'साहित्य आजतक लखनऊ' के मंच पर शनिवार को जुटे क्राइम फिक्शन के तीन लेखक. 'कोड काकोरी' और 'कसारी मसारी' जैसी किताबें लिखने वाले मनोज राजन त्रिपाठी, 'बवाली कनपुरिया' के लेखक संजीव मिश्रा और मनोज बाजपेयी की जीवनी और 'उसने बुलाया था' उपन्यास लिखने वाले पीयूष पांडेय. चर्चा का विषय था 'अपराध, माफिया और कहानियां'. अपराध जगत की वो कहानियां जिसमें आज हर पाठक, हर दर्शक को दिलचस्पी है.
क्यों पढ़ी जाती हैं अपराध की कहानियां?
लेखकों से पूछा गया कि आज के वक्त में अपराध की कहानियां ही सबसे ज्यादा क्यों पढ़ी जाती हैं. मनोज राजन त्रिपाठी ने कहा, 'जितना जरूरी शरीर और दिमाग के लिए नमक है, सोडियम है उतना ही जरूरी जिंदगी के लिए क्राइम है. अपराध न्यू नॉर्मल है. अपराध आता ही रहेगा चाहे अतीक की शक्ल में, विकास दुबे की शक्ल में हो या हिटलर की शक्ल में. जब क्राइम होगा तभी न्याय आएगा और वो न्यू नॉर्मल होगा.'
नए अपराधियों को ग्लोरिफाई करने के ट्रेंड पर उन्होंने कहा, 'दो रंग हैं. काला और सफेद. जब दोनों रंग मिलते हैं तो रंग बनता है ग्रे. चाहे पाठक हों, चाहे दर्शक हों, चाहे कैरेक्टर हो या लेखक हो. सबके अंदर एक ग्रे है. सब अपने-अपने ग्रे का एक शेड निकालते हैं इसीलिए एक अपराधी ग्लोरिफाई हो जाता है.'
'हम सबके भीतर एक क्रिमिनल है'
क्राइम पढ़ने या देखने में लोगों की बढ़ती दिलचस्पी पर संजीव मिश्रा ने कहा, 'क्राइम आपसे सबसे ज्यादा जुड़ा होता है. अपराध कभी हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होता. कोई नहीं चाहता कि हमारे आसपास अपराध हो लेकिन होता है. जो हम नहीं चाहते और वो हो जाए. क्राइम किसी चमत्कार की तरह होता है जबकि बाकी चीजें जैसे स्पोर्ट्स, न्यूज, पॉलिटिक्स सब रूटीन होता जा रहा है.'
पीयूष पांडेय ने इस पर कहा, 'क्राइम लोगों को इसलिए अट्रैक्ट करता है क्योंकि हम सबके भीतर एक क्रिमिनल है. वो कब बाहर आता है, कैसे बाहर आता है, अलग विषय है. हम सब ट्रैफिक सिग्नल तोड़ते हैं. अपराध की घटनाएं आपको जानने के लिए प्रेरित करती हैं कि किसने किया, क्यों किया, कैसे किया.'
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