सुप्रीम कोर्ट में बोली मोदी सरकार- नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध जुर्म नहीं

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 15 से 18 साल की नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध जुर्म नहीं है.

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वंदना भारती

  • नई दिल्ली,
  • 10 सितंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:27 AM IST

नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को लेकर एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जवाब पेश किया करते हुए कहा है कि 15 से 18 साल की नाबालिग पत्नी से यौन संबंध बनाना जुर्म नहीं है.

दरअसल IPC375 (2) कानून का यह अपवाद कहता है कि अगर कोई 15 से 18 साल की पत्नी से संबंध बनाता है तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा. केन्द्र सरकार ने कोर्ट मे कानून की तरफदारी करते हुए कहा कि संसद ने सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए इस कानून को नहीं छेड़ा. देश में आर्थ‍िक रूप से पिछड़े समाज में आज भी बाल विवाह के मामले देखने को मिलते हैं.

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15 से 18 साल की पत्नी से संबंध बनाने को दुष्कर्म मनाने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सती प्रथा भी सदियों से चली आ रही थी, लेकिन उसे भी खत्म किया गया, जरूरी नहीं कि जो प्रथा सदियों से चली आ रही हो वो सही हो.

सुप्रीम कोर्ट ने ये बात तब कही जब केंद्र सरकार की तरफ से ये दलील दी गई कि ये परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसलिए संसद इसे संरक्षण दे रहा है. यानी अगर कोई 15 से 18 साल की बीवी से संबंध बनाता है तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा. केंद्र सरकार ने ये भी कहा अगर कोर्ट को लगता है कि ये सही नहीं है, तो संसद इस पर विचार करेगी.

इससे पहले बाल विवाह के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा था कि कानून में बाल विवाह को अपराध माना गया है. उसके बावजूद लोग बाल विवाह करते हैं. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये शादी नहीं, बल्कि मिराज यानी मृगतृष्णा है.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे पास तीन विकल्प हैं- पहला इस अपवाद को हटा दें, जिसका मतलब है कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता और उसे रेप माना जाए.

कोर्ट ने कहा कि दूसरा विकल्प ये है कि इस मामले में पॉस्को एक्ट लागू किया जाए. यानी बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता है तो उसपर पॉस्को के तहत करवाई हो.

और तीसरा विकल्प ये है कि इसमें कुछ न किया जाए और इसे अपवाद माना जाए, जिसका मतलब ये है कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता तो वो रेप नहीं माना जायेगा.

वहीं याचिकाकर्ता की तरफ से मंगलवार को दलील दी गई थी कि बाल विवाह से बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. बाल विवाह बच्चों पर एक तरह का जुर्म है, क्योंकि कम उम्र में शादी करने से उनका यौन उत्पीड़न ज्यादा होता है. ऐसे में बच्चों को प्रोटेक्ट करने की जरूरत है.

इस पर केंद्र ने अपने एफीडेविट में कहा है कि साल 2006 से बाल विवाह को गैरकानूनी घोषित किए जाने के बावजूद देश के कई हिस्सों में अब भी बाल विवाह का प्रचलन है. ऐसे में विवाहित पुरुष और महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्च‍ित किया जाना अनिवार्य है.

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बता दें कि देश में विवाह की उम्र महिलाओं के लिए 18 और पुरुषों के लिए 21 साल रखी गई है. इससे कम उम्र में हुई शादी को जुर्म माना गया है. इंडियन पीनल कोर्ड के तहत मामले में दो साल की सजा हो सकती है. बावजूद इसके देश के बड़े शहरों में बाल विवाह का आंकड़ा 0.7 फीसदी बढ़ा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसका ग्राफ 0.3 फीसदी घटा है.

डब्ल्यूसीडी मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार देश में साल 2014 से 16 के बीच 1785 मामले रजिस्टर हुए और 4,777 लोगों की गिरफ्तारी हुई. हालांकि इसमें सिर्फ 274 को ही अपराधी साबित किया जा सका.

 

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