ईरान ने जंग के मैदान में कब-कब चखा जीत का स्वाद, इसके एक राजा ने मुगलों को भी हराया था

ईरान का जंग से जुड़ा पुराना इतिहास रहा है. आज अमेरिका और इजरायल के साथ यह देश संघर्ष के रहा है. इनसे पहले भी ईरान और वहां के अलग-अलग शासक कई साम्राज्यों से युद्ध लड़ चुके हैं. ऐसे में जानते हैं कि अतीत में ईरान ने कब-कब जंग के मैदान में जीत का स्वाद चखा है और क्या कभी इसकी भारत के शासकों से भी सामना हुआ था.

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ईरान के शासक मुगलों और रोमनों को भी हरा चुके हैं (Photo - AP) ईरान के शासक मुगलों और रोमनों को भी हरा चुके हैं (Photo - AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:53 PM IST

दस दिन पहले ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने एक साथ हमला बोल दिया. इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल और मिडिल ईस्ट में यूएस के सहयोगी देशों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला बोल दिया. तब से पूरा मिडिल ईस्ट जंग की आग में झुलस रहा है.   यह पहली बार नहीं है, जब ऐसा हुआ है. पिछले साल भी इजरायल के साथ अमेरिका ने ईरान पर बमबारी की थी. ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान इससे पहले कब-कब युद्ध के मैदान उतरा है और उसका जंग से जुड़ा इतिहास कितना पुराना है.  

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ईरान का समृद्ध इतिहास कई हजार साल पुराना है. इसे आमतौर पर तीन काल में बांटा गया है. इसमें पहला है पूर्व-इस्लामिक यानी प्राचीन काल (लगभग 559 ईसा पूर्व से 651 ईस्वी तक), जब ईरान में इस्लाम का नामोनिशान नहीं था, दूसरा है इस्लामी युग (651 ईस्वी से 1800 ई. तक), जब अरब ने ईरान पर कब्जा कर लिया और फारसी साम्राज्य खत्म हो गया और तीसरा है आधुनिक युग. 

बीबीसी के हिस्ट्रीएस्ट्रा के मुताबिक, मध्य एशिया से आए मेद्स और पर्शियन समुदाय ने ईरानी पठार को अपना घर बनाया और 559 ईसा पूर्व साइरस द्वितीय ईरान साम्राज्य के पहले शासक बने, जिन्हें फारसी साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है. तब ईरान में पारसी धर्म का बोलबाला था,  जिसका मूलमंत्र था अच्छे शब्द, अच्छे विचार और अच्छे काम. 

पहली बार सिकंदर ने ईरान पर किया था कब्जा 
फारसी साम्राज्य पर ईसा पूर्व 330 में सिकंदर महान ने आक्रमण किया था.  उस वक्त फारसी साम्राज्य को सिकंदर की सेना के सामने जंग के मैदान में हार का सामना करना पड़ा. सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने ईरान को हेलेनाइज्ड साम्राज्य के अधीन कर लिया और फारसी साम्राज्य का अंत हो गया. 
पार्थियन राजवंश ने रोमन साम्राज्य को हराया
हेलेनाइज्ड शासकों के बाद ईरान  रोमन साम्राज के प्रभाव में आ गया था. तब रोमनों को एक नए ईरानी राजवंश से जबरदस्त टक्कर मिली. इनका नाम पार्थियन था. रोमन सेना का 53 ईसा पूर्व में कैरे के मैदान में पहली बार पर्थियन से सामना हुआ, जो ईरान के ही विस्थापितों से बनी छोटी सेना थी और खुद को पर्थियन बताती थी. पर्थियन उभरते रोमन साम्राज्य के लिए गंभीर दुश्मन साबित हुए.  कैरे के मैदान में  रोमन कमांडर क्रैसस को छोटी पार्थियन सेना ने करारी शिकस्त दी. 

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जब सासानियन ने पार्थियन को उखाड़ फेंका
पार्थियन ने ईरान पर करीब 500 वर्षों तक राज किया. इसके 224 ईस्वी में पार्थियनों को एक नए दुश्मन सासानियन ने चुनौती दी. सासानियन पार्थियनों के ही वंशज थे. ये फारस के हृदयस्थल से आए थे. सासानियन ने पार्थियन राजवंश को उखाड़ फेंका. ईरान में सासानियन राजवंश के सबसे महान राजा खुसरों द्वितीय हुए. ईरान में इस्लाम यानी अरबों के आनने से पहले तक सबसे ज्यादा प्रभाव इनका ही रहा. सासानियन रोमन और बीजान्टिन साम्राज्यों के लिए खतरनाक दुश्मन साबित हुए और इनके बीच कई युद्ध हुए. सासानियन इन युद्धों को जीतकर अपना अस्तित्व बरकरार रखा.  

