Lucknow: बिना सिर खोले हो जाएगी ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी, इस तकनीक के जरिए निकलेगा ट्यूमर

लखनऊ के SGPGI अस्पताल ने ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी के लिए नई तकनीक को विकसित किया है. इस तकनीक के जरिए सिर खोलकर ट्यूमर का ऑपरेशन नहीं करना होगा. बल्कि कान के पीछे के स्कल एरिया से करना संभव होगा. डॉक्टर अमित केसरी ने बताया कि ऐसे ऑपरेशन को करने में 6 घंटे का समय लगता है.

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(प्रतीकात्मक फोटो) (प्रतीकात्मक फोटो)

सत्यम मिश्रा

  • लखनऊ ,
  • 21 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 11:39 AM IST

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के SGPGI अस्पताल ने ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी के लिए नई तकनीक को विकसित किया है. इस तकनीक के जरिए सिर खोलकर ट्यूमर का ऑपरेशन नहीं करना होगा. बल्कि कान के पीछे के स्कल एरिया से यह संभव होगा.

PGI अस्पताल के न्यूरोटोलॉजिस्ट डॉक्टर अमित केसरी ने बताया कि कान के पीछे एक टेंपोरल बोन होती है, जिसे मास्टायड टेंपोरल बोन कहते हैं. जो स्कल का हिस्सा होती है. कान के पीछे के रास्ते से सिर के ट्यूमर तक पहुंचाते हैं और फिर उसे निकालते हैं.   

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डॉक्टर अमित केसरी ने बताया कि ऐसे ऑपरेशनों को करने में 6 घंटे का समय लगता है. अब तक हमने आठ से दस ब्रेन ट्यूमर को ऑपरेशन की इस विधि से किया है, जो पूरी तरह से सफल रहा. डॉक्टर केसरी बताते हैं कि ट्यूमर को एकॉस्टिक न्यूरोमा ट्यूमर कहते हैं. इसके आसपास एक हेयरिंग नर्व्स होती है. जब यह एकॉस्टिक न्यूरोमा ट्यूमर निकलता है तो इसके प्रभाव से बगल में मौजूद हेयरिंग नर्व्स में दबाव आता है. जिसके चलते सुनने की क्षमता कम हो जाती है. 

डॉक्टर्स का कहना है कि यह ट्यूमर 30 साल की उम्र के बाद लोगों में होने लगता है. जिनके अंदर नॉन जेनेटिक सिंड्रोम होता है उनमें यह थोड़ी देरी से पनपता है और फिर आगे चलकर ट्यूमर का रूप लेता है. डॉक्टर अमित बताते हैं कि सभी ट्यूमर का ऑपरेशन नहीं किया जाता. अगर कोई ट्यूमर हम लोगों ने डिटेक्ट किया और पाया कि मरीज के कान में सांय-सांय या सीटी की आवाज आ रही है और हल्का-फुल्का सिर दर्द हो रहा है और ट्यूमर छोटा निकलता है. तो ऐसे में हम टयूमर्स को एमआरआई के जरिए फॉलो करते हैं फिर गामा नाइफ की प्रक्रिया से ट्यूमर को खत्म करते हैं. गामा नाइफ एडवांस रेडियोथेरपी प्रोसीजर है. 

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डॉक्टर अमित केसरी ने बताया कि कान के पीछे से मास्टायड टेंपोरल बोन के रास्ते से जाकर ब्रेन ट्यूमर सर्जरी करने में रिस्क कम होता है क्योंकि ऑपरेशन के वक्त हम ब्रेन के हिस्से को कम टच करते हैं और सीधे ट्यूमर तक पहुंच जाते हैं. 

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