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बिहार में 'चमकी' से मरने वाले बच्चे गरीब ही क्यों हैं?

aajtak.in/मंजू ममगाईं
  • 19 जून 2019,
  • अपडेटेड 11:41 AM IST
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मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार यानी इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम बच्चों पर कहर बनकर टूट रहा है. इस बुखार ने अब तक 112 बच्चों की जान ले ली है. अभी भी लगातार इस बुखार से पीड़ित बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है. चमकी बुखार की वजह से बच्चों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है. बुखार की वजह से अब तक उन तमाम घरों के चिराग बुझ चुके हैं जो पहले से ही बेहद गरीब है.
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चमकी बुखार से बच्चों की मौत, गरीब परिवारों के लिए दोतरफा मार की तरह है. लगातार गरीब बच्चों की मौत देखकर क्या ये कहना सही होगा कि चमकी नाम का ये कहर अमीर और गरीब में फर्क देखकर बच्चों को अपना शिकार बना रहा है.

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बिहार के मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के कुछ जिलों में ये रोग कई साल से लाइलाज है. इसका मुख्य कारण गर्मी, गंदगी, गरीबी, अज्ञानता, कुपोषण और पर्याप्त इलाज का अभाव बताया जा रहा है. खाली पेट लीची खाना भी इसकी एक वजह के रूप में सामने आ रहा है. चमकी का कहर बिहार के मुजफ्फरपुर समेत तिरहुत, चंपारण, मुसहरी, कांटी, मीनापुर और मोतीपुर जैसे इलाकों में ज्यादा है. ये बिहार के वो इलाके हैं जहां गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले परिवार रहते हैं.
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डॉक्टरों की मानें तो इंसेफेलाइटिस से मरने वाले अधिकतर बच्चे गरीब और कुपोषण का शिकार हैं. ऊपर से सही समय पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बीमारी से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं मिलने की वजह से बच्चे बीमारी की भेंट चढ़ रहे हैं.

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इंसेफेलाइटिस एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है, बीमारी से पीड़ित बच्चों में मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है. 'चमकी बुखार' से पीड़ित बच्चों में तेज बुखार, उल्टी, जी मिचलाना, बेहोशी, कांपना और शरीर में झटके लगने जैसे मुख्य लक्षण देखे जाते हैं.

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चमकी नाम के इस रोग में रोगी के शरीर में ग्लूकोज का स्तर अचानक नीचे गिरने लगता है, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है. इस वजह से शरीर को रिजर्व ग्लूकोज का इस्तेमाल करना पड़ता है. पर जो बच्चे कुपोषित होते हैं उनके शरीर में रिजर्व ग्लूकोज मौजूद नहीं रहता. इस वजह से आधे घंटे की भी देरी ऐसे बच्चों की जान के लिए बड़ा खतरा बन जाती है.

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यह भी पाया जा रहा है गरीब परिवार के बच्चे कई बार बिना कुछ खाए सुबह उठते ही या फिर रात को सिर्फ लीची का सेवन कर सो जाते हैं जो उनकी सेहत के लिए खतरा बन जाता है. साल 2017 में 'द लैंसेंट' नामक एक पत्रिका में लीची और इसकी वजह से होने वाली मौतों को लेकर कई लेख छापे गए. सभी लेखों में बताया गया कि लीची में एक 'हाइपोग्लायसिन ए' और 'मेथिलीन सायक्लोप्रोपाइल ग्लायसीन' नामक दो तत्व पाए जाते हैं.

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रिपोर्ट्स हैं कि अगर कोई व्यक्ति बिना कुछ खाए सुबह उठते ही लीची का सेवन करता है तो ये जानलेवा साबित हो सकती है. खाली पेट लीची का सेवन करने से उसमें मौजूद 'हाइपोग्लायसिन ए' और 'मेथिलीन सायक्लोप्रोपाइल ग्लायसीन' नामक तत्व व्यक्ति का ब्लड शुगर बहुत अधिक घटा देते हैं.चमकी बुखार से बचने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को ये सलाह दी है कि बच्चों को रात में भरपेट भोजन करवाएं और अधपकी लीचियों का सेवन करने से बचें. बुखार आने पर तुरंत नजदीकी चिकित्सक से संपर्क करें.

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गरीब बच्चों में ये बीमारी इसलिए भी ज्यादा देखने को मिलती है क्योंकि उनके पास इलाज करवाने के लिए पर्याप्त साधन ही नहीं होते हैं. गरीब परिवारों के लिए इलाज का एकमात्र आसरा सरकारी अस्पताल हैं. निजी अस्पतालों में इलाज आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए आसान नहीं है. ऊपर से सरकारी अस्पतालों में प्राथमिक स्तर के इलाज की भी व्यवस्था संतोषजनक नहीं है.

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ज्यादातर मामलों में लोग सबसे पहले अपने बीमार बच्चे को इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पर लाते हैं. कई बार इन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ग्लूकोमीटर तक मौजूद नहीं होते हैं. पीड़ित बच्चे के शरीर में ग्लूकोज का स्तर जब तक मापकर उसे SKMCH रेफर किया जाता है तब तक बच्चे की हालत काफी बिगड़ जाती है और बच्चों की मौत हो जाती है.

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इसके अलावा लोगों की इस रोग के प्रति अज्ञानता भी बहुत बड़ा कारण है. बिहार के कई इलाकों में लोगों को बच्चे का बुखार नापना तक नहीं आता है. वो इस छोटे से काम के लिए भी डॉक्टर पर निर्भर रहते हैं. जिसकी वजह से इलाज में देरी हो जाती है और बच्चे की जान के लिए खतरा बढ़ जाता है.  

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बिहार में गोरखपुर मॉडल क्यों नहीं ?
उत्तर प्रदेश में गोरखपुर में भी इंसेफेलाइटिस से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतों का मामला सामने आता था. लेकिन गोरखपुर में बचाव के लिए टीकाकरण सफलतापूर्वक हुआ. सरकारी रिपोर्ट्स में दावा है कि इस वजह से बीमारी 60 फीसदी तक काबू में है. इंसेफलाइटिस के सबसे ज्यादा शिकार गोरखपुर और मुजफ्फरपुर रहे हैं ऐसे में मुजफ्फरपुर में टीकाकरण क्यों नहीं हो सका.
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क्या है इलाज-
चमकी बुखार से पीड़ित इंसान के शरीर में पानी की कमी न होने दें. बच्चों को सिर्फ हेल्दी फूड ही दें. रात को खाना खाने के बाद हल्का-फुल्का मीठा जरूर दें. सिविल सर्जन एसपी सिंह के मुताबिक चमकी ग्रस्त बच्चों में हाइपोग्लाइसीमिया यानी शुगर की कमी देखी जा रही है. फिलहाल जिले के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को हाई अलर्ट पर रखा गया है. यहां चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए समुचित व्यवस्था की गई है. डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों को थोड़ी-थोड़ी देर बाद तरल पदार्थ देते रहें ताकि उनके शरीर में पानी की कमी न हो.

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बरतें ये खास सावधानी-
गर्मी के मौसम में फल और खाना जल्दी खराब होता है. घरवाले इस बात का खास ख्याल रखें कि बच्चे किसी भी हाल में जूठे और सड़े फल नहीं खाए. बच्चों को गंदगी से बिल्कुल दूर रखें. खाने से पहले और खाने के बाद हाथ ज़रूर धुलवाएं. साफ पानी पिएं, बच्चों के नाखून नहीं बढ़ने दें. और गर्मियों के मौसम में धूप में खेलने से मना करें.

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