आज के भारत में तलाक को अब केवल एक रिश्ते के दुखद अंत के रूप में नहीं देखा जा रहा है बल्कि इसे एक नई और बेहतर जिंदगी की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा अब इस पुरानी और घिसी-पिटी सोच को पीछे छोड़ चुका है कि तलाक जिंदगी का फुल स्टॉप है.
लेकिन तलाक के बाद दोबारा डेटिंग और प्यार की दुनिया में ये भारतीय जब कदम रखते हैं तो वो पहले से कहीं ज्यादा क्लैरिटी और मैच्योरिटी के साथ आगे बढ़ते हैं. वो अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर अच्छी तरह समझ चुके होते हैं कि किसी रिश्ते में सबसे ज्यादा जरूरी चीज उनके लिए क्या है.
मैचमेकिंग ऐप की स्टडी में खुलासा
मैचमेकिंग ऐप Rebounce की दिलचस्प स्टडी की एक हालिया रिपोर्ट इस बदलाव पर मुहर लगाती है. स्टडी के अनुसार, साल 2025 में दोबारा डेटिंग शुरू करने वाले 5 में से 3 तलाकशुदा सिंगल्स अब अपने पार्टनर को लेकर बहुत स्पष्ट नजर आए. उनके पास अब ऐसे डील ब्रेकर्स (समझौता न करने वाली शर्तें) की लिस्ट है जो उनकी पहली शादी के दौरान नहीं थी.
यह ट्रेंड दिखाता है कि अब लोग अपनी खुशी और मेंटल पीस से समझौता करने के बजाय अपने अनुभवों से सीखकर एक अधिक संतुलित और खुशहाल जीवन की ओर बढ़ रहे हैं.
27 से 40 साल के बीच के लोगों पर की गई थी स्टडी
यह स्टडी देश के टियर 1, 2 और 3 शहरों के 5,834 एक्टिव डेटर्स के बीच की गई. सर्वे में शामिल सभी प्रतिभागी 27 से 40 वर्ष की आयु के थे जो या तो तलाकशुदा थे या अपने पार्टनर से अलग हो चुके थे.
स्टडी के नतीजों पर Rebounce के फाउंडर और CEO रवि मित्तल ने कहा, 'यह सर्वे दूसरी शादी को लेकर समाज की सोच में आ रहे एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है. अब लोग सिर्फ समझौता करने या परिस्थितियों के साथ एडजस्ट करने के लिए तैयार नहीं हैं.'
'दूसरी शादी अब पहले से ज्यादा स्पष्टता और आपसी तालमेल पर आधारित है. तलाकशुदा सिंगल्स अब भावनात्मक रूप से अधिक परिपक्व हो चुके हैं. उन्हें पता है कि अतीत में क्या गलत हुआ और किन वजहों से उन्हें दुख पहुंचा. यही कारण है कि वो पुराने पैटर्न्स को न दोहराने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.'
इमोशनल अनअवेलेबिलिटी अब मंजूर नहीं
स्टडी के दौरान देखा गया कि रिश्तों की नई समझ में अब जो सबसे बड़ा और मजबूत डील ब्रेकर उभरकर सामने आया है वो और कोई नहीं बल्कि इमोशनल अनअवेलेबिलिटी यानी साथी के लिए भावनात्मक रूप से उपलब्ध न होना है. अध्ययन में शामिल कई लोगों ने यह स्वीकार किया कि अपनी पहली शादी के दौरान उन्होंने पार्टनर के ठंडे रवैये या भावनात्मक दूरी को उनका स्वभाव समझकर नजरअंदाज कर दिया था लेकिन अब वो इसे अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं.
अकेले बोझ उठाने से बच रहे लोग
मुंबई की रहने वाली 35 वर्षीय तारिणी इस बदलाव को बयां करते हुए कहती हैं, 'खामोशी ताकत नहीं है. भावनात्मक रूप से इमोशनली अवेलेबल (अनुपलब्ध पार्टनर) के साथ खामोशी से तालमेल बिठाना ना तो आपकी मेंटल हेल्थ के लिए अच्छा है और न ही आपकी शादी के लिए. अब मैं यह समझ चुकी हूं कि ऐसा रिश्ता बेमानी है.'
38 साल के पीडियाट्रिशियन राजीव ने बताया, 'कम्युनिकेशन रिश्ते में बेहद जरूरी है. किसी भी व्यक्ति की तरफ से काम की व्यस्तता के कारण अगर जवाब देने में देरी हो तो ये मुझे मंजूर है लेकिन कम्युनिकेशन में कमी अब मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है. मैं फिर से उस दौर में नहीं जाना चाहता जहां मुझे अकेले ही रिश्ते का पूरा भावनात्मक बोझ उठाना पड़े.
पैसा भी है जरूरी फैक्टर
दिल्ली की 33 साल की समीरा ने कहा, 'पैसा एक और जरूरी एरिया है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तलाकशुदा सिंगल्स पैसे को ही प्राथमिकता देते हैं. मैं काम करती हूं. मुझे किसी प्रोवाइडर (कमाकर खिलाने वाले) की तलाश नहीं है. मैं बस इतना चाहती हूं कि मेरा पार्टनर अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर ईमानदार हो और महज दिखावे के लिए अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करने वाला न हो.
आत्म सम्मान है सबसे ऊपर
कोलकाता की 38 साल की परोमिता कहती हैं, 'इज्जत और आत्म सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता है. मेरे तलाक के बाद से इन सबके लिए मेरी सहनशक्ति बहुत कम हो चुकी है. मुझे अब अपनी जिंदगी में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं चाहिए जो मुझे वो सम्मान और गरिमा न दे सके जिसकी मैं हकदार हूं.'
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क