लोग मंदिर दर्शन नहीं 'रील्स' बनाने में बिजी, भक्ति अब बन गया है फैशन: राधा कृष्ण थपलियाल

'विकसित उत्तराखंड 2026' के विशेष सत्र में देवभूमि के आध्यात्मिक स्वरूप और आधुनिकता के टकराव पर गंभीर मंथन हुआ. चर्चा के दौरान विशेषज्ञों और आध्यात्मिक गुरुओं ने तीर्थस्थलों पर जाने वाले लोगों की सोच में आए बदलाव पर बात की.

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तीर्थों का मूल स्वरूप बचाना बेहद जरूरी (Photo-चंद्रदीप कुमार/इंडिया टुडे ग्रुप) तीर्थों का मूल स्वरूप बचाना बेहद जरूरी (Photo-चंद्रदीप कुमार/इंडिया टुडे ग्रुप)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:10 PM IST

विकसित उत्तराखंड 2026' के विशेष सत्र 'दुरुस्त है देवभूमि' में राज्य के स्वरूप और विकास पर चर्चा करते हुए जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी यतिंद्रानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि उत्तराखंड एक ऐसा पावन राज्य है जहां साक्षात देवताओं का वास है. इसलिए हमें तीर्थाटन और पर्यटन के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना होगा.

तीर्थ स्थलों को केवल व्यावसायिक पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित नहीं किया जाना चाहिए. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन स्थानों का मूल आध्यात्मिक स्वरूप बना रहे. विश्वभर से लोग जिस शांति और आध्यात्मिकता की खोज में भारत आते हैं, उसकी मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है.

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युवाओं की भूमिका और प्राकृतिक विरासत पर चर्चा करते हुए यह रेखांकित किया गया कि हिमालय और गंगा संपूर्ण विश्व के लिए दुर्लभ और अनमोल धरोहरें हैं. जब हम इन स्थानों पर केवल 'पर्यटन' के भाव से जाते हैं, तो हमारी दृष्टि सतही होती है, जिससे वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा और पवित्रता प्रभावित होती है. 

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यतिंद्रानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि निश्चित रूप से युवाओं का इन क्षेत्रों की ओर रुझान बढ़ना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन उन्हें धर्म और आध्यात्मिकता की सही दिशा देना अत्यंत आवश्यक है. हमें यह समझना होगा कि ये पावन स्थल केवल मंदिरों के भौतिक ढांचे मात्र नहीं हैं, बल्कि इनका अपना एक गहरा आध्यात्मिक महत्व और अस्तित्व है, जिसकी मर्यादा बनाए रखना हम सभी का उत्तरदायित्व है.

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कैसे बदल रहे हैं तीर्थ स्थल

तीर्थ स्थलों के बदलते स्वरूप के बारे में बदरीनाथ धाम के पूर्व अपर धर्माधिकारी राधा कृष्ण थपलियाल ने कहा,पहले लोग पूरी तरह धार्मिक संकल्प के साथ यात्रा पर आते थे, लेकिन अब तीर्थाटन केवल एक 'टूरिस्ट प्लान' बनकर रह गया है. आज की पीढ़ी ने अनजाने में तीर्थों की मर्यादा को कम कर दिया है. अब लोग गंगा के पावन जल में स्नान करने के बजाय होटलों में स्नान करना पसंद करते हैं. विडंबना यह है कि लोग मंदिर दर्शन से अधिक 'रील्स' बनाने और फोटो खींचने में रुचि रखते हैं. भक्ति अब एक 'फैशन' में तब्दील होती जा रही है, जो चिंता का विषय है.

नई पीढ़ी और युवाओं की तीर्थ यात्रा पर चर्चा करते हुए आध्यात्मिक गुरु जया भारती ने कहा, "हमें 'तीर्थाटन' और 'पर्यटन' के मूल उद्देश्य के अंतर को समझना होगा. पर्यटन का अर्थ आनंद और मनोरंजन हो सकता है, लेकिन तीर्थाटन विशुद्ध रूप से एक आध्यात्मिक और धार्मिक यात्रा है. हमारे धर्म स्थल वास्तव में 'ऊर्जा के केंद्र' होते हैं.

उन्होंने युवाओं को सचेत करते हुए आगे कहा, "यदि आप तीर्थ स्थान पर जाकर केवल फोटो खींचने और रील बनाने में व्यस्त रहते हैं, तो आप वहां की वास्तविक आध्यात्मिक ऊर्जा और लाभ से वंचित रह जाएंगे. आप जिस उद्देश्य के लिए वहां जा रहे हैं, उसका पूर्ण लाभ लेना सुनिश्चित करें. अगर आपका उद्देश्य केवल मनोरंजन है, तो पर्यटन स्थलों पर जाकर मस्ती कीजिए, लेकिन तीर्थ की गरिमा और वहां से मिलने वाली शांति का अनुभव करना है, तो वहां की मर्यादा का पालन अनिवार्य है.

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वीआईपी दर्शन की व्यवस्था और आम श्रद्धालुओं की सुविधा पर चर्चा करते हुए बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा, "हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता मंदिर की कतार में खड़े हर अंतिम व्यक्ति को सुगमता से दर्शन कराना है. इस साल हमने एक नई और प्रभावी कार्ययोजना तैयार की है. दर्शन के समय को अधिकतम करने के लिए हमने एक बड़ा बदलाव किया है अब गर्भगृह में दिन के समय होने वाली विशेष पूजाओं को रात के समय संपन्न किया जाएगा. इससे सुबह से लेकर शाम तक का पूरा समय सामान्य श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए उपलब्ध रहेगा, जिससे कतारें छोटी होंगी और श्रद्धालुओं को कम प्रतीक्षा करनी होगी.

वीआईपी और आम नागरिकों के बीच दर्शन के भेदभाव पर चर्चा करते हुए जया भारती ने व्यावहारिक सुझाव दिया. उन्होंने कहा, "अक्सर जब बड़े मंत्री या विशिष्ट जन आते हैं, तो सुरक्षा प्रोटोकॉल अनिवार्य होता है. लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों को अति-शीघ्र दर्शन कर वहां से प्रस्थान कर लेना चाहिए, ताकि उनकी उपस्थिति और सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा या बाधा का सामना न करना पड़े.

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