कोरोना की वैक्सीन के लिए अगले तीन महीने काफी अहम

वैक्सीन विकसित करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें काफी लंबा समय लगता है. इसके नतीजे आने में लगभग एक दशक का समय लग जाता है. लेकिन प्रयास जारी हैं कि अगले वर्ष के प्रारंभ में कोरोना वायरस की वैक्सीन हासिल कर ली जाए.

Advertisement
प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

अंकित कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 13 जून 2020,
  • अपडेटेड 9:17 PM IST

  • 10 वैक्सीन का मानव पर हो रहा क्लिनिकल ट्रायल
  • ICMR ने दी प्रोफिलैक्सिस दवा के उपयोग की सलाह

कोरोना वायरस महामारी विकसित देशों से अब घनी आबादी वाले विकासशील देशों की ओर रुख कर चुकी है. भारत जैसे देश में यह महामारी रोज नये रिकॉर्ड बना रही है. इस बीच इसके इलाज और वैक्सीन के लिए दुनिया भर में काफी प्रयास किए जा रहे हैं.

Advertisement

हालांकि, पिछले दो महीनों में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक हस्तक्षेप हुआ है, वैक्सीन बनाने और इलाज खोजने के प्रयासों की बारीकी से समीक्षा करने पर पता चलता है कि अगले तीन महीने बेहद अहम होने जा रहे हैं. इस संबंध में बहुत सारे वैज्ञानिक प्रयोग विदेशों में किए जा रहे हैं. भारतीय फार्मा कंपनियां इन प्रयासों के केंद्र में हैं.

चूंकि वैक्सीन विकसित करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें काफी लंबा समय लगता है. इसके नतीजे आने में लगभग एक दशक का समय लग जाता है. लेकिन प्रयास जारी हैं कि अगले वर्ष के प्रारंभ में कोरोना वायरस की वैक्सीन हासिल कर ली जाए.

कोरोना पर फुल कवरेज के लि‍ए यहां क्ल‍िक करें

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 9 जून, 2020 तक COVID-19 की वैक्सीन के 136 प्रयासों/प्रयोगों को चिन्हित किया है. इनमें से 10 प्रयोग मानव परीक्षण (human clinical trials) के चरण में पहुंच गए हैं. इन वैक्सीन या टीकों के प्रभाव और सुरक्षा के बारे में बहुत कुछ ज्ञात नहीं है, क्योंकि मानव शरीर पर इनके परीक्षणों के तीसरे चरण के परिणाम आने बाकी हैं. लेकिन वैज्ञानिक, फार्मा कंपनियां और सरकारें इन संभावित टीकों निर्माण और भंडारण की दौड़ में शामिल हो गई हैं.

वैक्सीन में भारत की भूमिका

Advertisement

संभावित वैक्सीन निर्माण और इलाज दोनों के मामले में भारतीय फार्मा कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) इस महीने की शुरुआत में दिग्गज फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन के निर्माण के लिए समझौता किया, जिसमें 2020 के अंत तक 400 मिलियन (40 करोड़) खुराक मुहैया कराने की प्रतिबद्धता जताई गई है.

एसआइआई के सीईओ ने शनिवार को कहा, “अंतत: हमने एस्ट्राजेनेका के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, यह विशेष रूप से भारत और GABI (द ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्यूनाइजेशन) के लिए है. हम सालाना एक अरब डोज तक का उत्पादन करेंगे. इससे सभी भारतीयों तक आपूर्ति और पहुंच सुनिश्चित होगी.”

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन का परीक्षण फिलहाल ह्यूमन ट्रायल के दूसरे और तीसरे चरण से गुजर रहा है. भारत में स्वदेशी वैक्सीन बनाने के भी प्रयास चल रहे हैं, लेकिन वे अभी सैद्धांतिक अनुसंधान और प्री-क्लिीनिकल स्टेज में हैं.

कोरोना कमांडोज़ का हौसला बढ़ाएं और उन्हें शुक्रिया कहें...

सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार डॉ के विजयराघवन ने हाल ही में कहा था, “भारत में निजी शोधकर्ताओं से लेकर बड़े उद्योगों तक लगभग 30 समूह हैं, जो कोरोना की वैक्सीन विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ कंपनियां क्लिीनिकल स्टेज पूरा करने वाली हैं.”

वैश्विक तौर पर प्रमुख उम्मीदवारी अमेरिकी फर्म 'मॉडर्न' की है जिसका प्रयास ह्यूमन क्लिीनिकल ट्रायल के चरण में पहुंच चुका है. यह फर्म जुलाई में 30,000 वालेंटियर्स पर तीन चरण के परीक्षण शुरू करने जा रही है.

Advertisement

एक तरफ ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका परियोजना संयुक्त रूप से ब्रिटेन और अमेरिकी सरकारों द्वारा वित्त पोषित है, दूसरी ओर मॉडर्न को भी अमेरिकी सरकार द्वारा वित्तीय सहायता मिल रही है. चीन की कंपनी सिनोवैक बायोटेक ब्राजील में अपने दूसरे चरण का परीक्षण कर रही है. चीन के पास चार अन्य ग्रुप ऐसे हैं जो कोरोना वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल कर रहे हैं.

