सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े एक मामले में फैसला लिया है कि कोई भी होमबायर बस इसलिए उपभोक्ता नहीं बनता कि उसने खरीदी गई संपत्ति को किराए पर दे दिया हो. कोर्ट ने साफ किया है कि संपत्ति को किराए पर देना खुद में यह साबित नहीं करता कि वह “कॉमर्शियल उद्देश्य” से खरीदी गई थी.
यह फैसला 4 फरवरी को जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक होमबायर की शिकायत को इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि फ्लैट किराए पर दिया गया था और इसे कॉमर्शियल इस्तेमाल के लिए माना गया था.
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसने साल 2005 में गुरुग्राम में फ्लैट खरीदा था. बाद में उसने बिल्डर के खिलाफ शिकायत दाखिल की, जिसमें निर्माण में देरी, फ्लैट के लेआउट में बदलाव और लागत बढ़ोतरी जैसे आरोप शामिल थे. हालांकि NCDRC ने कह दिया था कि फ्लैट किराए पर होने की वजह से वह व्कॉमर्शियल इस्तेमाल में है और इसलिए शिकायत स्वीकार्य नहीं है.
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सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि तब तक यह मानना गलत होगा जब तक बिल्डर यह साबित न कर दे कि खरीद का मकसद व्यावसायिक था. इस मामले में बिल्डर कोई ठोस सबूत नहीं दे सका. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कॉमर्शियल उद्देश्य का निर्धारण हर मामले की विशेष परिस्थितियों और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए. केवल फ्लैट खरीदने या किराए पर देने से यह साबित नहीं होता कि खरीद व्यावसायिक था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में प्रमाण पेश करने की जिम्मेदारी बिल्डर की होती है, न कि होमबायर की. जब तक यह साफ हो कि संपत्ति कॉमर्शियल उद्देश्य के लिए खरीदी गई है, तब तक खरीदार को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत ही “कंज्यूमर” माना जाएगा.
अब इस मामले को NCDRC के पास वापस भेजा गया है ताकि शिकायत पर फिर से विचार किया जा सके और फैसला हो कि बिल्डर के खिलाफ आरोप उपभोक्ता कानून का उल्लंघन हैं या नहीं.
अनीषा माथुर