अनामिका अनु आधुनिक हिन्दी साहित्य की वह रचनाकार हैं जिन्होंने कविता, कहानी, अनुवाद और संपादन के विभिन्न साहित्यिक क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट छवि बनाई है. वे विज्ञान के क्षेत्र से आती हैं; संभवतः इसी कारण उनका साहित्यिक दृष्टिकोण न केवल संवेदनशील है, बल्कि तार्किक, विश्लेषणात्मक और बहुआयामी भी है.
अनामिका अनु का कहानी-संग्रह 'येनपक कथा और अन्य कहानियां' अठारह कहानियों का समृद्ध संकलन है. यह संग्रह फणीश्वरनाथ रेणु की 'ठुमरी' की याद दिलाता है. ये कहानियां न तो सुगम संगीत-सा गान करती हैं और न ही शास्त्रीय गान के साँचे में बंधी रहती हैं. इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कथानक घटना-प्रधान नहीं, बल्कि अनुभव-प्रधान है. दृश्य, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्मृति-ये सब मिलकर कथा का ताना-बाना बुनते हैं.
संग्रह की पहली कहानी 'येनपक कथा: बूढ़ा छाते वाला' सम्पूर्ण संग्रह की वैचारिक प्रस्तावना के रूप में देखी जा सकती है. लोककथा की शैली में रचित यह कहानी स्त्री-प्रेम, मातृत्व, प्रकृति और विश्वास की गहन प्रतीकात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है. यह कहानी समग्र संग्रह की नांदी है! स्त्री प्रेम में क्या चाहती है ? छांव!
बूढ़ा छाते वाला, स्त्री के लिए छांव का प्रतीक है. छाता यहां केवल वर्षा से बचाव नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्थायित्व और करुणा का बिंब है. इसके विपरीत युवा छाते वाला चमकदार लेकिन बर्फ़ से बने छाते देता है,जो उपभोक्तावादी संस्कृति और क्षणिक आकर्षण का रूपक बन जाते हैं.यह कहानी स्पष्ट करती है कि स्त्री-अनुभव में प्रेम का अर्थ सौन्दर्य या विलास नहीं, बल्कि दायित्वबोध और भरोसा है. प्रतीकवाद और स्त्री-विमर्श दृष्टि इसे पारंपरिक लोककथाओं से विशिष्ट बनाती है.
इस संग्रह में प्रेम का स्वरूप एकरेखीय नहीं है. 'तर्क', 'थोड़ा-सा सुख', 'ग्रीन विलो' और 'हवाई चप्पल' जैसी कहानियां प्रेम के विविध आयामों को खोलती हैं.'थोड़ा-सा सुख' की मालविका के लिए प्रेम एक गंध है, एक मुस्कान है-जो उसकी एकरस पारिवारिक दिनचर्या में जीवन का संचार करती है. यहां प्रेम अवैध नहीं, बल्कि अनकहा और आत्मगत है.
'ग्रीन विलो' की कहानी प्रेम और कामना के सम्बन्ध पर नैतिक प्रश्न खड़े करती है-बिना दायित्वबोध के प्रेम कैसे किया जा सकता है?इन कहानियों में अनामिका अनु स्त्री को न तो पीड़िता के रूप में सीमित करती हैं और न ही उसे आदर्श नायिका बनाती हैं. उनकी स्त्रियां बौद्धिक हैं,वे निर्णय लेना जानती हैं और कभी-कभी चुपचाप लौट जाना भी चुनती हैं.
अनामिका अनु की कहानियों में भारतीय घर-परिवार और भारतीय रिश्तों का संदर्भ एक विशेष अर्थ लेकर आता है.उनका स्त्री विमर्श सार्वजनिक नारेबाजी नहीं करता है; यह स्त्री-पुरुष,माँ-बेटी और सास-बहू के संबंधों की बुनावट में गहरे उतरता है.इतना ही नहीं पिता और पुत्र के संबंधों के भी रेशे खोलता है.'मछली का स्वाद' में माँ का यह डर कि बेटी यहीं बस न जाए, ग्रामीण निर्धनता और स्वार्थ की जटिल मनोवृत्ति को उजागर करता है.
'स्वीटी की अम्मा' सामाजिक मर्यादा और मनुष्यता के द्वन्द्व की कहानी है, जहां अंततः माँ सामाजिक बन्धनों को तोड़कर बेटी के पक्ष में खड़ी होती है.
