बच्चों की परवरिश हमेशा से माता-पिता के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी रही है. हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा न सिर्फ पढ़ाई और करियर में आगे बढ़े, बल्कि एक अच्छा इंसान भी बने. इसी वजह से परवरिश को लेकर अलग-अलग सोच देखने को मिलती है. कुछ माता-पिता बच्चों के साथ दोस्तों की तरह रहना पसंद करते हैं, ताकि वे खुलकर अपनी बात कह सकें.
वहीं कुछ लोग मानते हैं कि बच्चों को सही रास्ते पर रखने के लिए थोड़ी सख्ती जरूरी होती है. आज के समय में यह बहस और भी ज्यादा तेज हो गई है. मोबाइल, सोशल मीडिया और बदलते लाइफस्टाइल के बीच बच्चों को अनुशासन सिखाना आसान नहीं रहा. कई पैरेंट्स सोचते हैं कि ज्यादा सख्त होने से बच्चे डर सकते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि ढील देने से बच्चे बिगड़ सकते हैं.
इसी बीच भारत की मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल का एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों के साथ सिर्फ दोस्त जैसा नहीं, बल्कि थोड़ा सख्त भी रहना चाहिए. साइना ने हाल ही में एक इंटरव्यू में पेरेंटिंग को लेकर कहा कि माता-पिता को बच्चों के साथ सिर्फ दोस्त जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, बल्कि थोड़ा सख्त भी रहना चाहिए.अगर उनके माता-पिता बहुत ज्यादा ढीले होते, तो शायद वह ओलंपिक जैसे बड़े सपने देखने की हिम्मत ही नहीं कर पातीं.
आकाश हेल्थकेयर की साइकेट्रिस्ट डॉ. पवित्रा शंकर के मुताबिक, सख्ती हर बच्चे पर एक जैसा असर नहीं करती. कुछ बच्चे जो लक्ष्य पर फोकस रखते हैं और मानसिक तौर पर मजबूत होते हैं, वे सख्त नियमों में भी अच्छा प्रदर्शन कर लेते हैं. लेकिन जो बच्चे इमोशनल या जल्दी घबराने वाले होते हैं, उनके लिए ज्यादा सख्ती नुकसानदायक हो सकती है.
छोटे बच्चों को प्यार, सुरक्षा और समझ की जरूरत होती है. किशोर उम्र में बच्चों को थोड़ा आजाद फैसला लेने का मौका मिलना चाहिए. अगर हर उम्र में एक जैसी सख्ती रखी जाए, तो यह डिसिप्लिन से ज्यादा कंट्रोल बन जाती है.
डॉ. शंकर कहती हैं, 'जब बच्चा डर की वजह से बात मानने लगे, तो यह हेल्दी डिसिप्लिन नहीं होता.अगर बच्चा हमेशा डरा हुआ, चुप रहने वाला या स्ट्रेस में दिखे, तो समझ लेना चाहिए कि परवरिश का तरीका सही नहीं है.'
बहुत अधिक प्रेशर बच्चों को बाहर से सफल बना सकता है, लेकिन अंदर से थका और परेशान कर सकता है. कई बार बच्चे माता-पिता की निगरानी में तो अच्छा करते हैं, लेकिन बाद में खुद फैसले लेने में मुश्किल महसूस करते हैं. सायना जैसी खिलाड़ियों में अंदर से आगे बढ़ने की चाह होती है, इसलिए सख्ती उनके लिए काम कर गई.
डॉ. शंकर ने माता-पिता को ऑथॉरिटेटिव पेरेंटिंग को अपनाने की सलाह दी.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क