वायरल हेट स्पीच वीडियो पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार और एक्स से मांगा जवाब

याचिकाकर्ता के वकील निजाम पाशा ने अदालत को बताया कि वीडियो में यह दिखाया गया है कि यदि एक विशेष राजनीतिक दल सत्ता में नहीं आता, तो एक खास समुदाय देश की सत्ता संभाल लेगा. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि इस तरह की हेट स्पीच सामग्री को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं.

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यह वीडियो हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था (File Photo- ITG) यह वीडियो हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था (File Photo- ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2025,
  • अपडेटेड 3:42 PM IST

हेट स्पीच और राज्यों के आगामी चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर जारी एक विवादित वीडियो पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है. कोर्ट ने विवादित वीडियो के मामले में केंद्र सरकार, असम सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) को नोटिस जारी किया है. यह वीडियो हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था, जिसमें कथित रूप से धार्मिक भेदभाव फैलाने वाले संदेश दिए गए हैं.

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याचिकाकर्ता के वकील निजाम पाशा ने अदालत को बताया कि वीडियो में यह दिखाया गया है कि यदि एक विशेष राजनीतिक दल सत्ता में नहीं आता, तो एक खास समुदाय देश की सत्ता संभाल लेगा. वीडियो में दाढ़ी वाले लोगों की तस्वीरें दिखाकर धार्मिक उकसावे की कोशिश की गई है. इस वीडियो को चुनावी नफरत भड़काने का प्रयास माना जाना चाहिए और इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.

एडवोकेट पाशा ने यह भी कहा कि वह इस मामले में बीजेपी को भी पक्षकार बनाएंगे, क्योंकि वीडियो में जिस राजनीतिक संदर्भ का उपयोग किया गया है, वह सीधे चुनावी माहौल से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ता ने वीडियो जारी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने या अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की है.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि इस तरह की हेट स्पीच सामग्री को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं. कोर्ट ने कहा कि चुनावी माहौल में सोशल मीडिया का जिम्मेदाराना इस्तेमाल बेहद जरूरी है, ताकि समाज में नफरत या ध्रुवीकरण न फैले.

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बता दें कि यह मामला ऐसे समय में आया है जब देश में कई राज्यों में चुनावी गतिविधियां तेज हो चुकी हैं और सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई को नफरती भाषणों पर नियंत्रण के लिए एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है.

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