साहित्य का राष्ट्रधर्म: 'आज नगरी अंधेर है, लेकिन राजा को चौपट नहीं कह सकते'

बता दें कि इस सेशन में ममता कालिया के अलावा नंद किशोर पांडेय और अखिलेश जैसे बड़े लेखक भी शामिल हुए. इन लेखकों ने भी देश में राष्ट्रवाद, आज के साहित्य, लेखकों के बारे में बात है.

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साहित्य का राष्ट्रधर्म सेशन के दौरान नंदकिशोर पांडेय, ममता कालिया और अखिलेश साहित्य का राष्ट्रधर्म सेशन के दौरान नंदकिशोर पांडेय, ममता कालिया और अखिलेश

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 16 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 2:07 PM IST

आजतक के खास कार्यक्रम साहित्य आजतक के मंच पर कई मुद्दों पर बहस हुई. हल्ला बोल के मंच पर हुई साहित्य का राष्ट्रधर्म मुद्दे पर बहस के दौरान राष्ट्रवाद से लेकर देशभक्ति का मुद्दा गर्माता रहा.

'सपनों की होम डिलिवरी', 'कल्चर वल्चर' जैसे उपन्यास लिखने वालीं ममता कालिया ने बहस के दौरान राष्ट्रवाद पर बात की. उन्होंने इस दौरान आज समाज में होने वाली परेशानियों का जिक्र किया और लेखक किस तरह उसपर अपनी राय दे रहा है या फिर दे सकता है इसकी बात की.

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उन्होंने कहा कि अगर आज आप रिपोर्ट लिखाने जाएं तो उल्टा दारोगा आपसे पूछता है कि घर में 50,000 रुपये क्यों रखा था. आज नगरी अंधेर है, लेकिन राजा को चौपट नहीं कह सकती हूं.

वरिष्ठ लेखक बोलीं कि हम राष्ट्र और देश के बीच में खुद को उलझा रहे हैं. राष्ट्र की इज्जत ज्यादा होनी चाहिए, क्योंकि इसमें सिर्फ हिंदू नहीं हैं बल्कि कई धर्म के लोग रहते हैं. हमें अल्पसंख्यकों के राष्ट्रवाद की भी बातें होनी चाहिए. राष्ट्र और राष्ट्र में रहने वालों के प्रति एक जैसा भाव होना चाहिए. आज देश में दो तिहाई लोग असुरक्षा की भावना से रह रहे हैं.

उन्हें लगता है कि कोई उन्हें कभी भी मार सकता है या फिर जेल में डाल सकता है. ममता कालिया ने कहा कि हमें ये तय करना होगा कि हमें सरकारी साहित्य लिखना है या फिर जनता का साहित्य लिखना है. सारे दिन अधिनायक की जय नहीं होनी चाहिए, आप राशन कितना भी खिला दीजिए लेकिन लिखेंगे हम वही जो लिखना चाहते हैं. 

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