कहीं जान का जोखिम, कहीं शव पर सौदेबाजी... प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के नाम पर लूट की खुली पोल

आजतक की पड़ताल उन प्राइवेट अस्पतालों के खिलाफ है, जो जीवन बचाने के नाम लूट की दुकान चला रहे हैं. लखनऊ से लेकर मुंगेर और रांची से लेकर भोपाल तक, प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को नोट छापने की मशीन समझ लिया गया है. आज हम आपको उन परिवारों की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां बताएंगे, जिनकी इलाज के दौरान गाढ़ी कमाई भी गई और अपनों की जान भी गंवानी पड़ी.

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शहर अलग हैं, मरीज अलग हैं, लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में लूट का तरीका एक जैसा है. (Photo- ITG) शहर अलग हैं, मरीज अलग हैं, लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में लूट का तरीका एक जैसा है. (Photo- ITG)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:10 PM IST

सफेद कोट और साफ-सुथरी इमारतों के पीछे छिपा प्राइवेट अस्पतालों का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जो मानवता को शर्मसार करने वाला है. 'आजतक' की पड़ताल में लखनऊ से लेकर मुंगेर और रांची से लेकर भोपाल तक, प्राइवेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी और अंधेरगर्दी की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां उजागर हुई हैं. 

शहर अलग हैं, मरीज अलग हैं, लेकिन लूट का तरीका एक जैसा है. पैसों की लूट, कथित मेडिकल लापरवाही और इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें. लखनऊ, ग्रेटर नोएडा, मुंगेर, रांची और भोपाल से आई ग्राउंड रिपोर्ट यही सवाल खड़ा करती है कि आखिर कब तक प्राइवेट अस्पताल मरीजों की मजबूरी को कमाई का जरिया बनाते रहेंगे?

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लखनऊ: इलाज ने बना दिया जिंदगीभर का मरीज

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 35 वर्षीय नीरज मिश्रा की कहानी प्राइवेट अस्पतालों की कथित मनमानी का बड़ा उदाहरण है. तीन साल पहले नीरज बैटरी रिक्शा दुर्घटना में घायल हो गए थे. इलाज के लिए वे विनोद हॉस्पिटल पहुंचे, जहां कथित तौर पर गलत सर्जरी के बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई. इलाज के नाम पर उनसे बार-बार पैसे जमा कराए गए. एक अन्य अस्पताल में इलाज दिखाया गया, लेकिन रकम विनोद हॉस्पिटल में ली गई. बाद में उन्हें रातों-रात दोबारा विनोद हॉस्पिटल लाया गया, जहां जल्दबाजी में टांके सही तरीके से नहीं लगाए गए. 

अंततः एक प्राइवेट अस्पताल में उन्हें 9 से 10 सर्जरी करानी पड़ीं. एक पैर की हालत बिगड़ने पर दूसरे पैर से मांस प्रत्यारोपित किया गया, जिससे दोनों पैर कमजोर हो गए और नीरज चलने-फिरने में असमर्थ हो गए. लगातार इलाज और सर्जरी के कारण नीरज पर करीब 21 लाख रुपये का कर्ज हो गया. आरोप है कि उन्होंने न्याय के लिए उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, सीएमओ, एजी मंडल, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक 13 से ज्यादा शिकायतें भेजीं, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. 

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वहीं, विनोद हॉस्पिटल के संचालक विनोद मिश्रा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है. लखनऊ परिवार कल्याण बोर्ड की जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि नीरज मिश्रा के पैर के ऑपरेशन के दौरान हुई जटिलताओं के लिए विनोद हॉस्पिटल का प्रबंधन जिम्मेदार है. इस रिपोर्ट के आधार पर सीएमओ ने अस्पताल रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया और अगली सूचना तक अस्पताल की सभी चिकित्सा गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है.

