मुझे शिवसेना से कोई गिला नहीं: गोपाल कृष्ण गांधी

मैं गांधी जी का पौत्र हूं, मेरा विजिटिंग कार्ड ये नहीं है. मैं अपने आप को 'फलां' का पोता कह कर अपना परिचय नहीं दे रहा हूं. मैं अपने आपको उनका पोता मानता हूं. लेकिन उस परिभाषा से मैं अपने आप को नहीं देखता हूं.

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गोपाल कृष्ण गांधी गोपाल कृष्ण गांधी

अहमद अजीम

  • नई दिल्ली,
  • 18 जुलाई 2017,
  • अपडेटेड 7:20 PM IST

उपराष्ट्रपति पद के लिए नामांकन के बाद 'आज तक' ने यूपीए के उम्मीदवार और महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी से बातचीत की. गांधी ने कहा, "जीत आंकड़ों से होती है सिद्धान्तों से नहीं लेकिन कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, प्रतियोगिता ऐसी होती हैं कि सिद्धान्त पर ही चलना चाहिए. परिणाम जो भी हो. तो उस सिद्धान्त पर ये मैं कर रहा हूं. आगे चल रहा हूं. आप एक दृष्टिकोण से सही कह रहे हैं कि विपक्ष नंबर्स के हिसाब से पिछड़ रहा है, लेकिन कभी-कभी हार के लिए तैयार रहना अपने में एक जीत होती है. अगर उस प्रयत्न और परिश्रम से अपने उसूलों को आगे बढ़ाया जा सके."

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देश के मौजूदा हालत पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, "उसूल क्या हैं. मेरी समझ से 3-4 उसूल हैं. जनता का राजनीति और राजनेताओं से विश्वास उठ गया है. कभी ये बहुत था और अटूट था. मेरा उद्देश्य है कि राजनीति पर दोबारा से विश्वास, ऐतबार बढ़े. राजनीति परिवर्तनों से और राजनीतिज्ञों में परिवर्तनों से. आज समाज में एक दरार बन रही है. कौमों के बीच बहुत बड़ी दरार है. मैं उस दरार और अविश्वास के खिलाफ हूं. ये हमारी राजनीति ही नहीं हमारी संस्कृति के लिए बहुत खतरनाक है. ये एक बड़ा खतरा है."

सांसदों का समर्थन मांगते हुए गांधी ने कहा, "50 प्रतिशत जनता की उम्र 25 से कम है. यह एक युवा देश है. लेकिन जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ रही है. हमारे नौजवानों को हताश और मायूस कर रही है उससे बहुत बड़ा खतरा है. बहुत बड़ी समस्या है. किसानों की समस्या बहुत गंभीर हो गई है. इसका कारण सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज नहीं बल्कि नीतियों से ये हुआ है. मैं कोई लेबेल नहीं दूंगा. लेकिन सरकारों से कृषि संकट को संभालना नहीं हुआ है. इसके कई कारण हैं. इसलिए एक citizen's candidate के तौर पर मैं अपने माननीय सांसदों का समर्थन मांग रहा हूं. मैं मानता हूं कि कोई भी सांसद अपने अंतःकरण को सुने बगैर वोट नहीं करेगा. ये कहना उन पर अन्याय होगा कि उन्होंने अंतःकरण की आवाज सुन कर वोट नहीं किया. अगर कोई सांसद एकता में, अखंडता में विश्वास रखता है तो वो अपने अंतःकरण की आवाज मानेगा."

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महात्मा गांधी संग अपने रिश्ते को लेकर उन्होंने कहा, "मैं गांधी जी का पौत्र हूं, मेरा विजिटिंग कार्ड ये नहीं है. मैं अपने आप को 'फलां' का पोता कह कर अपना परिचय नहीं दे रहा हूं. मैं अपने आपको उनका पोता मानता हूं. लेकिन उस परिभाषा से मैं अपने आप को नहीं देखता हूं. गांधी जी से देश का हर नागरिक जुड़ा हुआ है. गांधी जी से जो भी जुड़ा है वो किसानों से, बुनकरों से और सामान्य नागरिक से जुड़े हैं."

नायडू पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "बहुत बड़ी बात है कि किसान परिवार से आते हैं. हमारे देश की उपलब्धि है जैसे देवगौड़ा जी, देवी लाल जी, चरण सिंह जी... ये सब किसानों से जुड़े हैं. उसी परंपरा में वेंकैया नायडू जी जुड़े हैं. ये हमारे देश के लिए बहुत अच्छी बात है."

फांसी की सजा पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "मैं मृत्यु दंड के खिलाफ हूं. मृत्यु दंड एक मध्य कालीन प्रणाली है जिसके आगे हमें बढ़ जाना चाहिए. महात्मा गांधी और बाबा साहब अम्बेडकर इसके खिलाफ थे. इससे ज्यादा कोई कारण होना ही नहीं चाहिए मरण दंड के विरूद्ध होने के लिए. लेकिन ये हमारी कानूनी किताब में है. इसके अलावा राष्ट्रपति को विशेष भूमिका दी गई है. अगर कोई अपील करता है तो वो विचार करते हैं सरकारी हिदायत के साथ. प्रेजिडेंट नारायणन जी का मैं सचिव था. बहुत बारीकी से वो मरण दंड की फाइलों को पढ़ते थे और बारीक, सूक्ष्म सवाल पूछ कर अपने आप को संतुष्ट करते थे. प्रेजिडेंट अब्दुल कलाम मरण दंड के खिलाफ थे और उन्होंने एक ही शायद मरण दंड को मंजूरी दी. बाकियों को नहीं दी."

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उन्होंने आगे कहा, "जब के दस्तावेज राष्ट्रपति के पास पहुंचे तो ऐसा ज्ञात हुआ कि कुछ नए दस्तावेज़ आए हैं जिसकी वजह से राष्ट्रपति को उस पर विचार पुनः करना चाहिए. कइयों ने उनको पत्र लिखा सुप्रीम कोर्ट के जजों ने, मैंने भी उनको पत्र लिखा कि इस पर आप विचार करिएगा. मैं मरण दंड के खिलाफ हूं और उसी परंपरा से ये मैं कह गया. और उसी परंपरा और भावना से मैंने कुलभूषण जाधव मामले में मैंने पाकिस्तान के सदर को उसी वक्त लिखा और कहा कि आप हमारे भारत के सह नागरिक कुलभूषण जाधव को सजा-ए-मौत से बचाइए."

शिव सेना की टिप्पणी पर बोलते हुए ने कहा, "शिव सेना ने जो कहा वो उनका धर्म था, उनको कहना ही था, मुझे शिव सेना से कोई गिला नहीं हैं."

 

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