ईरान पर अरब सेना का हमला 
7वीं शताब्दी में अरब में एक नई शक्ति उभरी, जिसका नाम इस्लाम था. अरबों ने बीजान्टिन को हराते हुए ईरान की ओर बढ़ी और सासानियन को चुनौती थी. अरब सेना और सासानियन के बीच भीषण युद्ध हुआ. अरबों ने सासानियन को ईरान से उखाड़ फेंका.  

तुर्कों और मंगोलों की ईरान में इंट्री 
11वीं शताब्दी में मध्य एशिया से तुर्कों का ईरान में   आगमन हुआ. फिर 13वीं सदी में ईरान पर मंगोल आक्रमण हुए. इसके बाद 14वीं शताब्दी में तैमूरलंग ने ईरान में भारी तबाही मचाई. फिर खानाबदोश हमलों की लहर ने ईरान में व्यापक उथल-पुथल पैदा कर दी. ईरान लगातार इन आक्रमणकारियों से जूझता रहा.

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सफवी वंश का उभार और तुर्कों के साथ युद्ध
16वीं शताब्दी के दौरान ईरान में सफवी वंश का उदय हुआ. इन्होंने 1501 से इस्लाम की शिया शाखा को नए राजकीय धर्म के रूप में लागू कर दिया. शिया धर्म को अपनाने से ईरानी राज्य को पश्चिम में स्थित ओटोमन साम्राज्य (तुर्क)से अलग पहचाना गया. फिर सफवी साम्राज्य का तुर्कों के साथ टकराव शुरू हो गया.ओटोमन और सफवी साम्राज्यों के बीच कई युद्ध हुए. सफवीदों ने ईरानी सभ्यता के विकास में अहम योगदान दिया. विशेष रूप से शाह अब्बास प्रथम (1587-1629) के शासनकाल में, जो इस्लामी विजय के बाद 'महान' के रूप में जाने जाने वाले एकमात्र राजा थे. 

नादिर शाह दौर और मुगलों से लड़ाई
1722 में सफवी राजवंश का पतन हो गया. इस दौर में दशकों तक ईरान युद्ध में उलझा रहा. पहले तो नादिर शाह (1736-47) के नेतृत्व में ईरान सशक्त होकर उभरा.  जब नादिर शाह अपने चरम पर था, तब उसकी नजर हिंदुस्तान के समृद्ध मुगल शासन पर पड़ी. नादिर शाह ने अफगानिस्तान होते हुए हिंदूकुश को पार कर पाकिस्तान के लाहौर तक आ धमका. तब जाकर मुगलों की नींद खुली, लेकिन तबतक काफी देर हो चुकी थी. 

मुगलों को हराकर कोहिनूर लूट कर ले गया था नादिर शाह
नादिर शाह की सेना और मुगल सैनिकों के बीच करनाल के मैदान में भयानक जंग हुई. इस युद्ध में मुगलों को हार का सामना करना पड़ा और एक महीने से भी ज्यादा समय तक नादिर शाह ने दिल्ली में जमकर लूटपाट मचाई. नादिर शाह यहां से कोहिनूर हीरा भी लूटकर ले गया था. नादिर शाह की मौत के बाद एक बार फिर ईरान में उथल-पुथल शुरू हो गई. 18 वीं शताब्दी के अंत तक ईरान अपनी आंतरिक उथल-पुथल से उबरा, तो उसे रूसी और ब्रिटिश साम्राज्यों के रूप में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

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इराक से 8 साल तक युद्ध में उलझा रहा
इस तरह ईरान के अस्तित्व में आने से लेकर अबतक इस देश ने कई बार युद्ध का सामना किया है. अमेरिका और इजरायल से टकराव से पहले हाल-फिलहाल में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान का सामना इराक से हुआ था. यह वो दौर था, जब  ईरान एक ऐसी ताकत के रूप में उभरा जो बाहरी शक्तियों का डटकर सामना कर सकता था. उसी समय 1980 के दशक में ईरान और इराक सीमा पर विवाद गहराने लगा. इसी बीच सद्दाम हुसैन ने ईरान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इसके बाद आठ साल तक दोनों देशों के बीच खूनी संघर्ष चलता रहा. इसमें दोनों तरफ से लाखों लोगों की जान चली गई.

तब अमेरिका ने भी इराक का साथ दिया था. क्योंकि, 1979 के इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में स्थित अमेरिकी दूतावास पर कुछ कट्टरपंथी छात्रों के समूह ने कब्जा कर लिया था, जिसे इतिहास में ईरान संकट के नाम से जाना जाता है. इस घटना के बाद से अमेरिका ईरान को फूटी आंख देखना नहीं चाहता है और जब-जब मौका आया,तब-तब उसने ईरान के दुश्मनों का साथ दिया. 

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