कोरोना की दवा और इलाज

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अमेरिका स्थित गिलियड साइंसेज कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा रेमेडिसविर की निर्माता कंपनी है. इसने भारतीय दवा निर्माता कंपनी जीडस कैडिला, सिपला लिमिटेड, जुबिलियंट साइंसेज लिमिटेड और हेटेरोओ लिमि​टेड के साथ दवा के उत्पादन को लेकर समझौता किया है.

हाल ही में हुए अध्ययनों के अनुसार, अमेरिका में COVID रोगियों के उपचार के लिए आपात स्थिति में प्राधिकरण के दिशानिर्देशों के तहत रेमेडिसविर का उपयोग किया जा रहा है. एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया का कहना है, “बहुत सीमित स्टॉक उपलब्ध है, मुझे उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में हमारे पास इसकी बड़ी मात्रा उपलब्ध होगी.”

अधिकांश दवाएं या तो शुरुआती परीक्षण की स्टेज में हैं या फिर उनके ट्रायल के नतीजे इतने संतोषजनक नहीं रहे हैं कि वैश्विक तौर पर प्रयोग की अनुमति मिल जाए. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा अप्रूव्ड दवा EIDD-2801 फिलहाल उपलब्ध नहीं है. Favilavir/Avifavir दवा को चीन, इटली और रूस में मंजूरी मिल चुकी है लेकिन इसके नतीजे मिले जुले और अनिर्णायक हैं.

Advertisement

देश-दुनिया के किस हिस्से में कितना है कोरोना का कहर? यहां क्लिक कर देखें

इससे पहले अमेरिका और ब्रिटेन में दो अध्ययनों में पाया गया कि मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का COVID-19 के उपचार में कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं रहा. ब्रिटेन में परीक्षण के मुख्य जांचकर्ता प्रोफेसर पीटर हॉर्बी और प्रोफेसर मार्टिन लैंडरे ने एक बयान में कहा था, “हमने निष्कर्ष निकाला है कि अस्पताल में भर्ती COVID-19 के मरीजों में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का कोई लाभकारी प्रभाव नहीं है.”

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) अधिक खतरनाक संक्रमण की हालत में प्रोफिलैक्सिस दवा के उपयोग की सलाह दे रहा है. ICMR के डीजी डॉ बलराम भार्गव ने दिल्ली में रिपोर्टरों से कहा, “हमने डेटा खंगाला और पाया कि यह दवा काम कर सकती है और हमने यह भी पाया कि इसके कोई खास दुष्प्रभाव नहीं हैं.” अब तक किसी भी परीक्षण में COVID-19 के इलाज के लिए कोई भी दवा निर्णायक रूप से प्रभावी साबित नहीं हुई है.

वैक्सीन का ट्रायल

वैक्सीन के परीक्षण में एक बार प्री-क्लिीनिकल ट्रायल सफल होने के बाद उसका ह्यूमन ट्रायल शुरू किया जाता है. इससे यह आकलन किया जाता है कि वैक्सीन से समूची जनसंख्या को वायरस से कैसे बचाया जा सकता है. प्रक्रिया के दौरान, वैज्ञानिक मानव शरीर में यह पहचानने की कोशिश करते हैं कि क्या इससे ऐसा प्रतिरक्षा तंत्र विकसित हो सकता है जो वायरस को मानव शरीर में संक्रमण फैलने से रोक सकता हो.

Advertisement

क्लिीनिकल ट्रायल के पहले चरण में स्वस्थ वयस्कों पर प्रयोग किया जाता है, जबकि दूसरे चरण दो में दस हजार वालेंटियर को शामिल किया जाता है जिसमें हर तरह के लोग हों. तीसरे चरण में अलग-अलग स्थान और आयु समूहों पर परीक्षण किया जाता है. फिर कुछ कुछ समय पर वालेंटियर्स की स्थिति जानने के लिए सर्वे किया जाता है कि उन पर क्या प्रभाव पड़ा.

ऑक्सफोर्ड के वैक्सीन के शोधकर्ताओं ने एक बयान में कहा, “कितनी जल्दी हम जरूरी मरीजों की संख्या तक पहुंचते हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि लोगों में वायरस के संक्रमण का स्तर क्या है. यदि संक्रमण सामुदायिक है तो हमें जरूरी आंकड़ा कुछ ही महीनों में मिल सकता है. लेकिन अगर संक्रमण की दर गिरती है, तो इसमें छह महीने लग सकते हैं.”

शनिवार की सुबह भारत में एक दिन में कोरोना वायरस के 11 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए और आंकड़ा 3 लाख के पार चला गया. भारत अमेरिका, ब्राजील और रूस के बाद दुनिया का चौथा टॉप हॉटस्पॉट बन गया है.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement