आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की दलीलों पर कड़ी नाराज़गी जताई है. कोर्ट ने साफ कहा कि उनके तर्क “हकीकत से कोसों दूर” हैं और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी को “ग्लोरिफाई” करने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है.
सुनवाई के दौरान टैगोर की ओर से पेश वकील ने AIIMS परिसर में वर्षों से रह रहे एक कथित शांत स्वभाव के कुत्ते “गोल्डी” का उदाहरण देते हुए कहा कि सभी आवारा कुत्ते खतरनाक नहीं होते.
इस पर जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने तीखी टिप्पणी की. कोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में पूछा, "क्या उस कुत्ते को ऑपरेशन थिएटर में भी ले जाया जा रहा था? क्या आप समझते हैं कि सड़क पर रहने वाले कुत्तों में टिक्स (कीड़े) होते हैं और अस्पताल जैसी जगह पर इसके परिणाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं?"
इससे पहले, टैगोर के वकील ने तर्क दिया था कि कुछ कुत्तों को मारना आवश्यक हो सकता है, लेकिन व्यवहार-आधारित आकलन के माध्यम से एक विशेषज्ञ समिति द्वारा उन्हें पहले "आक्रामक" के रूप में पहचाना जाना चाहिए.
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कुत्तों का महिमामंडन मत कीजिए- कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि सड़कों पर रहने वाले कुत्तों में टिक्स (कीड़े) होना स्वाभाविक है और अस्पताल में ऐसे जानवरों की मौजूदगी से गंभीर संक्रमण फैल सकता है. पीठ ने दो टूक कहा, “आप पूरी तरह वास्तविकता से कोसों दूर हैं. अस्पतालों में इन कुत्तों का महिमामंडन मत कीजिए.” कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि संवेदनशील स्थानों पर कुत्तों की मौजूदगी का महिमामंडन न किया जाए.
विदेशी फॉर्मूले को नकारा कोर्ट में कुत्तों की पहचान के लिए जॉर्जिया और आर्मेनिया की तर्ज पर 'कलर-कोडिंग' (रंगीन पट्टा) का सुझाव भी दिया गया, जिसे बेंच ने यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत की जनसंख्या की तुलना उन देशों से करना व्यावहारिक नहीं है.
ऑल क्रीचर्स ग्रेट एंड स्मॉल नामक संगठन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी वैज्ञानिक आधार पर फैसले लेने की वकालत की. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सभी कुत्तों को हटाने का आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' (ABC) नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दे रहा है.
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