साहित्य आजतक के तीसरे दिन दस्तक दरबार मंच पर सत्र 'साहित्य का धर्मक्षेत्र' का आयोजन किया गया. इस सत्र में कथाकार की कल्पना की उड़ान पर चर्चा हुई साथ ही साहित्य का धर्मक्षेत्र आखिर क्या है, इस पर भी बातचीत की गई. इस सत्र में सफलतम लेखकों में से एक अमीश त्रिपाठी मौजूद रहे. इनके उपन्यास 'द इम्मारटल्स ऑफ मेलुहा', 'द सीक्रेट ऑफ नागाज' और 'द ओथ ऑफ द वायुपुत्राज' लेखन जगत में काफी लोकप्रिय रहे.
कार्यक्रम में अमीश त्रिपाठी ने कहा कि अच्छा लेखक होने के लिए अच्छा पाठक होने बेहद जरूरी है, मैं एक पेज लिखने के लिए पहले सौ पेज पड़ता हूं. उन्होंने कहा कि यही वजह है कि मेरी किताबें लंबे अंतराल के बाद और काफी बड़ी-बड़ी आती हैं. उन्होंने कहा कि जो बातें हम भूल गए हैं मैं उन्हीं को कुरेदता हूं कोई नया विचार पैदा नहीं करता.
अमीश ने कहा कि रामायण, महाभारत को लेकर जो हमारी यादें हैं वो पढ़कर कम बल्कि टीवी धारावाहिकों पर ज्यादा आधारित हैं. उन्होंने कहा कि वाल्मिकी रामायण में 'लक्ष्मण रेखा' का जिक्र ही नहीं है वो रामचरित मानस में है, वो भी सीताहरण के वक्त का नहीं है. लेकिन सभी को टीवी की बदौलत लक्ष्मण रेखा का सीन याद है, इसके लिए भी धारावाहिकों का आभार जताना चाहिए.
रामायण के अलग-अलग संस्करणों का जिक्र करते हुए अमीश ने कहा कि रामायण में रावण का वध राम ने किया, सीता ने भी किया और जैन रामायण में तो लक्ष्मण ने भी किया, क्योंकि श्री राम अंहिसावादी थे और वो हिंसा नहीं कर सकते थे. उन्होंने कहा कि इसमें सच क्या है इसका दावा कोई नहीं कर सकता, क्योंकि सच सिर्फ भगवान को मालूम है, हम सिर्फ अपना सत्य जानते हैं.
रामायण के अलग-अलग किरदारों पर बात करते हुए अमीश ने कहा कि शूर्पणखा बहुत सुंदर थी भले ही वो राक्षसी हो. उन्होंने कहा कि उसका चित्रण ऐसा किया गया है लेकिन असलियत में वो काफी फैशनेबल महिला थी. उसका नाम ही उसके नाखूनों की सुंदरता का वर्णन करने के लिए काफी हैं. अमीश ने कहा कि रावण, विभीषण और शूर्पणखा ब्राह्मण ऋषि की संतान थे. उन्होंने बताया कि अगर आप रावण जितने काबिल हो तो विनम्र रहना चाहिए, वर्ना हश्र रावण जैसा ही होगा.
पुष्पक विमान पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उसके वैज्ञानिक सबूत का दावा तो आज नहीं किया जा सकता लेकिन उस दौर में विज्ञान भी काफी विकसित थी, इससे इनकार करना मुश्किल है. अमीश ने कहा कि हमारे पूर्वजों को पास ज्ञान का भंडार था लेकिन हम इतने बेवकूफ हैं कि हमने उसे पढ़ना तो दूर उसका अनुवाद तक नहीं किया है.
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अनुग्रह मिश्र