हाई-पेड नौकरी छोड़ ऑटो ड्राइवर बना शख्स, क्यों उठाया ऐसा कदम? हर कॉर्पोरेट कर्मचारी को पढ़नी चाहिए ये कहानी

हाई-पेड कॉर्पोरेट नौकरी, टॉक्सिक बॉस और लगातार दबाव ने राकेश बी. पाल को अंदर ही अंदर तोड़ दिया था. उन्होंने कॉर्पोरेट की दुनिया की वो सच्चाई सामने रखी, जो लोग कहने में झिझकते हैं. उन्होंने सुकून पाने के लिए नौकरी छोड़कर ऑटो ड्राइवर बनना चुना.

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कॉर्पोरेट के टॉक्सिक माहौल ने राकेश बी पाल के मानसिक स्वास्थ्य को बहुत क्षति पहुंचाई थी. (Photo: ITG) कॉर्पोरेट के टॉक्सिक माहौल ने राकेश बी पाल के मानसिक स्वास्थ्य को बहुत क्षति पहुंचाई थी. (Photo: ITG)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 09 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:34 AM IST

कुछ लोग आपको रोज मिलते हैं, लेकिन उनकी कहानी आपको पता ही नहीं होती है. सड़क पर चलते हुए या सफर के दौरान ज्यादातर चेहरे ऐसे होते हैं, जिन्हें आप यूं ही नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन कभी-कभी इन्हीं चेहरों के पीछे ऐसी कहानी छुपी होती है, जो सोचने पर मजबूर कर देती है. राकेश बी. पाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.

इंग्लिश पर अच्छी पकड़, स्मार्ट पर्सनैलिटी और सीखने की ललक रखने वाले राकेश संग पहली मुलाकात में कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर हैं. उनकी जिंदगी का सफर कितना लंबा और संघर्षों से भरा रहा है इसका अंदाजा लगाना शायद ही मुमकिन हो, जब तक वो खुद बयां करने का बैठें. ऑटो रिक्शा चलाने के साथ ही दो वक्त की रोटी कमाने के लिए राकेश सुबह मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग और शाम को डांस क्लास भी देते हैं. चौंकिए मत क्योंकि चौंकने वाली बात ये है कि राकेश कभी पहले एक हाई-पेयिंग जॉब करते थे.

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उनकी कहानी खास इसलिए नहीं कि वो आज क्या कर रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि उन्होंने किन हालातों से निकलकर अपनी पहचान बनाई. आखिर वो वजह क्या थी कि उन्होंने अपनी अच्छी-खासी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर ऑटो रिक्शा चलाने का काम चुना? चलिए जानते हैं. 

कॉर्पोरेट जॉब से ऑटो तक का सफर

राकेश बी. पाल, ने ऑटो रिक्शा ड्राइवर के तौर पर कमाना शुरू नहीं किया था. उनका प्रोफेशनल करियर किसी भी नॉर्मल कॉर्पोरेट प्रोफाइल जैसे ही शुरू हुआ था. उन्होंने 10 साल से ज्यादा वक्त बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ काम किया था. अगर बात करें राकेश की पहली नौकरी की तो उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बेंगलुरु की एक अमेरिकी कंपनी से हुई, जहां वो वॉइस और एक्सेंट ट्रेनर के तौर पर जुड़े थे. 

राकेश बहुत मेहनती थे. वह अपनी इसी मेहनत, स्किल और लगातार सीखने की वजह से धीरे-धीरे कॉर्पोरेट सीढ़ियां चढ़ते चले गए. जैसे-जैसे वो आगे बढ़ना शुरू हुए वैसे-वैसे उनकी प्रोफाइल मजबूत हुई, जिम्मेदारियां और काम का दायरा भी बढ़ा. ये पढ़ने में जितना खुशनुमा लगता है उतना था नहीं क्योंकि राकेश की जिंदगी में भी आप ही की तरह कई तरह की परेशानियां आईं, जिनकी वजह कॉर्पोरेट दुनिया बनी. राकेश पर काम का दबाव और सिस्टम की सख्ती भी लगातार बढ़ रही थी.

