लकड़ी के बोझ से डिजिटल आत्मनिर्भरता तक, कैसे बदल रही हैं उत्तराखंड की महिलाएं

'विकसित उत्तराखंड' के विशेष सत्र में देवभूमि की नारी शक्ति, उनकी सुरक्षा और बदलते सामाजिक परिवेश पर गहन मंथन हुआ. इसका मुख्य केंद्र जहां महिलाओं को भयमुक्त वातावरण देना रहा, वहीं बदलते बुनियादी ढांचों के साथ उनके आर्थिक और सामाजिक स्वावलंबन की नई राहों पर भी चर्चा की गई.

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महिला आयोग की सक्रियता और सरकारी योजनाओं से बदल रही उत्तराखंड की तस्वीर (चंद्र दीप कुमार/ इंडिया टुडे) महिला आयोग की सक्रियता और सरकारी योजनाओं से बदल रही उत्तराखंड की तस्वीर (चंद्र दीप कुमार/ इंडिया टुडे)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:06 PM IST

विकसित उत्तराखंड के विशेष सत्र 'महिला सुरक्षा' में राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने आयोग की सक्रिय भूमिका पर बात करते हुए कहा कि आयोग राज्य के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक हर महिला के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. चाहे मानसिक उत्पीड़न हो या कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार, आयोग पीड़ितों के साथ मजबूती से खड़ा रहता है. उन्होंने विशेष रूप से 'स्वतः संज्ञान' की शक्ति का उल्लेख करते हुए बताया कि सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से जानकारी मिलने पर आयोग स्वयं पीड़ित तक पहुंचने का प्रयास करती हैं.

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उन्होंने कहा कि कि आर्थिक रूप से कमजोर और दूरस्थ क्षेत्रों की महिलाओं की सुविधा के लिए प्रशासन और पुलिस के माध्यम से स्थानीय स्तर पर ही समाधान को प्राथमिकता दी जाती है. जागरूकता कैंपों के माध्यम से आज की महिलाएं अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति पहले से कहीं अधिक सजग हुई हैं. इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए साध्वी भगवती सरस्वती ने भारत और विशेषकर उत्तराखंड की नारी शक्ति को नमन किया.

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30 वर्ष पूर्व स्टैनफोर्ड और हॉलीवुड की चकाचौंध छोड़कर ऋषिकेश आने के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जहां पश्चिमी दुनिया सुख-सुविधाओं के बावजूद मानसिक शांति के लिए दवाइयों पर निर्भर है, वहीं हिमालय की महिलाओं ने अभावों के बीच भी अपार आंतरिक शक्ति और संतोष को जीवित रखा है. उन्होंने कहा कि "पहाड़ की महिलाएं शक्ति का साक्षात प्रतीक हैं. 

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साध्वी ने बदलते उत्तराखंड के विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की उज्ज्वला और 'हर घर नल, हर घर जल' जैसी योजनाओं ने महिलाओं के जीवन से लकड़ी ढोने और पानी के लिए घंटों भटकने का संघर्ष समाप्त कर दिया है. उन्होंने 'चिपको आंदोलन' की याद दिलाते हुए कहा कि आज उत्तराखंड के जंगल इन्हीं महिलाओं की वजह से सुरक्षित हैं, जिन्होंने प्रकृति को ईश्वर का ही स्वरूप माना. उन्होंने अंत में आह्वान किया कि अब विकास से मिले अतिरिक्त समय का उपयोग शिक्षा और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में किया जाना चाहिए, ताकि 'विकसित उत्तराखंड' की नींव और मजबूत हो सके.

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