क्या है 'एनर्जी लॉकडाउन'? तेल-गैस बचाने के लिए सोशल मीडिया पर लोग कर रहे हैं बहस

अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ने के बीच 'एनर्जी लॉकडाउन' शब्द ऑनलाइन ट्रेंड कर रहा है. आइये जानते हैं कहां से आया ये शब्द.

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'एनर्जी लॉकडाउन' कोई आधिकारिक शब्द नहीं है (Photo:ITG) 'एनर्जी लॉकडाउन' कोई आधिकारिक शब्द नहीं है (Photo:ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:56 PM IST

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच दुनिया भर में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है-एनर्जी लॉकडाउन. सोशल मीडिया पर लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या दुनिया फिर से COVID-19 जैसे हालात की ओर बढ़ रही है.

हालांकि, अभी तक किसी भी देश ने आधिकारिक तौर पर 'एनर्जी लॉकडाउन' घोषित नहीं किया है. यह शब्द इंटरनेट और सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा गढ़ा गया है, जो मौजूदा ऊर्जा संकट की स्थिति को समझाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे कई वीडियो सामने आ रहे हैं, जहां लोग इस टर्म का जिक्र कर रहे हैं. 

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क्या है 'एनर्जी लॉकडाउन'?

दरअसल,'एनर्जी लॉकडाउन' की कोई तय परिभाषा नहीं है. इसका इस्तेमाल उस स्थिति के लिए किया जा रहा है, जब सरकारें और समाज सीमित ऊर्जा संसाधनों को बचाने के लिए खपत और आवाजाही पर कुछ पाबंदियां लागू करते हैं.

ईरान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है. यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20% तेल के परिवहन के लिए बेहद अहम माना जाता है.

इस बाधा के चलते वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे कीमतों में उछाल और बाजार में अस्थिरता देखी जा रही है. ऐसे में कई देश ऊर्जा बचाने के लिए कदम उठा रहे हैं.

यह भी पढ़ें: स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरेंगे भारत के 20 टैंकर, तो क्या तेल-गैस का संकट खत्‍म?

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क्यों हो रही है ‘एनर्जी लॉकडाउन’ की चर्चा?

सोशल मीडिया पर 'एनर्जी लॉकडाउन' शब्द इसलिए ट्रेंड कर रहा है क्योंकि कई देशों ने ईंधन और बिजली बचाने के लिए प्रतिबंध लागू करने शुरू कर दिए हैं.इसके अलावा, International Energy Agency (IEA) ने भी सरकारों को ऊर्जा बचाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिनमें वर्क फ्रॉम होम, स्पीड लिमिट कम करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना और गैर-जरूरी यात्रा से बचने जैसे उपाय शामिल हैं.

इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर इन्फ्लुएंसर्स इन कदमों को COVID लॉकडाउन से जोड़कर 'एनर्जी लॉकडाउन' बता रहे हैं, जिससे यह शब्द तेजी से फैल रहा है.

किन देशों में लग रहे हैं प्रतिबंध?

दुनिया के कई देशों ने ऊर्जा बचाने के लिए अलग-अलग तरह के कदम उठाए हैं:

श्रीलंका, केन्या, म्यांमार जैसे देशों में पेट्रोल की खरीद पर लिमिट और राशनिंग लागू की गई है.
पाकिस्तान और फिलीपींस में सरकारी दफ्तरों के लिए चार दिन का वर्क वीक लागू किया गया है.
लाओस और वियतनाम में वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा दिया जा रहा है.
न्यूजीलैंड में ‘कार-फ्री डे’ जैसे उपायों पर विचार हो रहा है.
बांग्लादेश में स्कूल ऑनलाइन कर दिए गए हैं और बिजली बचाने के लिए पावर कट लगाए जा रहे हैं.
मिस्र में मॉल और रेस्टोरेंट जल्दी बंद करने के निर्देश दिए गए हैं.
फिलीपींस ने ऊर्जा आपातकाल घोषित किया है, जबकि कंबोडिया और म्यांमार में कई पेट्रोल पंप बंद हो गए हैं.
इन कदमों का मकसद सीमित ऊर्जा संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना है.

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क्या है भारत में हालात?

भारत में भी सोशल मीडिया पर इसको लेकर अटकलें तेज हैं, लेकिन सरकार ने फिलहाल ऐसे किसी कदम से इनकार किया है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि आम लोगों की दैनिक जिंदगी प्रभावित न हो.

उन्होंने बताया कि सरकार ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने, आयात के स्रोत बढ़ाने, कीमतों को स्थिर रखने और LPG, पेट्रोल व डीजल के पर्याप्त भंडार बनाए रखने पर काम कर रही है .

क्या पहले भी लगा है 'एनर्जी लॉकडाउन'

'एनर्जी लॉकडाउन' पहले कभी आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुआ है. यह कोई सरकारी या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय शब्द नहीं, बल्कि मौजूदा हालात को समझाने के लिए सोशल मीडिया पर इस्तेमाल किया जा रहा एक नया टर्म है.
 
हालांकि, ऐसा नहीं है कि ऊर्जा संकट में पाबंदियां पहले नहीं लगीं-1970 के दशक के तेल संकट के दौरान कई देशों में पेट्रोल की कमी के कारण कार-फ्री डे, स्पीड लिमिट कम करना और पेट्रोल राशनिंग जैसे कदम उठाए गए थे.

कुछ यूरोपीय देशों में तो रविवार को गाड़ियां चलाने पर रोक और ईंधन बचाने के लिए सख्त सीमाएं भी लागू की गई थीं. लेकिन आज की स्थिति अलग इसलिए लग रही है क्योंकि लोग इसे COVID लॉकडाउन से जोड़कर देख रहे हैं और सोशल मीडिया पर इसे 'एनर्जी लॉकडाउन' नाम देकर ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. 'एनर्जी लॉकडाउन' कोई आधिकारिक शब्द नहीं है, बल्कि मौजूदा ऊर्जा संकट को समझाने के लिए सोशल मीडिया पर इस्तेमाल किया जा रहा एक ट्रेंड है.

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