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राकेश बताते हैं, 'जैसे-जैसे मैं ऊपर गया, काम और माहौल दोनों मुश्किल होते गए. मैंने सोचा शायद कंपनी बदलने से चीजें बेहतर होंगी, लेकिन हर जगह एक ही तरह का छल-कपट दिखा. आप पूरी मेहनत करते हैं, उम्मीद करते हैं कि उसका सही इनाम मिलेगा, लेकिन जब बॉस खुद को अनसेफ महसूस करने लगता है, तो वो आपको आगे बढ़ाने के बजाय परेशान करने लगता है.'

इस तरह की चालाकियों ने राकेश के लिए कॉर्पोरेट दुनिया का प्रोफेशनल सफर को मुश्किल कर दिया. ये चीजें ना केवल प्रोफेशनल चुनौतियां बनकर उनके सामने खड़ी थीं, बल्कि मानसिक थकान भी दे रही थी. लगातार दबाव, अस्थिर माहौल और आत्मसम्मान पर चोट ये सब किसी भी इंसान को तोड़ सकते हैं. सवाल ये उठता है कि 'कोई भी इंसान आखिर कब तक यह सब झेल सकता है?' 

कॉर्पोरेट की हकीकत

राकेश ने अपनी कहानी बयां करते हुए कॉर्पोरेट जगत की वो सच्चाई सबके सामने रखी, जिसे अक्सर लोग कहने से झिझकते हैं. उन्होंने बताया, 'आपको अक्सर वो काम करना पड़ता है जो आपका नहीं है. सीनियर लोग आपकी मेहनत पसंद करते हैं, लेकिन जब सामने वाले बॉस के खिलाफ बोलना पड़ता है, तो वो हायरार्की को फेवर देते हैं, न कि न्याय को.'

राकेश बताते हैं कि मैनेजर्स धीरे-धीरे आपके आत्मविश्वास को तोड़ देते हैं. कई बार ऐसे भी पल आते हैं कि आप खुद पर ही शक करने लगते हैं. गलतियां दिखाते हैं लेकिन सही गाइडेंस नहीं देते, दूसरों का क्रेडिट लेते हैं और डराते हैं. वह बोले, 'इन्हें आप मैनेजर कहते हैं? ये डिमोटिवेटर हैं.'

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एक ग्लोबल बैंक में काम के दौरान राकेश को ऐसा मैनेजर मिला जो बहुत ही अनसेफ महसूस करता था. राकेश ने कहा, “उन्होंने मेरे बारे में झूठ फैलाना शुरू कर दिया. मैंने उनके साथ काम से काम रखना शुरू किया, लेकिन जब सामने वाला आपसे बड़ी पोस्ट पर हो तब पावर का बैलेंस एकतरफा होता है. ऊपरी मैनेजमेंट से शिकायत करने पर भी नतीजा निराशाजनक था. उन्होंने उसे बचा लिया था.'

काम का दबाव और सेहत की चुनौती

राकेश की नौकरी बहुत डिटेल और सटीकता मांगती थी. किसी भी छोटी गलती, जैसे पंक्चुएशन या सिग्नेचर में जरा से फर्क, को नोट करना और सही करना उनका काम था. वह बोलते हैं, 'अगर मैं कोई अंतर देखता, तो उस व्यक्ति से सवाल करता था. लेकिन फिर झूठे आरोप मुझ पर लगाए जाने लगे जिससे मेरा प्रमोशन रोका जा सके.'

इसके साथ ही राकेश को सुनने में दिक्कत थी और उन्होंने हीयरिंग एड पहना था. उन्होंने बताया, 'टीम के कुछ लोग मुझे जज करते, बात करते और अलग रखते थे. ये देखकर लगा कि सुनने में दिक्कत भी लोगों को परेशान कर सकती है.' कंपनी में टार्गेट्स का दबाव इतना था कि लोग बस ‘रिसोर्स’ बनकर रह जाते हैं.
 

