कोर्ट मैरिज में कितने रुपये का खर्चा होता है? वकील ने बताई हर एक बात

आजकल लोग पारंपरिक शादी करने के बाद भी या उसके विकल्प के तौर पर सीधे कोर्ट मैरिज करते हैं. ऐसे में यह समझते हैं कि कोर्ट मैरिज क्या होती है और इसमें कितना खर्च आता है और इसकी पूरी प्रक्रिया क्या है.

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आजकल युवाओं में कोर्ट मैरिज का चलन काफी बढ़ गया है (Photo - ITG) आजकल युवाओं में कोर्ट मैरिज का चलन काफी बढ़ गया है (Photo - ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 03 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:17 PM IST

आजकल कई कपल पारंपरिक शादी की बजाय कोर्ट मैरिज का रास्ता चुन रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट होती है और शादी का सरकारी रिकॉर्ड भी तुरंत बन जाता है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि कोर्ट मैरिज क्या होती है, इसमें कितना खर्च आता है और कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी होते हैं?

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सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट गौतम सिंह ने बताया कि कोर्ट मैरिज ऐसी शादी होती है जो किसी मंदिर, मस्जिद या धार्मिक स्थल की बजाय सीधे सरकारी विवाह अधिकारी यानी मैरिज अफसर के सामने संपन्न कराई जाती है. इसके लिए दूल्हा-दुल्हन को मैरिज रजिस्ट्रार या डेपुटी रजिस्ट्रार के कार्यालय में आवेदन करना होता है.

क्या है कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया
शादी के दिन दोनों पक्ष मैरिज अफसर और गवाहों की मौजूदगी में कानूनी तौर पर डिक्लिरेशन देते हैं. इसके बाद उन्हें विवाह प्रमाणपत्र यानी मैरिज सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है, जो शादी का आधिकारिक और कानूनी प्रमाण होता है.

गौतम सिंह ने बताया कि कोर्ट में शादी रजिस्ट्रेशन से पहले पारंपरिक रूप से की गई शादी का प्रमाण देना होता है. अगर कोई कपल सीधे कोर्ट में शादी के लिए आते हैं, तब भी उन्हें पहले मंदिर में शादी करनी होती है या मस्जिद में काजी के सामने निकाह कर उसका प्रमाण देना होता है.  

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अगर शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई है तो उसका प्रमाण देना होता या फिर रजिस्टर्ड मंदिर में शादी करनी पड़ती है. मंदिर में शादी से पहले कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी हैं. जैसे मंदिर में विवाह का कोई रिकॉर्ड रखा जाता हो या मंदिर का शादी- विवाह के लिए रजिस्ट्रेशन किया गया हो. मंदिर से विवाह प्रमाणपत्र जारी किया जाना चाहिए.  अगर मंदिर आधिकारिक प्रमाणपत्र नहीं देता है, तो पुजारी के सिग्नेचर और हाथ से लिखे प्रमाण भी भविष्य  में काम आ सकता है. शादी की तस्वीरें और वीडियो मौजूद हों. शादी बालिग और मानसिक रूप से स्वस्थ गवाहों की मौजूदगी में हुई हो.

एडवोकेट गौतम के मुताबिक, मुस्लिम कपल के लिए भी कोर्ट में मैरिज रजिस्ट्रेशन से पहले ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई जाती है. दिल्ली समेत कई राज्यों में मुस्लिम विवाह आमतौर पर काजी के माध्यम से निकाह के जरिए संपन्न कराया जाता है. इसके बाद विवाह का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है.

कोर्ट मैरिज में कितना खर्च आता है?
गौतम सिंह ने बताया कि कोर्ट मैरिज के लिए सरकारी फीस आमतौर पर बहुत ज्यादा नहीं होती है. अलग-अलग राज्यों में यह करीब 100 से 500 रुपये तक हो सकती है. हालांकि दस्तावेज तैयार कराने, शपथ पत्र बनवाने और वकील की मदद लेने पर कुल खर्च बढ़ सकता है. कुल मिलाकर 2000 से 10000 तक खर्च हो सकते हैं. 

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कोर्ट के मैरिज ऑफिस में शादी के लिए एप्लिकेशन देने का शुल्क 100 से 150 रुपये होता है. इसके तहत मैरिज अफसर के ऑफिस में आधिकारिक फीस के साथ आवेदन देना होता है. इसके बाद विवाह रजिस्ट्रेशन और मैरिज सर्टिफिकेट जारी करने की फीस 100 से 300 रुपये तक होती है. इसके अलावा एफिडिफिट या शपथ पत्र, स्टांप पेपर और वैवाहिक स्थिति, जन्म तिथि और एड्रेस वैरिफाई करने के लिए नोटरी फीस सहित 300 से 1500 तक का खर्च होता है.   

इस तरह वकील की फीस छोड़ कर कोर्ट में शादी करने में करीब 2000 रुपये तक का खर्च हो सकता है.  यानी अगर पूरी प्रक्रिया खुद करें तो खर्च काफी कम हो सकता है, जबकि वकील की मदद लेने पर कुल लागत बढ़ सकती है.कोर्ट में शादी के लिए आमतौर पर पहचान पत्र, पते का प्रमाण और दो गवाहों की जरूरत होती है.

अलग धर्म या जाति के लोगों के लिए क्या है नियम?
एडवोकेट गौतम सिंह ने बताया कि भारत में विशेष विवाह अधिनियम यानी स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत अलग-अलग धर्म, जाति या राष्ट्रीयता के लोग बिना धर्म परिवर्तन किए शादी कर सकते हैं. यह एक पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष और कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें किसी धार्मिक रस्म की आवश्यकता नहीं होती.

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शादी के लिए आवेदन करने से पहले दूल्हा या दुल्हन में से कम से कम एक को उस जिले में लगातार 30 दिन तक रहना जरूरी होता है, जहां आवेदन किया जा रहा है. कपल मैरिज अफसर या एसडीएम ऑफिस में जाकर 'विवाह की सूचना' देते हैं.

30 दिन तक करना होता है इंतजार
मैरिज अफसर  इस सूचना को कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर चिपका देते हैं.  इसके बाद 30 दिन तक कोई भी व्यक्ति कानूनी आधार पर आपत्ति दर्ज करा सकता है. यदि 30 दिन के भीतर कोई वैध आपत्ति नहीं आती, तो दूल्हा-दुल्हन को तीन वयस्क गवाहों के साथ विवाह अधिकारी के सामने उपस्थित होना होता है.

उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष और गवाह आवश्यक घोषणा पत्र पर साइन करते हैं. इसके बाद मैरिज अफसर आधिकारिक मैरिज सर्टिफिकेट जारी कर देते हैं. यही दस्तावेज शादी का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रमाण माना जाता है.

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कोर्ट मैरिज केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी सुरक्षा भी देती है. चाहे शादी मंदिर में हुई हो, निकाह के जरिए हुई हो या सीधे कोर्ट में, विवाह का पंजीकरण कराना भविष्य में किसी भी कानूनी विवाद से बचने के लिए बेहद जरूरी माना जाता है.

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