4 मई 1994 को इजरायली प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और पीएलओ (फिलीस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन) अध्यक्ष यासर अराफात ने काहिरा में फिलिस्तीनी सेल्फ रूल के एक समझौते पर सहमति जताई. यह इजरायल और फिलीस्तीनियों के बीच पहला प्रत्यक्ष आमने-सामने सीधा समझौता था. इसमें इजराल के अस्तित्व के अधिकार को मान्यता दी गई थी. इसे दोनों पक्षों के बीच भविष्य के संबंधों के लिए एक रूपरेखा भी तैयार की गई थी. इस समझौते को गाजा-जेरिको समझौते के नाम से जाना जाता है.
इतिहास में आज ही के दिन गाजा-जेरिको समझौते में चार मुख्य मुद्दों पर चर्चा की गई थी. सुरक्षा व्यवस्था, नागरिक मामले, कानूनी मामले और आर्थिक संबंध. इसमें गाजा पट्टी के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से (यहूदी बस्तियों और उनके आसपास के क्षेत्रों को छोड़कर) और वेस्ट बैंक के जेरिको शहर से इजरायली सेना की वापसी शामिल थी, जिस भूमि पर इजरायल ने 1967 के छह दिवसीय युद्ध के दौरान कब्जा कर लिया था.
फिलीस्तीनियों ने आतंकवाद से लड़ने और हिंसा को रोकने पर सहमति व्यक्त की, जिसे प्रसिद्ध 'शांति के बदले भूमि' समझौता कहा जाता है. इस दस्तावेज में इजरायली नागरिक प्रशासन से नवगठित फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सत्ता हस्तांतरण, उसके अधिकार क्षेत्र और विधायी शक्तियों, एक फिलीस्तीनी पुलिस बल और इजरायल तथा फिलिस्तीनी प्राधिकरण के बीच संबंधों पर भी सहमति शामिल थी.
इजरायल ने गाजा और जेरिको से बुला ली थी अपनी सेना
इजरायली रक्षा बलों ने 13 मई को जेरिको से और 18-19 मई, 1994 को गाजा पट्टी के अधिकांश हिस्से से अपनी सेना वापस बुला ली. फिलिस्तीनी प्राधिकरण की पुलिस और अधिकारियों ने तुरंत नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। शुरुआती कुछ दिनों में गाजा पट्टी और उसके आसपास इजरायली सैनिकों और नागरिकों पर कई हमले हुए। अराफात स्वयं 1 जुलाई को गाजा पहुंचे, जहां उनका जोरदार और अव्यवस्थित स्वागत हुआ.
समय बीतने के साथ, समझौते में तय समय-सारणी का पालन नहीं किया गया, इजरायल की पुनः तैनाती धीमी हो गई और नए समझौतों पर बातचीत हुई. समझौते के इजरायली आलोचकों ने दावा किया कि 'शांति के बदले भूमि' वास्तव में 'कुछ भी नहीं के बदले भूमि' थी.
दूसरे इंतिफादा के साथ खत्म हो गया समझौता
2000 में हुए फिलीस्तीनी विद्रोह, जिसे 'दूसरा इंतिफादा' के नाम से जाना जाता है. इसके प्रकोप से इजरायल और फिलिस्तीनियों के बीच शांतिपूर्ण संबंधों की दिशा में चल रही प्रगति को गंभीर झटका लगा. 2006 के फिलिस्तीनी चुनावों में हमास के सत्ता में आने के बाद इस प्रक्रिया पर और भी दबाव पड़ा.
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