7 मार्च 2006 को वाराणसी में संकटमोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर बम धमाके हुए थे. इन बम धमाकों में 16 लोग मारे गए थे. जबकि 76 लोग घायल हो गए थे. इसके एक मुख्य आरोपी वलीउल्लाह को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है. तकरीबन 16 साल बाद मिले इस न्याय से जिन लोगों ने अपनों को खोया था और जो इस ब्लास्ट में घायल हुए थे, उन्हें अपने जख्म पर मरहम का एहसास हुआ. 16 वर्षों बाद मिले न्याय पर पीड़ित और भुगत भोगी परिवारों का क्या कहना है, आइए जानते हैं?
वाराणसी के लक्सा इलाके में रहने वाले हरीश बिजलानी वीडियो फोटोग्राफर थे और पत्रकारिता का भी शौक रखते थे. 7 मार्च को 2016 को बनारस के संकटमोचन मंदिर में एक शादी विवाह की रिकॉर्डिंग के लिए गए थे. लेकिन घर नहीं लौटे. उनकी मौत की खबर घर पहुंची. पूरे परिवार पर गम का पहाड़ टूट पड़ा. 16 साल बाद आज उस जख्म पर मरहम लगा है, तो मृतक के बुजुर्ग पिता देवीदास बिजलानी को सुकून मिला.
जवान बेटे का शव देख हिल गया
आज भी 16 साल पहले वाला मंजर याद करके हरीश के पिता देवीदास सिहर उठते हैं. बताते हैं कि जब उन्हें बम ब्लास्ट की खबर हुई, तब वह भागे-भागे संकट मोचन मंदिर पहुंचे, लेकिन वहां से उन्हें अस्पताल जाने के लिए कहा गया और अस्पताल में बेटे का शव देखकर उनका दिमाग काम करना बंद कर दिया.
देर हुई, लेकिन खुश हैं
16 साल भले ही इंसाफ मिलने में लग गए, लेकिन हरीश के पिता देवीदास बताते हैं कि हमारी भारतीय न्याय व्यवस्था ऐसी है कि दोनों पक्ष को न्याय मिले, भले ही इस में देरी हुई, लेकिन हम खुश हैं कि हमें न्याय मिला और यह भी मलाल नहीं है कि अगले को बचाव का मौका नहीं मिला.
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दाहिना पैर उड़ गया था
- संकटमोचन बम ब्लास्ट में दूसरी दर्दनाक कहानी संतोष साहनी की है जो वाराणसी के दुर्गा घाट इलाके में रहते हैं. 7 मार्च 2006 को संतोष शादी में शरीक होने संकट मोचन मंदिर पहुंचे थे. वहां हुए ब्लास्ट से बेहोश हो गए और जब होश आया तो दाहिना पैर ब्लास्ट में उड़ चुका था.
महज एक लाख रुपए मुआवजा मिला
पीड़ित संतोष बेहद गरीब परिवार के हैं. कपड़े की थैली बेचकर और फेरी लगाकर अपना गुजारा करते हैं. इस ब्लास्ट के बाद संतोष को एक लाख रुपए मुआवजा मिला था जो इनके लिए नाकाफी था. लिहाजा अभी भी वे हर रोज जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर रहे हैं. इस फैसले से खुश तो हैं, लेकिन हर रोज गरीबी और बेरोजगारी ने इन्हें अपंग बना दिया है.
आज भी शरीर में धंसे हैं बम के छर्रे
संतोष साहनी बताते हैं कि वो ब्लास्ट तो एक बार हुआ, लेकिन उनकी ज़िंदगी मे रोज ब्लास्ट हो रहा हैं. उनके पास कुछ नहीं बचा है. बहुत दुखी हैं. एक पैर खोने के बाद भी शरीर में अभी भी बम के छर्रे भरे हुए हैं, लेकिन इतना पैसा भी नहीं कि उसको निकलवा सकें. कहीं काम मांगने जाओ, तो लोग अपंगता देखकर काम पर नहीं रखते हैं.
विस्फोट पीड़ित संतोष बताते हैं कि वलीउल्लाह को फांसी की सजा शांति तो मिली, लेकिन उनके जख्मों पर मरहम अभी भी नहीं लग सका है. कम से कम सरकार उन्हें मदद करें और रोजी रोजगार मुहैया कराएं, ताकि वह अपने परिवार और बच्चों का भरण पोषण कर सकें.
इलाहाबाद जिले का रहने वाला है आतंकी
गौरतलब है कि वाराणसी धमाकों के बाद यूपी पुलिस ने 5 अप्रैल 2006 को इलाहाबाद के फूलपुर गांव निवासी वलीउल्लाह को लखनऊ के गोसाईंगंज इलाके से गिरफ्तार किया था. आतंकी वलीउल्लाह का मुकदमा लड़ने से वाराणसी के वकीलों ने मना कर दिया था. इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह केस गाजियाबाद जिला जज की अदालत में ट्रांसफर कर दिया था. तभी से केस की सुनवाई गाजियाबाद स्थित जिला जज की कोर्ट में चल रही थी.
रोशन जायसवाल