मानसिक दबाव और डिप्रेशन

कॉर्पोरेट का दबाव धीरे-धीरे राकेश के लिए सहन करना मुश्किल होता चला गया. वो नौकरी छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन जिस तरह का माहौल उनके खिलाफ ऑफिस में बन चुका था, उसने उन्हें अंदर से तोड़ दिया. काम का स्ट्रेस, लगातार मानसिक प्रताड़ना और अनसेफ बॉस की सोच, इन सबका असर उनके मन पर गहराता चला गया.

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कुछ समय बाद हालात ऐसे हो गए कि राकेश खुद में ही रहने लगे. हालत की गंभीरता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि कई महीनों तक वो कमरे से बाहर नहीं निकले. वो बिस्तर पर ही खाना खाते थे, लोगों से दूर रहते थे और खुद के आत्म-सम्मान को धीरे-धीरे टूटते देख रहे थे. अब ये सब ही उनकी जिंदगी बन गया था.

इस सबको झेलते हुए एक पल ऐसा आया जब राकेश का वजन बढ़ने लगा, परिवार से भी दूरी बढ़ने लगी और आखिरकार उन्हें मानसिक मदद लेनी पड़ी. राकेश ने बताया, 'एक दिन आईने में खुद को देखा और पहचान ही नहीं पाया. तब समझ आया कि अगर अब बदलाव नहीं किया, तो शायद मैं खुद को बचा नहीं पाऊंगा.'

खुद को वापस पाने की लड़ाई

उस पल से राकेश की खुद को वापस पाने की लड़ाई शुरू हुई. उन्होंने सबसे पहले अपनी सेहत पर ध्यान देना शुरू किया. वजन घटाने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग की और दिन में सिर्फ 6 घंटे खाने की आदत डाली. धीरे-धीरे वजन घटने लगा और उसके साथ ही आत्मविश्वास भी लौटने लगा. वह कहते हैं, 'ये करने के काफी लंबे समय बाद पहली बार मुझे लगा कि मैं फिर से कुछ करने के लायक हूं.'

इसके बाद राकेश ने छोटे-छोटे कदम उठाने शुरू किए. उन्होंने जिम ट्रेनर का काम शुरू किया. कई बार ट्रेनिंग के साथ-साथ सफाई भी की. उस समय उनकी कमाई सिर्फ 5000 रुपये महीने थी, लेकिन उनमें फिर से आगे बढ़ने की ललक थी. राकेश कहते हैं, ;मैं बस इतना चाहता था कि मेरी 5 साल की बेटी अगर चॉकलेट मांगे, तो मैं उसे मना न करूं.' धीरे-धीरे उन्होंने और भी छोटे काम किए, पैसे जोड़े और आखिरकार इतना हौसला और पूंजी जुटा पाए कि अपनी खुद की ऑटो खरीद सकें.

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ये सिर्फ दो वक्त की रोटी कमाने का जरिया नहीं था, बल्कि खुद की जिंदगी दोबारा खड़ी करने की ओर एक बड़ा कदम था.

ऑटो चलाना मजबूरी नहीं मर्जी है

आज राकेश ऑटो चलाते हैं. ये फैलियर नहीं, बल्कि आजादी और सम्मान की पहचान है. जब राकेश से जॉब छोड़ने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया, 'मैं नौकरी कर रहा था जिसने मेरी मानसिकता को लगभग पूरी तरह से तोड़ दिया था. कुछ हजार रुपये के लिए मैंने अपनी आत्मा बेच दी थी. बॉस मेरी काबिलियत को जज कर रहा था. परिवार और अपने शौक के लिए समय नहीं था. क्या ऐसे जॉब को आप वर्थफुल या डिसेंट कहेंगे? अब मैं 6-7 घंटे ऑटो चलाता हूं, मेरा खुदका इंस्टाग्राम अकाउंट है और मैं खुश हूं. कोई आपको सच में नहीं देखता, तो आपको भी दूसरों की राय की परवाह नहीं करनी चाहिए. मैंने करियर खोया, लेकिन खुद को पाया.'

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