Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर रोटी क्यों नहीं बनती? ‘खिचड़ी’ बनने की वजह जानकर चौंक जाएंगे

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर खिचड़ी दान करने के साथ-साथ बनाने और खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. लेकिन ये जानना भी उतना जरूरी है कि इस त्योहार पर रोटी क्यों नहीं बनाई जाती? आखिर इसके पीछे वजह क्या है.

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मकर संक्रांति पर ज्यादातर जगहों पर खिचड़ी बनाई जाती है और ये एक परंपरा बन चुकी है. (Photo: ITG) मकर संक्रांति पर ज्यादातर जगहों पर खिचड़ी बनाई जाती है और ये एक परंपरा बन चुकी है. (Photo: ITG)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति का त्योहार आज 15 जनवरी 2026 को पूरे देश में मनाया जा रहा है. लोगों के लिए इस त्योहार का मतलब घर में बनने वाली तिल-गुड़ की स्वादिष्ट मिठाइयां और घी से लदी चटाकेदार खिचड़ी होती है. जैसे ही मकर संक्रांति का त्योहार आता है सभी के मन में खिचड़ी की खुशबू, तिल-गुड़ की मिठास और घर में बनते खास पकवान घूमने लगते हैं. सभी इन चीजों को अपने परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर बड़े चाव से हर साल खाते हैं, लेकिन इसी बीच एक सवाल अक्सर उठता है कि आखिर मकर संक्रांति पर हर बार खिचड़ी ही क्यों बनती है और रोटी क्यों नहीं बनाई जाती? 

कई लोग इसे किसी धार्मिक नियम से जोड़ते हैं, लेकिन असल में इसकी वजह आस्था नहीं बल्कि हमारे खाने-पीने से जुड़ी पुरानी समझ और मौसम के अनुसार ढला हुआ फूड कल्चर होता है. चलिए जानते हैं कि आखिर मकर संक्रांति पर रोटी क्यों नहीं बनाई जाती.

मौसम बदलते ही बदलता है खाना
मकर संक्रांति के साथ ही मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है. कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और शरीर को ऐसे खाने की जरूरत होती है जो उसे अंदर से गर्म रखने के साथ ही भरपूर एनर्जी भी दे. पुराने जमाने में लोग मौसम के हिसाब से अपना खाना चुनते थे. इसलिए मकर संक्रांति के दिन रोज का सिंपल खाना छोड़कर ऐसे पकवान बनाए जाते थे जो ज्यादा पौष्टिक हों और बदलते मौसम में शरीर को सपोर्ट करें.

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खिचड़ी बनी त्योहार की पहचान
मकर संक्रांति पर ज्यादातर जगहों पर खिचड़ी बनाई जाती है. ये अब परंपरा बन चुकी है और आलम ये है कि मकर संक्रांति का दूसरा नाम 'खिचड़ी' ही पड़ गया है. इसकी वजह सिर्फ स्वाद नहीं बल्कि सेहत भी होती है. दाल और चावल से बनी खिचड़ी आसानी से पच जाती है, पेट पर भारी नहीं पड़ती और लंबे समय तक एनर्जी देती है. यही कारण है कि उत्तर भारत के कई हिस्सों में मकर संक्रांति को खिचड़ी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है और इस दिन रोटी की बजाय खिचड़ी थाली का स्टार बन जाती है.

तवे की रोटी से परहेज क्यों?
इस दिन रोटी ना बनाने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं. दरअसल, ये त्योहार नई फसल की कटाई की खुशियों के त्योहार के रूप में मनाया जाता है. ऐसे में चावल, दाल दान भी की जाती है और खिचड़ी के रूप में खाई भी जाती है. एक सोच ये भी रही है कि मकर संक्रांति पर उबले या धीमी आंच पर बने खाने को बेहतर माना जाता है. रोटी सीधे तवे की तेज आंच पर पकती है, जबकि खिचड़ी जैसे पकवान आराम से पकते हैं और पाचन के लिहाज से हल्के माने जाते हैं. यही वजह है कि कई घरों में इस दिन तवे की जगह बड़े बर्तन चढ़ते हैं.

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सख्त नियम नहीं, बस एक पुरानी परंपरा
ये समझना जरूरी है कि मकर संक्रांति पर रोटी न बनाना कोई सख्त नियम नहीं है. ये बस एक परंपरा है, जो पीढ़ियों से खाने की आदतों के साथ जुड़ी रही है. आज के समय में कई घरों में रोटी बनती भी है, लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग इस दिन कुछ अलग और खास बनाकर त्योहार का मजा लेना पसंद करते हैं.

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