प्रेम प्यास नहीं, परम तृप्ति है... आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने बताई प्रेम की परिभाषा

Sahitya Aajtak Lucknow 2026: लखनऊ में साहित्य आजतक का आज आगाज हो गया है. आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने साहित्य आजतक के मंच से प्रेम को लेकर कई अहम बातें शेयर की हैं. आचार्य ने सनातन में प्रेम का अर्थ भी बताया है.

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आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने सनातन में प्रेम का मतलब बताया. (Photo: ITG) आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने सनातन में प्रेम का मतलब बताया. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • लखनऊ,
  • 14 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:44 PM IST

नवाबों के शहर लखनऊ में आज से ‘साहित्य आजतक 2026’ का आगाज हुआ. साहित्य, कला और विचारों के इस महाकुंभ के पहले दिन ‘धर्म और अध्यात्म की ध्वजा’ सत्र के दौरान आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने प्रेम पर कई अहम बातें बताईं. उन्होंने सनातन परंपरा में प्रेम के अर्थ को समझाया.

सनातन धर्म में क्या है प्रेम?

आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने प्रेम की प्रचलित धारणाओं को बदलते हुए इसे एक नए और गहरे अर्थ में परिभाषित किया. उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में प्रेम का वास्तविक अर्थ 'परम तृप्ति' है. यह चित्त की वह अवस्था है, जहां पहुंचने के बाद मनुष्य के भीतर कुछ भी पाने की शेष प्यास समाप्त हो जाती है.

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क्या राम-कृष्ण अलग हैं?

आचार्य बताते हैं कि राम और कृष्ण एक ही हैं. फिर भी अगर आप अंतर जानना चाहें तो जिनकी निगाह मर्यादा से शांत होकर स्थिर रहती है, वो मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र हैं. जिनकी नजरें मटकती रहती हैं, वो श्रीकृष्ण हैं. आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरणजी महाराज ने भगवान कृष्ण और राम के प्रेम के बारे में कई बातें बताईं. 'धरती पर केवल एक बार हुआ है जब राम ने कहा था कि मैं जब वैकुंठ जाऊंगा तो मेरे साथ सारे अयोध्यावासी साथ जाएंगे और सबको साथ भी ले गए. यह भी एक प्रेम ही था.'

उन्होंने कहा प्रेम गुरु-शिष्य, मित्र के बीच भी हो सकता है. कृष्ण-सुदामा के बीच भी प्रेम था. गुरुकुल में गुरु और शिष्य के बीच भी प्रेम होता है. सनातन परंपरा में प्रेम सर्वत्र है. प्रेम तरल है, वह जिस आकार में जाता है उसके आकार का हो जाता है.

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द्रोणाचार्य की वजह से एकल्वय का नाम

आचार्य मिथिलेश नंदिनी का कहना हैं 'जब हम कहते हैं एकलव्य असाधारण योद्धा थे, तो हमें याद करना चाहिए कि महाभारत में जो लड़े थे, वो योद्धा नहीं थे क्या? जिस संख्या में महाभारत के युद्ध में बलिदान दिया गया, क्या हम उनको जानते भी हैं?' 

द्रोणाचार्य जानते थे एकलव्य अपनी असाधारण उपलब्धि के बाद भी अगर बलिदान दे देता तो उसका कहीं नाम नहीं होगा. धनुर्विद्या महाभारत के समय खेल नहीं थी. उस समय यह केवल मरने या जीतने का रास्ता था. 

तब द्रोणाचार्य सोच रहे थे कि इस खास विद्या को कैसे पुरस्कृत किया जाए. आचार्य मिथिलेश बताते हैं कि सबसे अच्छे निशानेबाज सेना में नहीं जाते, वो मैदान में खेलते हैं, पैसा पाते हैं, नाम कमाते हैं. अगर हम ईमानदारी से एकलव्य का प्रसंग पढ़ेंगे तो हम जानेंगे कि उसे अंगूठा काटने की वजह से याद किया जाता है.

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