ग्रेटर नोएडा: 30 लाख वसूलने के बाद भी डेड बॉडी रोकी

ग्रेटर नोएडा के महानंदन हॉस्पिटल में फिरोजाबाद के जयदेव सिंह का मामला और भी चौंकाने वाला है. ब्रेन हैमरेज के बाद इलाज के नाम पर करीब 30 लाख रुपये वसूले गए. जमीन बिक गई, कर्ज चढ़ गया, लेकिन मरीज नहीं बचा. 7 जनवरी को मौत के बाद भी अस्पताल ने तीन लाख रुपये बकाया बताकर शव सौंपने से इनकार कर दिया. दरअसल, 14 नवंबर 2025 को ब्रेन हेमरेज के बाद जयदेव सिंह को इलाज के लिए 250 बेड वाले महनंदा अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. 

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने करीब 3 लाख रुपये बकाया होने का हवाला देते हुए मृतक का शव परिजनों को सौंपने से इनकार कर दिया. परिजनों का कहना है कि वे हर दो-चार दिन में अस्पताल को भुगतान करते रहे, लेकिन मरीज की हालत और इलाज को लेकर उन्हें कोई संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई. अचानक हालत बिगड़ने के बाद शाम करीब 4 बजे मरीज को मृत घोषित कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल ने कई घंटों तक शव नहीं सौंपा.

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परिजनों ने आरोप लगाया कि इलाज के लिए उन्होंने जमीन तक बेच दी थी और अब उनके पास एक भी रुपया नहीं बचा था, इसलिए वे शेष रकम नहीं दे पाए. शव रोके जाने से परेशान परिवार ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस हस्तक्षेप के करीब 6 से 7 घंटे बाद अस्पताल ने शव सौंपा. इसके बाद परिजन अपने मृतक परिजन के शव को लेकर फिरोजाबाद रवाना हो गए. वहीं अस्पताल का दावा है कि परिवार को खर्च की जानकारी दी गई थी.

मुंगेर: बिना सहमति पैर काटा, परिवार को बंधक बनाया

बिहार के मुंगेर में साइकिल पर बर्तन बेचने वाले टिंकू साहू की जिंदगी एक झटके में बदल गई. सड़क हादसे के बाद सदर अस्पताल से उन्हें नेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया. आरोप है कि बिना परिवार की सहमति के टिंकू का पैर काट दिया गया. 24 नवंबर 2025 को लखीसराय के मेदनी चौकी निवासी 35 वर्षीय टिंकू साहू सड़क हादसे में घायल हो गए. उन्हें सदर अस्पताल, मुंगेर लाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद पटना रेफर करने की बात कही गई, लेकिन चार लोग उसे एंबुलेंस से सीधे मुंगेर नेशनल हॉस्पिटल ले गए. 

आरोप है कि वहां बिना परिजनों की सहमति के आधी रात उसका दाहिना पैर काट दिया गया और इलाज के नाम पर करीब 4 लाख रुपये वसूले गए. पैसे न देने पर उसकी मां और पत्नी को लगभग 13 दिन तक अस्पताल में बंधक रखा गया. आरोप है कि टिंकू के पिता महेश साहू से कहा गया, "किडनी बेचो या शरीर बेचो, पैसा लाओगे तभी बेटा और बहू छूटेंगे."

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2 दिसंबर 2025 को पिता महेश साहू ने डीएम निखिल धनराज निप्पणिकर से शिकायत की. जांच के बाद टिंकू को मुक्त कर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया. प्रशासन ने अस्पताल को नोटिस जारी किया है और पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई की चेतावनी दी है.

रांची: अस्पताल की लापरवाही से बुजुर्ग की मौत

रांची के पारस हॉस्पिटल में रिटायर्ड बैंककर्मी बीआर तिवारी की मौत ने भी कई सवाल खड़े किए. मई 2025 में सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी बीआर तिवारी को तबीयत बिगड़ने पर 300 बेड वाले पारस अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मृतक के बेटे चंद्रप्रकाश तिवारी ने आरोप लगाया कि अस्पताल को जैसे ही पता चला कि मरीज बीमाकृत है, उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती कर दिया गया और अगले ही दिन दो लाख रुपये से अधिक का बिल थमा दिया गया. 4 से 5 दिनों में कुल 5 लाख 39 हजार रुपये वसूले गए.

