे में घुस जाता है? इतनी शरीफ़जादी थी, तो अंदर से कमरा बंद करके क्यों  नहीं बैठती थी? भई.. तेरा मर्द बाहर काम पर गया है, तू कोठरी में अकेली है, तू अंदर से कोठरी बंद करके बैठ। दरवाजा खोलकर बैठने का तेरा क्या  मतलब है?

बस बहन... मैं सुनती रही, मैं भी सोचूँ, किसी के दिल की कौन जानता है, लड़की के दिल में चोर था, या बिक्की के दिल में, भगवान जाने।

(लंबी सांस) आखिर में जी, इन्होंने सारा मामला सँभाल लिया। इन्हें भगवान ने ऐसी समझदारी दी है, सब निपटा देते हैं। कोई दूसरा होता न तो घबरा जाता। फिर जब जग्गे  का भाई गाँव से आया, बहुत रोया-धोया, उसे इन्होंने दो सौ रुपये निकालकर दे दिए। जग्गा की घरवाली का बाप आया। उसे भी इन्होंने पैसे दिए। मैंने इनसे कहा, 'जी, मामला रफा-दफा हो गया है, अब ये हमारे क्या लगते हैं, तुम पैसे लुटा रहे हो।' पर नहीं, ये कहने लगे, 'जग्गा ने दस साल तक हमारी खिदमत की है। और वैसे भी सौ-पच्चास दे दो, तो गरीब का मुँह बंद हो जाता है।' ये सबका भला सोचते हैं, किसी का बुरा नहीं सोचते। हर किसी की मदद ही करेंगे।

अच्छा सुनो... ये जरा घंटी तो बजाना। नौकर मुए जानते भी हैं, रात हो गई है, मगर मजाल है, जो अपने-आप आकर बत्ती जलाएँ। बार-बार घंटी बजानी पड़ती है। अच्छा अब आई हो, तो खाना खाकर जाना। ये जाने कब लौटेंगे। मैं तुम्हें जाने ही नहीं दूँगी। तुम आ गईं, तो घड़ी-भर दिल बहल गया। हमने अपनी बातें तो अभी तक की ही नहीं। दोनों बैठी बातें करेंगी। तुमने साग-मीट का पूछा तो बीच में जग्गे- की बात चल पड़ी। मैं तुम्हें खाना खाए बिना तो जाने नहीं दूँगी...

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