18 अप्रैल 1983 को लेबनान के बेरूत में अमेरिकी दूतावास कार बम विस्फोट में उड़ गया था. इसमें आत्मघाती हमलावर और 17 अमेरिकियों सहित 63 लोग मारे गए थे. यह आतंकवादी हमला लेबनान में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के विरोध में किया गया था. लेबनान में छिड़े गृहयुद्ध को सुलझाने के लिए अमेरिकी सैनिकों को लेबनान में तैनात किया गया था. अमेरिकी सैनिक एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य टुकड़ी का हिस्सा थे.
1975 में लेबनान में एक खूनी गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमें फ़िलिस्तीनी और वामपंथी मुस्लिम गुरिल्लाओं ने ईसाई फलांगे पार्टी, मारोनाइट ईसाई समुदाय और अन्य समूहों के मिलिशियाओं से लड़ाई लड़ी. अगले कुछ वर्षों के दौरान, सीरियाई, इजराइली और संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप गुटों के बीच की लड़ाई को सुलझाने में विफल रहे, और 20 अगस्त 1982 को, अमेरिकी मरीन सहित एक बहुराष्ट्रीय बल लेबनान से फ़िलिस्तीनी वापसी की निगरानी के लिए बेरूत में उतरा.
10 सितंबर को मरीन सैनिक लेबनानी क्षेत्र से चले गए, लेकिन ईसाई मिलिशिया द्वारा फिलिस्तीनी शरणार्थियों के नरसंहार के बाद 29 सितंबर को वापस लौट आए. अगले दिन, मिशन के दौरान मरने वाला पहला अमेरिकी मरीन सैनिक एक बम को निष्क्रिय करते समय मारा गया.
अमेरिकी सेना पर हमले की श्रृंखला शुरू हो गई
18 अप्रैल, 1983 को बेरूत में अमेरिकी दूतावास पर बमबारी की गई. एक आत्मघाती हमलावर ने कार बम से अमेरिकी दूतावास को उड़ा दिया. इसमें 17 अमेरिकी मारे गए थे. इसके बाद 23 अक्टूबर 1983 को फिर लेबनानी आतंकवादियों ने सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देते हुए विस्फोटकों से भरे एक ट्रक को बेरूत में अमेरिकी मरीन बैरक में घुसा दिया, जिसमें 241 अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए.लगभग उसी समय एक अलग आत्मघाती आतंकवादी हमले में 58 फ्रांसीसी सैनिक मारे गए.
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7 फरवरी, 1984 को, अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने शांति सेना में अमेरिकी भागीदारी की समाप्ति की घोषणा की, और 26 फरवरी को अंतिम अमेरिकी मरीन सैनिक बेरूत से चले गए.
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