'दृगा लिखती है' विशेष रूप से उल्लेखनीय कहानी है, यह एक ऐसी बौद्धिक नायिका की कहानी है जो केवल घरेलू स्त्री बनी रहना नहीं चाहती है.इस कहानी में पंचतंत्र की शैली में नायिका की पीड़ा को प्रकृति और जीव-जंतुओं के माध्यम से स्वर दिया गया है. यह कहानी घरेलू स्त्री-जीवन के अदृश्य श्रम और मानसिक क्षरण को प्रभावी ढंग से सामने लाती है. कहानी की प्रमुख शक्ति इसके प्रतीकात्मक तत्व हैं-छिपकली, कौवा, मकड़ी, टकाचोर-जो दृगा के दुःखों के गवाह बनते हैं, उसे सहारा देते हैं और आत्म-समर्थन के भावों को व्यक्त करते हैं. भाषा की लय और वर्णनात्मक शैली पाठक को दृगा की मानसिक और भावात्मक दुनिया में ले जाती है. यह कहानी स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता, सामाजिक अपेक्षाओं से टकराव और आत्म-निर्माण की यात्रा का मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण प्रस्तुत करती है.
'चारों सम्त आठों पहर छोड़ जाऊँगा' पितृसत्ता की संरचनात्मक आलोचना का पाठ प्रस्तुत करती है. यह कहानी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का अत्यंत जटिल और विचारोत्तेजक विश्लेषण सामने रखती है. चार स्त्रियां-रिद्धि, रति, मुद्रा और देवसेना-स्त्री-जीवन के चार भिन्न चरणों और चार तरह की भूमिकाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं.
पुरुष पात्र एक ही है और उसका स्वरूप अपरिवर्तित-उपभोक्ता का है. स्त्रियां प्रेम, देह, सेवा और त्याग के अलग-अलग स्तरों पर खड़ी हैं. यह कहानी पितृसत्ता को किसी एक घटना से नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक व्यवस्था के रूप में प्रश्नांकित करती है.इस कहानी की निरूपण शैली कहानी को विशिष्ट बनाती है.
'एक चित्रकार की वापसी'-कला, पहचान और अनिश्चितता के बीच बनते-बिगड़ते कलाकार की कहानी है. यह संग्रह की सबसे लंबी और दार्शनिक कहानी है. यह कलाकार की पहचान, सृजन और घर के अर्थ पर विचार करती है. कहानी के नायक का कोई तय नाम नहीं है-जो उसे सार्वभौमिक बनाता है. इस कहानी का अरूढ़ कथ्य, विशिष्ट चरित्र, सर्जनात्मक भाषा और सांकेतिक परिवेश कहानी की अपेक्षा लघु उपन्यास के लिए अधिक उपयुक्त है. 'एक चित्रकार की वापसी' एक नाम-रूप से मुक्त नायक की कला-यात्रा है, जो घर से शुरू होकर जीवन के विविध पड़ावों से गुजरती हुई अंततः अपने घर पर ठहरती है. क्या पता, फिर एक बार नायक घर छोड़कर निकल न जाए? यह कथा संकेत करती है कि कलाकार का न स्थायी घर होता है, न स्थायी नाम-पता; वह बार-बार लौटता है और बार-बार निकल पड़ता है. यह अनिश्चितता ही रचनात्मक जीवन की अनिवार्य शर्त है.
'काली कमीज़ और काला कुर्ता' सामाजिक दबाव के बीच बनते-बिखरते प्रेमियों की मनोदशा का वर्णन करती है.वैसे देखा जाए तो कमीज़ और कुर्ता बहुत सामान्य वस्तु है लेकिन लेखिका ने काली कमीज़ और काला कुर्ता का प्रतीकात्मक उपयोग करके गहन भावनात्मक अंतर्संबंध और प्रेम की सूक्ष्मता को बेहद नाज़ुक ढंग से प्रस्तुत किया है.
'मछली का स्वाद' स्त्री के भीतर की अधूरी इच्छाओं, उसके जीवन की आर्थिक कठिनाइयों और उसके अखंड आत्मसंयम का चित्रण करती है. यह कहानी जल बिना मछली की अवस्था और मायके के सहारे के बिना स्त्री के जीवन में आए अभावों की बात करती है. कोरोना, आर्थिक तंगी और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच रेवती की छोटी-छोटी इच्छाओं का सघन रूप लेना और अपनों की तुच्छ चतुराई के बीच उन चाहों का पानी बनकर बह जाना, कहानी को बड़े ही मार्मिक बिंदु पर लाकर खड़ा कर देता है.
कहानी 'भीगे तकिए धूप में' अवसाद और भावनात्मक रिक्ति के बीच माँ-बेटी के संबंधों में हो रहे परिवर्तनों, उभरते अवसाद और पुनः संवाद की यात्रा का सुंदर और प्रेरक चित्र प्रस्तुत करती है.
