ईरान ही नहीं मिडिल ईस्ट में कई देश कुर्दों को अलगाववादी तत्व की तरह देखते हैं. इन पर आरोप लगता रहा है कि अमेरिका अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को अमल में लाने के लिए इनका इस्तेमाल करता है, चाहे बात आईएसआईएस के खिलाफ मोर्चा खोलने की हो या फिर ईरान में विद्रोह भड़काने के लिए. ऐसे में जानते हैं कि कुर्द आखिर हैं कौन और क्यों ईरानी शासन से इनकी दुश्मनी है.
कुर्द हजारों साल पुराना एक समुदाय है, जो तुर्की, इराक, सीरिया, ईरान और आर्मेनिया की सीमाओं पर स्थित पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं. कुर्द फाइटर्स या कुर्दिस्तान समर्थक पॉलिटिकल ग्रुप इसी कुर्द समुदाय से जुड़े हैं. कुर्दों का इतिहास हजारों साल पुराना है.
कुर्द लोग मेसोपोटामिया के मैदानी इलाकों और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों के मूल निवासी हैं, जो आज दक्षिण-पूर्वी तुर्की, उत्तर-पूर्वी सीरिया, उत्तरी इराक, उत्तर-पश्चिमी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया तक फैले हुए हैं. इन इलाकों में 25 से 35 मिलियन कुर्द आबादी फैली हुई है, जिन्हें सामूहिक रूप से कुर्दिस्तान कहा जाता है.
कुर्द लोग मिडिल ईस्ट के चौथे सबसे बड़े जातीय समूह का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें कभी भी एक स्थायी राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला है. उनका अब तक एक अलग देश नहीं बन पाया और आज दशकों से वो इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं. वर्षों से कुर्द अलग देश के लिए तुर्किए, ईरान, ईराक में संघर्ष कर रहे हैं और उतनी ही बेरहमी से इनका दमन भी किया गया है.
कुर्दों का नहीं है अपना कोई देश
कुर्द लोग मध्य पूर्व के कई देशों में फैले हुए हैं और उनका अपना कोई देश नहीं है. यह दशकों से अलग देश की मांग को लेकर ईरान, तुर्किये और ईराक जैसे देशों में अपनी हक की लड़ाई लड़ते आए हैं. कुर्दों को व्यापक रूप से दुनिया का सबसे बड़ा राज्यविहीन जातीय समूह माना जाता है, जो एक साझा संस्कृति और कुर्द भाषा से जुड़े हुए हैं.
1500 के दशक में जब ओटोमन साम्राज्य ने कुर्द-नियंत्रित अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया, तब कुर्दों ने अपनी जमीनें खो दीं. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक,20वीं शताब्दी के आरंभ में, कई कुर्दों ने एक अलग मातृभूमि के निर्माण पर विचार करना शुरू किया, जिसे आम तौर पर "कुर्दिस्तान" कहा जाता है.
पहले विश्वयुद्ध के बाद अलग कुर्दिस्तान का रखा था प्रस्ताव
प्रथम विश्व युद्ध और ओटोमन साम्राज्य की पराजय के बाद 1920 की सेवरस संधि में एक कुर्द राज्य के लिए प्रावधान किया.शांति संधि के तहत, मित्र देशों ने एक स्वायत्त कुर्दिस्तान बनाने का प्रस्ताव रखा. इसे उभरते कुर्द राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए एक बड़ी सफलता के रूप में देखा गया, लेकिन यह संधि कभी लागू नहीं हुई.तब से लेकर अब तक कुर्दों ने बार-बार अपना अलग देश बनाने की कोशिश की है, लेकिन उनके ये प्रयास अब तक असफल रहे हैं.
सीरिया, तुर्की, ईरान और इराक में कुर्द लोगों की लड़ाई का स्वरूप भी अलग है. इसी कड़ी में समझते हैं कि आखिर ईरानी शासन के साथ कुर्दों की क्या लड़ाई है और खासकर खामेनेई रीजिम से कुर्द फाइटर्स को कुछ ज्यादा ही खुन्नस है. इसलिए अमेरिका इन कुर्द फाइटर्स का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ करना चाहता है.
ईरान की कुल जनसंख्या में कुर्द लोगों की संख्या लगभग 10 प्रतिशत है. हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. 1979 की इस्लामी क्रांति के परिणामस्वरूप ईरान के राजा शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटा दिया गया और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई.
हालांकि, कुर्दों ने शुरू में ईरान का समर्थन किया और संक्षेप में इसके कुछ हिस्सों पर नियंत्रण भी किया. फिर भी ईरान के इस्लामिक शासन ने कुर्दों पर कहर बरपा दिया. ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद वहां की फारसी भाषी, शिया मुस्लिम-बहुल सरकार के साथ ज्यादातर सु्न्नी मु्स्लिम वाले कुर्द समुदाय की नहीं बनी. उनका राजनीतिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक और भाषाई अधिकारों की कुर्द मांगों को लेकर अक्सर टकराव होता रहा है.
अमेरिका कुर्दों का करता रहा है इस्तेमाल
अरब और मुस्लिम जगत में कुर्दों पर ऐसे आरोप लगते आए हैं कि अमेरिका कुर्दों का इस्तेमाल करता रहा है और इन्हें वहां अलगाववादी तत्व माना जाता है. क्योंकि, कुर्द लड़ाके सीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ भी लड़े थे, जो अमेरिका को अपना दुश्मन मानते थे. यही वजह है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति में सबसे पहले अलगाववादी तत्व के रूप में कुर्दों को ही देखा जाता है.
अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के शुरुआती दौर में कुर्दों के नरसंहार को वे नहीं भूले हैं. कुर्द इसलिए ईरान के शासन के खिलाफ रहे हैं, क्योंकि "फ़ारसी वर्चस्व" के एक भयावह नस्लवादी इतिहास में ईरानी शासन ने हमेशा कुर्दों का दमन किया है.
कई कुर्द समूह पश्चिमी ईरान में लंबे समय से सरकार का विरोध करते रहे हैं, जहां वे बहुमत में हैं और उन क्षेत्रों में सरकारी बलों के खिलाफ सक्रिय विद्रोह के दौर भी आए हैं. 1980 और 90 के दशक में ईरान में हुए कुर्द विद्रोहों को भारी दमन का सामना करना पड़ा था.
प्रमुख कुर्द दलों को उनके गढ़ों से खदेड़ दिया गया और उनके कई नेता और लड़ाके सीमा पार करके उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र में बने ठिकानों पर चले गए. नागरिक समुदायों को भी इराक में जाने के लिए मजबूर किया गया, हालांकि बड़ी संख्या में कुर्द समुदाय ईरान के अंदर ही रहे.
2004 में कुर्दिस्तान फ्री लाइफ पार्टी (पीजेएके) का गठन ईरानी राज्य के खिलाफ एक सशस्त्र संघर्ष के रूप में किया गया था. तब से, इसने ईरान-इराक सीमा के साथ पहाड़ों में स्थित ठिकानों से ईरानी सुरक्षा बलों पर हमले और घात लगाकर हमले किए हैं. इसलिए अब जब ईरान के टूटने के कयास लगाए जाते हैं तो सबसे पहला नाम कुर्द का आता है.
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