एक हिन्दू महिला जो पिछले 18 सालों से करा रही हैं रोजा-इफ्तार...

वैसे तो रमजान को मुसलमानों का पर्व माना जाता है लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो हिन्दू होकर भी दूसरों को रोजा-इफ्तार करा रहे हैं. किरण शर्मा भी एक ऐसा ही नाम है. वो पिछले 18 सालों से हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर ऐसा कर रही हैं. जानें क्यों...

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किरण शर्मा किरण शर्मा

शुभम गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2017,
  • अपडेटेड 2:53 PM IST

इन दिनों रमजान चल रहा है. देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया भर से भारी संख्या में लोग दुआएं मांगने हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर पहुंच रहे हैं. वैसे तो रमजान में आम तौर पर मुसलमान ही रोजा और इफ्तारी करते हैं लेकिन कुछ ऐसे हिन्दू भी हैं जो दूसरों के लिए इफ्तारी का इंतजाम करते हैं. किरण शर्मा भी एक ऐसी ही महिला का नाम है.

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गौरतलब है कि हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर लोग दुआ मांगने आते हैं. मत्था टेकने आते हैं लेकिन इस बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने खर्चे पर जरूरतमंदों को रोजा-इफ्तार करा रही हैं. वह बीते 18 बरस से की दरगाह पर माथा टेकने आती हैं. वह कहती हैं कि अल्लाह के दरबार में उनकी हर दुआ कबूल हुई है. हुआ कुछ ऐसा कि किरण शर्मा और उनके बेटी एक हादसे का शिकार हो गई थीं. उनकी बेटी के बचने की उम्मीद बहुत कम थी. उन्होंने हजरत निजामुद्दीन औलिया से अपनी बेटी के स्वस्थ होने की दुआ मांगी. आज उस वाकये को 18 साल हो गए हैं और उनकी बेटी एकदम ठीक हैं. ऐसे में वह हर साल के माह में यहां आती हैं और लोगों को रोजा-इफ्तार कराती हैं.

देश भर में अल्लाह के बंदे रोजाना रोजा रखते है और अल्लाह के दरबार में आकर नमाज अदा कर अपना रोजा इफ्तार करते हैं. रमज़ान के पाक महीने में यहां की रौनक कुछ और होती है. दरगाह के चीफ इन चार्ज अफसर निजामी का कहना है कि रोजाना यहां कई लोग आते हैं. इन लोगों में हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी शामिल होते हैं. यहां किरण शर्मा भी अपनी ओर से एक खूबसूरत कोशिश करती नजर आती हैं.

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दरगाह के चीफ अफसर निजामी का कहना है कि यहां करने हर कोई आता है. वे कहते हैं कि राजनीति अलग चीज है. यह हिंदू-मुस्लिम को बांटने का काम कर रही है. मगर वे फिर भी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते रहते हैं. किरण शर्मा भी पिछले 18 सालों से रोजा-इफ्तार आयोजित कर कुछ ऐसी ही कोशिश कर रही हैं. वे ऐसे में दुआ करने की बात कहते हैं जिससे देश भर में एकता और सामंजस्य बना रहे.

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