'चितकबरी' न केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कथा कहती है, बल्कि स्वयं को स्वीकारने, परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और जीवन की सुंदरता को आत्मसात करने का प्रेरक संदेश भी देती है. यह कहानी आत्म-अभिव्यक्ति के माध्यम से व्यक्तित्व, पहचान और शारीरिक भिन्नताओं (सफेद दाग) के साथ जीवन की जटिलताओं को उजागर करती है.
'मृत पिता की चिट्ठी' स्मृतियों, दैनिक जीवन की बारीकियों और पारिवारिक संघर्षों के माध्यम से पिता–पुत्र के रिश्ते की कोमलता, चिंता और ममता को चित्रित करती है. कथा न केवल पिता की अनुपस्थिति और आत्म-पश्चात्ताप की व्यथा को दिखाती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि प्रेम और स्नेह जीवन और मृत्यु की सीमाओं से परे प्रभाव डालते हैं.
अनामिका अनु ने अपनी कहानी 'वह पागल नहीं थी' में व्यक्तित्व की जटिलता तथा असामान्य और असहज मनोदशाओं को दृश्यों में बुनकर पाठकों के सामने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है.
इस संग्रह में 'अम्फान', 'अमलतास' और 'आत्मा' जैसी कहानियां भी हैं, जो जीवन, स्मृतियों और आत्मा के बीच सजीव संवाद का सौंदर्यपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती हैं. इनमें प्रेम की तृप्ति, आत्मा की तृष्णा, प्रेम के पुनरुत्थान और मानवीय संवेदनाएँ अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरती हैं. प्रभा और प्रसून के संवादों में समय, दूरी और जीवन की चुनौतियों के बीच मानवीय स्नेह और आत्मीयता की सूक्ष्मता झलकती है. रोज़मर्रा के क्रियाकलाप-रोटियां बनाना, खीर पकाना-भी भावनात्मक प्रतीक बन जाते हैं.
अनामिका अनु की कहानियां मानवीय भाव, सामाजिक संरचना और व्यक्तिगत अनुभवों के अंतर्निहित संघर्षों को बिंबों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं. ये कहानियां न केवल स्त्री-अनुभव को केन्द्रीयता देती हैं बल्कि पितृसत्ता के ढाँचे की सूक्ष्म आलोचना भी प्रस्तुत करती हैं.लिरिकल फिक्शन और प्रतीकों के माध्यम से नए अर्थ खोलती ये कहानियां न केवल समकालीन स्त्री-चेतना और सामाजिक यथार्थ के गहन पाठ उपलब्ध कराती है़ं बल्कि स्मृति, करुणा, कामना, नैतिक विवेक और आत्म-संरक्षण की वैकल्पिक भाषा भी रचती हैं.
अनामिका अनु की कहानियां एक टटकेपन का अनुभव कराती हैं. आकार में छोटी, महीन, फिर भी गझीन कथानक वाली ये कहानियां विशिष्ट चरित्रों की आधी-अधूरी रेखाएँ, सर्जनात्मक भाषा, परिवेश का बिम्बात्मक-प्रतीकात्मक वर्णन तथा कथा-निरूपण में फैंटेसी के माध्यम से कही गई लोककथा, परीकथा और पंचतंत्र की शैली के कारण अपनी अलग पहचान बनाती हैं.
कविता-संग्रह 'इंजीकरी' के माध्यम से उन्होंने जिस सूक्ष्म, स्त्री-केन्द्रित और प्रतीकात्मक काव्य-भाषा को स्थापित किया, वही दृष्टि उनके कहानी-संग्रह 'येनपक कथा और अन्य कहानियां' (2025) में नए रूप और व्यापक विस्तार के साथ दिखाई देती है.अनामिका अनु का यह कहानी- संग्रह समकालीन हिन्दी कहानी में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है.
# अनामिका अनु के कहानी संग्रह 'येनपक कथा और अन्य कहानियां' की यह समीक्षा साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत लेखिका डा बिंदु भट्ट ने लिखी है. आप हिंदी की प्रतिष्ठित प्रोफेसर रही हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में 'मीरा याज्ञिक की डायरी', 'अक्षयपात्र और बंधनी' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. आपको 'भाषासेतु सम्मान', गुजराती साहित्य परिषद पुरस्कार, 'लाडली' पुरस्कार तथा गोवर्धनराम त्रिपाठी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है. लेखन के साथ-साथ साहित्य, रंगमंच और शैक्षणिक गतिविधियों में भी उनका सशक्त और प्रभावशाली हस्तक्षेप रहा है.
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