परिवार का कहना है कि उन्हें पैसों की चिंता नहीं थी, लेकिन इलाज में घोर लापरवाही बरती गई. उनके एक करीबी डॉक्टर मित्र, जो AIIMS से पढ़े हैं, ने पाया कि मरीज का कैथेटर (शरीर से यूरिन बाहर निकालने के लिए लगाई जाने वाली नली) 48 घंटे तक सही तरीके से नहीं लगाया गया था. इसके कारण शरीर में संक्रमण बढ़ता गया और अंततः यही मौत का कारण बना. यह गंभीर चूक आईसीयू में हुई, जिसकी जानकारी परिजनों ने अस्पताल को दी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.

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परिजनों का आरोप है कि अस्पताल को गलती का अंदाजा था, इसलिए परिवार के साथ बैठक की गई, लेकिन उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला. बीआर तिवारी की पत्नी ने कहा कि वह सिर्फ चाहती हैं कि ऐसी पीड़ा किसी और परिवार को न झेलनी पड़े. वहीं, बार-बार संपर्क करने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने अब तक आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.

भोपाल: मामूली चोट, भारी बिल और मौत

भोपाल के जिंदल अस्पताल में भी कथित रूप से अत्यधिक शुल्क वसूली का मामला सामने आया है. नितेश यादव के परिवार ने आरोप लगाया कि मई 2025 में उनकी 24 वर्षीय बहन शालू यादव को मामूली पैर की चोट के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. परिवार का कहना है कि भर्ती के समय अस्पताल ने 40,000 रुपये का अग्रिम जमा करने को कहा और दावा किया कि पैर का छोटा ऑपरेशन किया जाएगा, जबकि चोट केवल सूजन की थी.

नितेश यादव ने बताया कि भर्ती के बाद उनकी बहन को आईसीयू में ले जाया गया, जहां उनकी हालत बिगड़ती गई और सुबह 4 बजे उनकी बहन की मौत हो गई. उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल ने इलाज के नाम पर केवल पैसा वसूला और गरीबों को न्याय नहीं मिला. उनकी माता, विद्यावती यादव ने कहा कि अस्पताल की ओर से घमंडपूर्ण व्यवहार किया गया और एक लाख रुपये की मांग की गई. परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और सितंबर 2025 में एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें अस्पताल के मैनेजर, सर्जन और नर्सिंग स्टाफ शामिल हैं.

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वहीं जिंदल अस्पताल के डॉक्टर अमन जैन ने फोन पर कहा कि आरोप पूरी तरह गलत हैं और मरीज का इलाज आयुष्मान योजना के तहत किया गया था. उन्होंने बताया कि पुलिस और जिला प्रशासन ने मामले की जांच की और अस्पताल को निर्दोष पाया. परंतु परिवार अभी भी न्याय और सच्चाई की मांग कर रहा है.

सिस्टम पर सवाल: आखिर कब थमेगी मनमानी?

इन सभी मामलों में एक बात साफ नजर आती है- प्राइवेट अस्पतालों की जवाबदेही का अभाव. सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और प्राइवेट अस्पतालों में बेलगाम मुनाफाखोरी के बीच मरीज पिस रहा है. सवाल यही है कि क्या प्राइवेट अस्पताल ठगी का ठिकाना बन चुके हैं? सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी का फायदा उठाकर प्राइवेट अस्पताल अपनी जेबें भर रहे हैं. हालांकि सरकार ने प्राइवेट अस्पतालों के लिए बिलों का एक पारदर्शी फॉर्मेट और वेंटिलेटर के इस्तेमाल पर नए नियम जारी किए हैं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर कड़े एक्शन नहीं होंगे, तब तक इन देश के तमाम प्राइवेट अस्पतालों में लूट का सिलसिला जारी रहेगा.

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